ज़िंदगी को कीजिए ‘रीसेट’ – Press the Reset Button On Your Life

ज़िंदगी हमें हर समय किसी-न-किसी मोड़ पर उलझाती रहती है. हम अपने तयशुदा रास्ते से भटक जाते हैं और मंजिल आँखों से ओझल हो जाती है. ऐसे में मैं हमेशा से यही ख्वाहिश करता आया हूँ कि काश मेरे पास ज़िंदगी को नए सिरे से शुरू करने के लिए कोई रीसेट बटन होता जैसा मोबाइल या कम्प्युटर में होता है, और ऐसा सोचनेवाला शायद मैं अकेला शख्स नहीं हूँ.

यकीनन, हमारे पास बीते समय में लौटने के लिए कोई टाइम मशीन नहीं है लेकिन कुछ तो ऐसा है जिससे हम अपने जीवन को रीसेट या रीबूट कर सकते हैं.

और ऐसा करने के लिए कोई खास दिन जैसे नया साल या जन्मदिन या और कोई किसी खास मौके की राह तकना वक़्त की बर्बादी ही होगी. आज यह पल ही वह सबसे बेहतर अवसर है जब हम अपने अतीत को पीछे छोड़कर एक नयी शुरुआत कर सकते हैं.

हमारी मुख्य समस्या यह है कि हम अपने नए लक्ष्यों के बारे में सोचकर उत्साहित तो बहुत हो जाते हैं लेकिन उन्हें जीवन में उतारने का लिए ज़रूरी मेहनत नहीं करते. फिर कुछ समय बीतते-बीतते हमें यह अहसास हो जाता है कि हम कुछ भी हासिल नहीं कर पाए. हम कहाँ चूक कर बैठे?

ऐसे में हमें इस बात को मन में बिठाना चाहिए कि कुछ हासिल करने के लिए मेहनत करने और अनुशासित रहने से भी ज़रूरी यह है कि हम भली-भांति सोच-विचार कर अपने लक्ष्य बनाएं. यदि हम अपनी सामाजिक हैसियत बढ़ाने (जैसे ज्यादा पैसा कमाने या नया सामान खरीदने) के लिए लक्ष्य बना रहे हैं तो शायद हमारा हौसला जल्द ही पस्त पड़ जाएगा क्योंकि हम इसे पूरे दिल से नहीं बनाते क्योंकि ये वे बातें हैं जो हम दूसरों को प्रभावित करने के लिए करना चाहते हैं.

इसलिए सबसे पहला चरण यह है कि हम अपने दिल के भीतर टटोलें और उस चीज़ की पहचान करें जो हमारे लिए सबसे कीमती है. और फिर उसे पाने के लिए आगे बढ़ें. सोचें कम, करें ज्यादा.

अपनी ज़िंदगी को रीसेट करने के लिए आप इन सुझावों को भी अपना सकते हैं:

स्वास्थ्य:-

बेहतर स्वास्थ्य की ओर: आज और इसी वक़्त से अपने खानपान की आदतों में सुधार कीजिये. यदि आपने शाकाहारी बनने या वीगन डाईट अपनाने का तय किया है तो इसे अमल में लाइए. प्रोसेस्ड फ़ूड, जंक फ़ूड, चिप्स, सॉफ्ट ड्रिंक्स, कैंडी वगैरह को अपने आहार से बाहर कीजिये.

मास्टर क्लींजिंग आजमाइए: दस दिनों की डिटॉक्सीफिकेशन डाईट से आपका स्वास्थ्य रीबूट होगा और आपके आहार में बदलाव आएगा. मैं ऐसा तीन बार कर चुका हूँ. इससे शरीर और मन के बीच तादात्म्य स्थापित होता है. जब हमारी ऊर्जा भोजन को पचाने में खर्च नहीं होती है तो हमारा शरीर स्वयं को व्यवस्थित करने लगता है. उपवास करके देखिये और आप जान जायेंगे कि हम अपने समय का कितना बड़ा हिस्सा खाना बनाने और खाने में लगा देते हैं.

