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लियो बबौटा मेरे प्रिय ब्लौगर हैं. इस ब्लौग पर मैंने उनकी कुछ बेहतरीन पोस्टें अनूदित करके पोस्ट की हैं. उनके ब्लौग की सम्पूर्ण सामग्री पर वे किसी प्रकार का अधिकार नहीं रखते. अपने ब्लौग ज़ेनहैबिट्स में वे रचनात्मकता और उत्पादकता बढ़ानेवाले लेख लिखते हैं और दूसरे ब्लौग मिनिमलिस्ट में संतुष्टि अर्जित करने के सूत्र प्रस्तुत करते हैं. कुछ समय पूर्व ‘पिता-दिवस’ के अवसर पर उन्होंने अपने तीन-वर्षीय पुत्र के लिए एक पत्र लिखा था जिसका स्वतन्त्र अनुवाद मैंने किया है. आशा है आपको यह पसंद आएगा.

प्यारे सेथ,

अभी तुम तीन साल के ही हो और उम्र के इस मुकाम पर तुम कुछ भी पढ़ नहीं सकते… और समझ भी नहीं सकते कि मैं तुम्हें इस चिठ्ठी में क्या बताने जा रहा हूँ. मैं बहुत सी बातों के बारे में सोच रहा हूँ जैसे तुम्हारे सामने तुम्हारा पूरा जीवन पड़ा हुआ है.. और ज़िंदगी ने मुझे भी बहुत कुछ सिखाया है, और यह भी कि एक पिता के रूप में मैं क्या करूँ कि तुम ज़िंदगी के इम्तिहानों का सामना कर सको.

आज तुम्हें शायद इस चिठ्ठी में लिखी बातें समझ में नहीं आयें लेकिन एक दिन तुम इन्हें समझ पाओगे और मुझे उम्मीद है कि तुम्हें इनके महत्व और मूल्य को जान जाओगे.

तुम बहुत छोटे हो और अभी ज़िंदगी अपनी तमाम दुश्वारियों, नाकामियों, उदासी, अकेलेपन, बैचैनी, और जोखिमों को तुमपर उतारने के मौके तलाश रही है. अभी तुमने दिन-रात खटनेवाले कामों में खुद को नहीं झोंका है जिनके लिए कोई शुक्रिया का एक शब्द भी नहीं कहता. अभी तुमने रोज़मर्रा पड़नेवाले पत्थरों की बौछार को नहीं झेला है.

अभी तुम जिस दौर में हो उसके लिए शुक्रगुजार रहो. ये तुम्हारी ज़िंदगी के सबसे शानदार लम्हे हैं. आगे तुम्हारी ज़िंदगी में और भी रंग-भरे मौसम आयेंगे, जिनकी धूप-छाँव से भी तुम्हें दो-चार होना होगा.

मैं उम्मीद करता हूँ कि मैं तुम्हें अपनी ज़िंदगी के सिखाये सबक राह में बताता चलूँगा. हर सलाह की तरह तुम मेरी बातों को भी नाप-तौलकर ही मानना. यह ज़रूरी नहीं है कि जो कुछ मेरे लिए अच्छा रहा हो वह तुम्हारे लिए भी वैसा ही हो.

ज़िंदगी निर्मम भी हो सकती है

तुम्हें ऐसे लोग भी मिलेंगे जो अच्छे नहीं हों. वे तुम्हें सिर्फ इसलिए भी सता सकते हैं कि तुम भले बच्चे हो. वे तुम्हें गिरा सकते हैं, चोट भी पहुंचा सकते हैं.

इन लोगों से निपटने के तरीके सीखने के अलावा तुम इनका कुछ ख़ास नहीं बिगाड़ सकते. तुम ऐसे लोगों को अपना दोस्त बनाना जो तुम्हारी परवाह करें और तुम्हारे भीतर हौसला और ख़ुशी पैदा करें. जब तुम्हें ऐसे दोस्त मिलें, तुम उन्हें खजाने की तरह अहतियात से अपने करीब रखना, उनके साथ वक़्त गुजारना, उनसे प्रेम करना.