सरल-सहज जीवन:-

जंजाल से छुटकारा: अपने आसपास फैले सामान और कबाड़ को उलटिए पलटिये और उनकी तीन ढेरियाँ बनाइये – रिसाइकल, दान, और उपयोग. जिन वस्तुओं को आपने बहुत समय से इस्तेमाल नहीं किया है उन्हें उनकी कंडीशन के अनुसार या तो फेंक दीजिये, या किसी को दे दीजिये, या बेच दीजिये. इसी तरह अपनी मेज की दराज, आलमारी, गैरेज, और शेल्फ की सफाई कीजिये.

अपने मन को विस्तार दें: हम बहुत सारा समय अपने माहौल को व्यवस्थित करने में लगाते हैं लेकिन अपने उस स्पेस की अनदेखी करते हैं जिसमें हमारा सबसे ज्यादा समय बीतता है, और वह है हमारा मन. अपने मन को रीबूट करने के लिए उन नकारात्मक विश्वासों से छुटकारा पाइए जो आपको कमजोर बनाते हैं. अपने मन से उन बातों को बाहर निकालिए जो आपको आगे नहीं ले जातीं. हद से ज्यादा दूसरों की परवाह मत कीजिये, अहंकार वश लिए गए अनावश्यक संकल्पों को पूरा करने में मत जुटें.

घर-परिवार-संबंध:-

जुड़ाव और मेलमिलाप रखिये: हमारी ज्यादातर महत्वाकांक्षाओं के केंद्र में हम ही होते हंन लेकिन इनके लिए हमें अपने संबंधों की अवहेलना नहीं करनी चाहिए. अपने परिवार और बच्चों के साथ बिताये गए लम्हे कभी व्यर्थ नहीं जाते. अपने माता-पिता से और अधिक जुड़ने का प्रयास कीजिये क्योंकि उन्हें हर बीतते दिन के साथ आपकी अधिक ज़रुरत होती है. किसी व्यक्ति से पुराना वैरभाव हो तो खुद आगे बढ़कर उसे दूर कीजिये. किसी कड़वी बात को भुलाने और किसी को माफ़ करने के लिए किसी मौके की तलाश नहीं कीजिए.

रोमांटिक बनिए: अपने कैरियर, नौकरी-बिजनेस, और स्वास्थ्य को केंद्र में रखकर बनाए गए लक्ष्यों को पूरा करने की आपाधापी में ज़िंदगी से रोमांस पीछे छूट जाता है. इसे ज़िंदगी में वापस लाना आसान है. अपने प्रियजन के साथ वक़्त बिताइए, कहीं सैर पर जाइए. उनके लिए कोई उपहार खरीदिये. साथ बैठकर कॉफ़ी पीना और फिल्म देखना भी शुरुआत के लिए कुछ बुरा नहीं है.

रुपये-पैसे, खर्चे, कमाई:-

अपने बैंक अकाउंट का जायजा लें: छुट्टियों या त्यौहारों के दौरान खर्चे आसमान छूने लगते हैं. जब सभी उपहारों का आदान-प्रदान कर रहे हों तो खुद को काबू में रखना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में मॉल्स और दुकानों में बम्पर सेल और ऑफर भी बड़े लुभावने मिलते हैं. लेकिन ऐसे समय पर ही अपने खर्च पर ध्यान देने की ज़रुरत होती है. अपने ज़रूरी खर्चों के लिए बचत करना, फालतू के खर्चों को नियंत्रित करना, और आड़े वक़्त के लिए पैसे बचाकर रखना ही सबसे अच्छी नीति है.

अपने हुनर और काबिलियत को निखारें: पेन और पेपर लें. पेपर के बीच एक लाइन खींचकर दो कॉलम बनायें. पहले कॉलम में अपने पिछले तीस दिनों के सारे गैरज़रूरी खर्चे लिखें जैसे अनावश्यक कपड़ों, शौपिंग, जंक फ़ूड, सिनेमा, मौज-मजे में खर्च की गयी रकम. हर महीने चुकाए जाने वाले ज़रूरी बिलों की रकम इसमें शामिल न करें. अब दूसरे कॉलम में उन चीज़ों के बारे में लिखें जिन्हें आप पैसे की कमी के कारण कर नहीं पा रहे हैं. शायद आप किसी वर्कशौप या कोचिंग में जाना चाहते हों या आपको एक्सरसाइज बाइक खरीदनी हो. आप पहले कॉलम में किये गए खर्चों में कटौती करके दुसरे कॉलम में शामिल चीज़ों के लिए जगह बना सकते हैं.

फिटनेस:-

फिटनेस के लिए ज़रूरी लय बनाए रखें: आप कई तरह के फिटनेस प्रोग्राम और लक्ष्य तय कर सकते हैं. बदलते हुए वातावरण और तनावपूर्ण जीवन के कारण अब यह बहुत ज़रूरी हो गया है कि हम नियमित रूप से किसी शारीरिक गतिविधि में शामिल हों. इसके लिए यह ज़रूरी है कि हम फिटनेस के लिए की जाने वाली गतिविधियों जैसे सुबह की सैर, जॉगिंग, योग आदि की लय को बनाए रखें. यदि हम अनुशासित रहकर अपनी गतिविधि को नियमित रूप से करेंगे तो इसका लाभ हमें तो मिलेगा ही बल्कि हमारे करीबी भी अपनी फिटनेस बनाए रखने के लिए प्रेरित होंगे. इस लक्ष्य को हासिल करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि हम किसी ऐसे ग्रुप में शामिल हो जाएँ जो किसी निश्चित स्थान पर रोज़ एकत्र होता है.

बोनस टिप: हम कई अवसरों पर खुद को पीछे कर देते हैं क्योंकि हमें कुछ पता नहीं होता या हम यह नहीं जानते कि शुरुआत कहाँ से करें. ऐसे में “मैं नहीं जानता” कहने के बजाय “मैं यह जानकर रहूँगा” कहने की आदत डालें. यह टिप दिखने में आसान है पर बड़े करिश्मे कर सकती है. इसे अपनाकर आप बिजनेस में आगे रहने के लिए ज़रूरी आक्रामकता दिखा सकते हैं. आप योजनाबद्ध तरीके से अपनी किताबें छपवा सकते हैं. और यदि आप ठान ही लें तो पूरी दुनिया घूमने के लिए भी निकल सकते हैं. संकल्प लें कि आप जानकारी नहीं होने को अपनी प्रगति की राह का रोड़ा नहीं बनने देंगे.

आभासी दुनिया से बाहर निकलना: ईमेल, फेसबुक, ट्विटर, चैट, मोबाइल और शेयरिंग की दुनिया में यह बहुत संभव है कि आप वास्तविक दुनिया से दूर होते जाएँ. ये चीज़ें बुरी नहीं हैं लेकिन ये वास्तविक दुनिया में आमने-सामने घटित होनेवाले संपर्क का स्थान नहीं ले सकतीं. लोगों से मेलमिलाप रखने, उनके सुख-दुःख में शरीक होने से ज्यादा कनेक्टिंग और कुछ नहीं है. आप चाहे जिस विधि से लोगों से जुड़ना चाहें, आपका लक्ष्य होना चाहिए कि आप लम्बे समय के लिए जुड़ें. दोस्तों की संख्या नहीं बल्कि उनके साथ की कीमत होती है.

इस तरह आप ऊपर बताये गए सुझावों और तरीकों को अपने जीवन में अमल में लाकर अपनी ज़िंदगी को एक नए और खुशनुमा मोड़ पर लाने के लिए रीसेट कर सकते हैं. और मैं यह एक बार और कहूँगा – इसके लिए सबसे अच्छा दिन है ‘आज’, और सबसे अच्छा वक़्त है ‘अभी’.

(लियो बबौटा के लेख “How to Press the Reset Button On Your Life” का हिंदी अनुवाद. यह राजस्थान पत्रिका में कुछ संशोधन के साथ छप चुका है.)

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आख़री सफ़र

(अमरीकन लेखक केंट नेर्बर्न ने आध्यात्मिक विषयों और नेटिव अमरीकन थीम पर कई पुस्तकें लिखीं हैं. नीचे दिया गया प्रसंग उनकी एक पुस्तक से लिया गया है)

बीस साल पहले मैं आजीविका के लिए टैक्सी चलाने का काम करता था. घुमंतू जीवन था, सर पर हुक्म चलानेवाला कोई बॉस भी नहीं था.