ज़िंदगी में ऐसे कई मौके आयेंगे जब सफलता तुमसे दूर होगी और दिल में निराशा घर कर लेगी. ज़िंदगी में सब कुछ हमेशा तुम्हारे हिसाब से नहीं होगा. यह भी ऐसी बात है जिससे जूझना तुम्हें सीखना होगा. इससे पहले कि ये तुम्हें अपने बोझ तले दबा दें, तुम उन्हें परे धकेल देना. असफलता का सामना करना और उससे अपने सपने सच कर दिखाने की सीख लेना. अपनी कमजोरियों को अपनी ताक़त में बदल देना. फिर तुम ज़िंदगी में बहुत बेहतर करोगे.

कभी ऐसा भी होगा कि जिनको तुम चाहोगे वे तुमसे दूर हो जायेंगे और तुम्हारा दिल टूट जायेगा. मैं तो चाहता हूँ कि ऐसा न हो लेकिन ये सबके साथ होता है. इसमें भी तुम कुछ ख़ास नहीं कर सकते बजाय इसके कि तुम ज़िंदगी की राह पर आगे बढ़ चलो. अपने दर्द को सीढ़ी बनाकर तुम अच्छी चीज़ों की ओर चल पड़ना, इनसे भी तुम्हें कुछ सबक ज़रूर मिलेंगे.

जीवन को स्वीकार करते रहो

हाँ, यह सच है कि ज़िंदगी में दुःख-दर्द कदम-कदम पर आते रहते हैं… लेकिन तुम इनके कारण ज़िंदगी से मुंह नहीं मोड़ना. ज़िंदगी से भागना नहीं, किसी कोने में मत दुबकना. नई बातों, अनुभवों, और लोगों का स्वागत करना.

हो सकता है कि तुम्हारा दिल दस बार टूट जाए, लेकिन अपने जीवनसाथी की खोज में ग्यारहवीं बार कोशिश करना. यदि तुम ज़िंदगी में प्यार को आने से रोक दोगे तो शायद तुम उसे खो बैठोगे. जब तुम्हें वह मिल जाएगी तब तुम्हें ज़िंदगी मुकम्मल लगने लगेगी.

तुम भी अक्सर ऐसे लोगों से टकराओगे जो तुम्हें झुन्झलायेंगे और चोट पहुंचाएंगे. ऐसे दर्ज़नों शख्स से मिलने के बाद ही तुम्हें सच्चे दोस्त मिलेंगे. यकीनन, खुद को बंद कर लेने से, नए लोगों को दरकिनार कर देने से तुम्हारी ज़िंदगी में कुछ दर्द कम होगा लेकिन यदि तुम ऐसा करोगे तो उन बेजोड़ लोगों से कैसे मिलोगे जो ज़िंदगी के तूफानों में तुम्हारी हिफाज़त करेंगे?

तुम ज़िंदगी में कई बार हारोगे लेकिन यदि तुम बार-बार कोशिश नहीं करोगे तो कामयाबी की चोटी पर पहुँचने के बाद के अहसास को खो दोगे. असफलता हमारी राह का वह पत्थर है जिसपर पैर रखकर हम कामयाबी के कुछ करीब पहुँच जाते हैं.

ज़िंदगी कोई रेस नहीं है

स्कूल, कॉलेज, और ऑफिस में तुम्हें पीछे धकेलनेवाले बहुतेरे लोग मिलेंगे. वे हमेशा महंगी कार, कपड़े, फोन, और बड़े घर के पीछे भागते रहेंगे. उनके लिए ज़िंदगी एक दौड़ है – उनके लिए ख़ुशी के मानी यह हैं कि वे अपने साथियों से ज्यादा खुश रह सकें.

और तुम जानते हो कि खुश रहने का रहस्य क्या है? ख़ुशी का रहस्य इसमें है कि ज़िंदगी कोई रेस नहीं है. ये एक यात्रा है. यदि तुम इस यात्रा में दूसरों को नीचा दिखाने, प्रभावित करने की कोशिश करोगे तो सिर्फ अपना वक़्त ही बर्बाद करोगे. इसके बजाय इस यात्रा को खुशमय बनाओ. इसे सीखने, बदलने, खुश रहने, और प्यार करने की यात्रा बनाना.

अच्छी कार, बड़ा घर, और कोई दूसरी दुनियावी चीज़… यहाँ तक कि ऊंची कमाई वाली नौकरी की भी ख्वाहिश नहीं करना. इनका मोल रत्ती भर भी नहीं है और ये तुम्हें सच्ची ख़ुशी नहीं दे सकतीं. इन सबको पा लेने से तुम्हारी ख्वाहिशें कम नहीं होंगी बल्कि बढ़ जाएँगी. तुम जितना हो उसमें ही संतुष्ट रहने की आदत डालना – जितना वक़्त तुम इन चीज़ों के पीछे भागने में लगाओगे उसे उस काम में लगाना जिसे करने से तुम्हें ख़ुशी मिले.