इस पेशे से जुडी जो बात मुझे बहुत बाद में समझ आई वह यह है कि जाने-अनजाने मैं चर्च के पादरी की भूमिका में भी आ जाता था. मैं रात में टैक्सी चलाता था इसलिए मेरी टैक्सी कन्फेशन रूम बन जाती थी. अनजान सवारियां टैक्सी में पीछे बैठतीं और मुझे अपनी ज़िंदगी का हाल बयान करने लगतीं. मुझे बहुत से लोग मिले जिन्होंने मुझे आश्चर्यचकित किया, बेहतर होने का अहसास दिलाया, मुझे हंसाया, कभी रुलाया भी.

इन सारे वाकयों में से मुझे जिसने सबसे ज्यादा प्रभावित किया वह मैं आपको बताता हूँ. एक बार मुझे देर रात शहर के एक शांत और संभ्रांत इलाके से एक महिला का फोन आया. हमेशा की तरह मुझे लगा कि मुझे किन्हीं पार्टीबाज, झगड़ालू पति-पत्नी-प्रेमिका, या रात की शिफ्ट में काम करनेवाले कर्मचारी को लिवाने जाना है.

रात के ढाई बजे मैं एक छोटी बिल्डिंग के सामने पहुंचा जिसके सिर्फ ग्राउंड फ्लोर के एक कमरे की बत्ती जल रही थी. ऐसे समय पर ज्यादातर टैक्सी ड्राईवर दो-तीन बार हॉर्न बजाकर कुछ मिनट इंतज़ार करते हैं, फिर लौट जाते हैं. लेकिन मैंने बहुत से ज़रूरतमंद देखे थे जो रात के इस पहर में टैक्सी पर ही निर्भर रहते हैं इसलिए मैं रुका रहा.

यदि कोई खतरे की बात न हो तो मैं यात्री के दरवाजे पर पहुँच जाता हूँ. शायद यात्री को मेरी मदद चाहिए, मैंने सोचा.

मैंने दरवाजे को खटखटाकर आहट की. “बस एक मिनट” – भीतर से किसी कमज़ोर वृद्ध की आवाज़ आई. कमरे से किसी चीज़ को खसकाने की आवाज़ आ रही थी.

लम्बी ख़ामोशी के बाद दरवाज़ा खुला. लगभग अस्सी साल की एक छोटी सी वृद्धा मेरे सामने खड़ी थी. उसने चालीस के दशक से मिलती-जुलती पोशाक पहनी हुई थी. उसके पैरों के पास एक छोटा सूटकेस रखा था.

घर को देखकर यह लग रहा था जैसे वहां सालों से कोई नहीं रहा है. फर्नीचर को चादरों से ढांका हुआ था. दीवार पर कोई घड़ी नहीं थी, कोई सजावटी सामान या बर्तन आदि भी नहीं थे. एक कोने में रखे हुए खोखे में पुराने फोटो और कांच का सामान रखा हुआ था.

“क्या तुम मेरा बैग कार में रख दोगे?” – वृद्धा ने कहा.

सूटकेस कार में रखने के बाद मैं वृद्धा की सहायता के लिए पहुंचा. मेरी बांह थामकर वह धीमे-धीमे कार तक गयी. उसने मुझे मदद के लिए धन्यवाद दिया.

“कोई बात नहीं” – मैंने कहा – “मैंने आपकी सहायता उसी तरह की जैसे मैं अपनी माँ की मदद करता.”

“तुम बहुत अच्छे आदमी हो” – उसने कहा और टैक्सी में मुझे एक पता देकर कहा – “क्या तुम डाउनटाउन की तरफ से चल सकते हो?”

“लेकिन वह तो लम्बा रास्ता है? – मैंने फ़ौरन कहा.

“मुझे कोई जल्दी नहीं है” – वृद्धा ने कहा – “मैं होस्पिस जा रही हूँ”.
(होस्पिस में मरणासन्न बूढ़े और रोगी व्यक्ति अपने अंतिम दिन काटते हैं.)

मैंने रियर-व्यू-मिरर में देखा. उसकी गीली आंखें चमक रहीं थीं.

“मेरा इस दुनिया में कोई नहीं है” – उसने कहा – “डॉक्टर कहते हैं कि मेरा समय निकट है”.

मैंने मीटर बंद करके कहा – “आप जिस रास्ते से जाना चाहें मुझे बताते जाइए”.

अगले दो घंटे तक हम शहर की भूलभुलैया से गुज़रते रहे. उसने मुझे वह बिल्डिंग दिखाई जहाँ वह बहुत पहले लिफ्ट ऑपरेटर का काम करती थी. हम उस मोहल्ले से गुज़रे जहाँ वह अपने पति के साथ नव-ब्याहता बनकर आई थी. मुझे एक फर्नीचर शोरूम दिखाकर बताया कि दसियों साल पहले वहां एक बालरूम था जहाँ वह डांस करने जाती थी. कभी-कभी वह मुझे किसी ख़ास बिल्डिंग के सामने गाड़ी रोकने को कहती और अपनी नम आँखों से चुपचाप उस बिल्डिंग को निहारते रहती.

सुबह की लाली आसमान में छाने लगी. उसने अचानक कहा – “बस, अब और नहीं. मैं थक गयी हूँ. सीधे पते तक चलो”.

हम दोनों खामोश बैठे हुए उस पते तक चलते रहे जो उसने मुझे दिया था. यह पुराने टाइप की बिल्डिंग थी जिसमें ड्राइव-वे पोर्टिको तक जाता था. कार के वहां पहुँचते ही दो अर्दली आ गए. वे शायद हमारी प्रतीक्षा  कर रहे थे. मैंने ट्रंक खोलकर सूटकेस निकाला और उन्हें दे दिया. महिला तब तक व्हीलचेयर में बैठ चुकी थी.

“कितने रुपये हुए” – वृद्धा ने पर्स खोलते हुए पूछा.

“कुछ नहीं” – मैंने कहा.

“तुम्हारा कुछ तो बनता है” – वह बोली.

“सवारियां मिलती रहती हैं” – मैं बोला.

अनायास ही पता नहीं क्या हुआ और मैंने आगे बढ़कर वृद्धा को गले से लगा लिया. उन्होंने मुझे हौले से थाम लिया.

“तुमने एक अनजान वृद्धा को बिन मांगे ही थोड़ी सी ख़ुशी दे दी” – उसने कहा – “धन्यवाद”.

मैंने उनसे हाथ मिलाया और सुबह की मद्धम रोशनी में बाहर आ गया. मेरे पीछे एक दरवाज़ा बंद हुआ और उसके साथ ही एक ज़िंदगी भी ख़ामोशी में गुम हो गयी.

उस दिन मैंने कोई और सवारी नहीं ली. विचारों में खोया हुआ मैं निरुद्देश्य-सा फिरता रहा. मैं दिन भर चुप रहा और सोचता रहा कि मेरी जगह यदि कोई बेसब्र या झुंझलाने वाला ड्राईवर होता तो क्या होता? क्या होता अगर मैं बाहर से ही लौट जाता और उसके दरवाज़े तक नहीं जाता?

आज मैं उस घटनाक्रम पर निगाह डालता हूँ तो मुझे लगता है कि मैंने अपनी ज़िंदगी में उससे ज्यादा ज़रूरी और महत्वपूर्ण कोई दूसरा काम नहीं किया है.

हम लोगों में से अधिकांश जन यह सोचते हैं कि हमारी ज़िंदगी बहुत बड़ी-बड़ी बातों से चलती है. लेकिन ऐसे बहुत से छोटे दिखनेवाले असाधारण लम्हे भी हैं जो हमें खूबसूरती और ख़ामोशी से अपने आगोश में ले लेते हैं.

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Liebman’s List – लीबमैन की लिस्ट

अमेरिकन रब्बाई और अनेक प्रेरक पुस्तकों के लेखक जोशुआ लोथ लीबमैन (1907-1948) ने अपने संस्मरणों में लिखा है: – “मैं जब युवा था तब जीवन में मुझे क्या पाना है उसके सपने मैं देखता रहता था. एक दिन मैंने उन चीज़ों की लिस्ट बनाई जिन्हें पाकर किसी को भी पूर्णता की अनुभूति हो और वह स्वयं को धन्य समझे. उस लिस्ट में स्वास्थ्य, सौंदर्य, समृद्धि, सुयश, शक्ति, संबल – और भी बहुत सी चीज़ें उसमें मैंने लिख दीं.

उस लिस्ट को लेकर मैं एक बुज़ुर्ग के पास गया और उनसे मैंने पूछा – “क्या इस लिस्ट में मनुष्य की सभी गुणवान उपलब्धियां नहीं आ जाती हैं?”

मेरे प्रश्न को सुनकर और मेरी लिस्ट में वर्णित उपलब्धियों को देखकर उन बुज़ुर्ग के चेहरे पर मुस्कान फ़ैल गयी और वह बोले – “बेटे, तुमने वाकई बहुत अच्छी लिस्ट बनाई है और इसमें तुमने अपनी समझ के अनुसार हर सुन्दर विचार को स्थान दिया है. लेकिन तुम इसमें सबसे महत्वपूर्ण तत्व तो लिखना ही भूल गए जिसकी अनुपस्थिति में शेष सब कुछ व्यर्थ हो जाता है. उस तत्व का दर्शन विचार से नहीं वरन अनुभूति से ही किया जा सकता है.”

मैं असमंजस में आ गया. मेरी दृष्टि में तो मैंने लिस्ट में ऐसी कोई चीज़ नहीं छोड़ी थी. मैंने उनसे पूछा – “तो वह तत्व क्या है?”

इस प्रश्न के उत्तर में उन बुज़ुर्ग ने मेरी पूरी लिस्ट को बड़ी निर्ममता से सिरे से काट दिया और उसके सबसे नीचे उन्होंने छोटे से तीन शब्द लिख दिए:

‘मन की शांति’ (Peace of Mind)

* * * * * * * * * *

When he was a young man, author Joshua Liebman made a list of things he would like to have. The list was long and included such things as health, love, talent, power, wealth, and fame.

He showed the list around, asking others for their opinion. A wise, old friend of the young man’s family looked the list over and said, “Joshua, this is an excellent list. It is set down in a reasonable order. But it appears, my young man, that you have omitted the most important element of all. You have forgotten one ingredient, lacking which, each possession becomes a hideous torment, and your list as a whole an intolerable burden.”

“And what is that missing ingredient?” Joshua asked.

The wise, old friend replied by taking a pencil and crossed out Joshua’s entire list.

Then he wrote down three words: “Peace of Mind.”

That young man, Joshua Liebman, later became the author of the inspiring book called Peace of Mind which has sold millions of copies.

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फादर कोल्बे

prison cell of father kolbeसंत मैक्सिमिलियन कोल्बे (1894-1941) पोलैंड के फ्रांसिस्कन मत के पादरी थे. नाजी हुकूमत के दौरान उन्हें जर्मनी की खुफिया पुलिस ‘गेस्टापो’ ने बंदी बना लिया. उन्हें पोलैंड के औश्वित्ज़ के यातना शिविर में भेज दिया गया.

एक दिन यातना शिविर में दैनिक हाजिरी के दौरान एक बंदी कम पाया गया. अधिकारियों ने यह निष्कर्ष निकाला कि वह भाग गया लेकिन बाद में उसका शव कैम्प के गुसलखाने में मिला. वह शायद भागने के प्रयास में पानी की टंकी में डूब गया था. अधिकारियों ने यह तय किया कि मृतक बंदी के भागने का प्रयास करने के कारण उसी बैरक के दस बंदियों को मृत्युदंड दे दिया जाए ताकि कोई दूसरा बंदी भागने का प्रयास करने का साहस न करे. जिन दस बंदियों का चयन किया गया उनमें फ्रान्सिजेक गज़ोनिव्ज़ेक भी था. जब उसने अपनी भावी मृत्यु के बारे में सुना तो वह चीत्कार कर उठा – “हाय मेरी बेटियाँ, मेरी बीवी, मेरे बच्चे! अब मैं उन्हें कभी नहीं देख पाऊँगा!” – वहां मौजूद सभी बंदियों की आँखों में यह दृश्य देखकर आंसू आ गए.

उसका दुःख भरा विलाप सुनकर फादर कोल्बे आगे आये और उसे ले जानेवालों से बोले – “मैं एक कैथोलिक पादरी हूँ. मैं उसकी जगह लेने के लिए तैयार हूँ. मैं बूढ़ा हूँ और मेरा कोई परिवार भी नहीं है”.

फ्रान्सिजेक के स्थान पर कोल्बे की मरने की फरियाद स्वीकार कर ली गई. फादर कोल्बे के साथ बाकी नौ बंदियों को एक कालकोठरी में बंद करके भूख और प्यास से मरने के लिए छोड़ दिया गया. फादर कोल्बे ने सभी बंदी साथियों से उस घड़ी में प्रार्थना करने और ईश्वर में अपनी आस्था दृढ़ करने के लिए कहा. वे बंदियों के लिए माला जपते और भजन गाते थे. भूख और प्यास से एक के बाद एक बंदी मरता गया. फादर कोल्बे अंत तक जीवित रहे और सबके लिए प्रार्थना करते रहे.

कुछ दिनों बाद जब कालकोठरी को खोलकर देखा गया तो फादर कोल्बे जीवित मिले. 14 अगस्त, 1941 के दिन उन्हें बाएँ हाथ में कार्बोलिक एसिड का इंजेक्शन देकर मार दिया गया. उन्होंने प्रार्थना करते हुए अपना हाथ इंजेक्शन लेने के लिए बढ़ाया था. जिस कालकोठरी में फादर कोल्बे की मृत्यु हुई अब वह औश्वित्ज़ जानेवाले यात्रियों के लिए किसी पावन तीर्थ की भांति है.

फादर कोल्बे द्वारा जीवनदान दिए जाने के 53 वर्ष बाद फ्रान्सिजेक गज़ोनिव्ज़ेक की मृत्यु 95 वर्ष की उम्र में 1995 में हुई. जब पोप जॉन पॉल द्वितीय ने 1982 में फादर कोल्बे को संत की उपाधि दी तब वह उस समय वहां अपने परिवार के साथ उपस्थित था.

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(A motivational / inspiring anecdote about the sacrifice of Saint Maximilian Kolbe – in Hindi)

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पागलपन

एक ताकतवर जादूगर ने किसी शहर को तबाह कर देने की नीयत से वहां के कुँए में कोई जादुई रसायन डाल दिया. जिसने भी उस कुँए का पानी पिया वह पागल हो गया.

सारा शहर उसी कुँए से पानी लेता था. अगली सुबह उस कुँए का पानी पीनेवाले सारे लोग अपने होशहवास खो बैठे. शहर के राजा और उसके परिजनों ने उस कुँए का पानी नहीं पिया था क्योंकि उनके महल में उनका निजी कुआं था जिसमें जादूगर अपना रसायन नहीं मिला पाया था.

राजा ने अपनी जनता को सुधबुध में लाने के लिए कई फरमान जारी किये लेकिन उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि सारे कामगारों और पुलिसवालों ने भी जनता कुँए का पानी पिया था और सभी को यह लगा कि राजा बहक गया है और ऊलजलूल फरमान जारी कर रहा है. सभी राजा के महल तक गए और उन्होंने राजा से गद्दी छोड़ देने के लिए कहा.

राजा उन सबको समझाने-बुझाने के लिए महल से बाहर आ रहा था तब रानी ने उससे कहा – “क्यों न हम भी जनता कुँए का पानी पी लें! हम भी फिर उन्हीं जैसे हो जायेंगे.”

राजा और रानी ने भी जनता कुँए का पानी पी लिया और वे भी अपने नागरिकों की तरह बौरा गए और बेसिरपैर की हरकतें करने लगे.

अपने राजा को ‘बुद्धिमानीपूर्ण’ व्यवहार करते देख सभी नागरिकों ने निर्णय किया कि राजा को हटाने का कोई औचित्य नहीं है. उन्होंने तय किया कि राजा को ही राजकाज चलाने दिया जाय.

 

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