अपने शौक पूरे करना. उस नौकरी में खुद को मत झोंकना जिसका मकसद सिर्फ बिल चुकाना हो. जिन नौकरी को तुम नापसंद करो उसके लिए ज़िंदगी बर्बाद करने में कोई तुक नहीं है.

प्रेम ही एकमात्र नियम है

वह कौन सा एक शब्द है जिसके लिए तुम ज़िंदगी जियो? वह शब्द है ‘प्रेम’. शायद तुम्हें यह अजीब लगे पर यह एक शब्द ही जीवन का एकमात्र नियम है.

कुछ लोगों के लिए सफलता ही ज़िंदगी का कायदा होगी. उनकी ज़िंदगी बोझिल, नाखुश, और सतही होगी.

कुछ लोग खुद को ही हर चीज़ से बड़ा मानेंगे – वे चाहेंगे कि उन्हें ही हमेशा सब कुछ सबसे पहले मिले. उनकी ज़िंदगी में अकेलापन होगा, वे खुश नहीं रहेंगे.

और कुछ ऐसे भी होंगे जिनके लिए जिन्दगी नेकी का ही दूसरा नाम होगी. ऐसे लोग दूसरों को सच्चाई का रास्ता दिखायेंगे और अपनी बात को नहीं मानने वालों की निंदा करेंगे. यकीनन, वे दूसरों का भला चाहते हैं पर उनका तरीका निगेटिव है. अंततः वे अपनी नेकी के साथ ही अकेले पड़ जायेंगे. अपनी ही नेकी की गठरी ताज़िंदगी ढोते रहना दर्दनाक है.

तुम्हारे जीवन में बस प्रेम ही एकमात्र नियम हो. अपने माता-पिता, पत्नी, बच्चों, दोस्तों से दिल की गहराई से प्रेम करो. वे जो मांगे उन्हें दो. उनके प्रति रूखापन और कठोरता मत बरतो. उन्हें अपनी आत्मा में स्थान दो.

सिर्फ अपने परिजनों से ही नहीं बल्कि अपने पड़ोसियों, सहकर्मियों, और अजनबियों से भी प्रेमपूर्ण व्यवहार करो. मनुष्य होने के नाते सभी तुम्हारे भाई-बहन हैं. सभी से मुस्कुराते हुए मिलो. अपनी वाणी मधुर रखो. विनयशील बनो. मदद का हाथ बढ़ाओ.

सिर्फ अपने पड़ोसियों और अजनबियों से ही नहीं बल्कि अपने शत्रुओं से भी प्रेम करो. उससे भी प्रेम करो जिन्होंने तुम्हें चोट पहुंचाई हो, तुम्हारा दिल तोड़ा हो. उनकी आत्मा विदीर्ण है, उन्हें तुम्हारे प्रेम की ज़रुरत है.

और सबसे बढ़कर, खुद से प्रेम करो. दूसरे तुम्हारी आलोचना करें तो खुद के प्रति निर्ममता मत बरतो. यह कभी मत सोचो कि तुम बदसूरत या कमअक्ल या प्यार के काबिल नहीं हो… बल्कि यह सोचो कि तुम एक बेहतरीन इंसान हो और तुम्हारे हिस्से में भी बेपनाह खुशियाँ और प्रेम है. तुम जैसे हो वैसे ही खुद को प्रेम करो.

आखिर में, तुम्हें यह पता होना चाहिए कि मैं तुमसे प्रेम करता हूँ और हमेशा करता रहूँगा. तुम्हारी जीवनयात्रा बहुत अपरिमित, अस्पष्ट, और दुरूह होने जा रही है पर यह बड़ी विहंगम यात्रा है. मैं इस यात्रा में सदैव तुम्हारे साथ रहने का प्रयास करूंगा. ईश्वर तुम्हारा मार्ग प्रशस्त करे. शुभाशीष.

प्रेम,

तुम्हारे पापा.

हर जीवन अनमोल है

शाकाहार अपनाने और जीवहत्या रोकने संबंधित मिशन के बारे में जानने के लिए

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मुल्ला नसरुद्दीन इबादत की नई विधियों की तलाश में निकला. अपने गधे पर जीन कसकर वह भारत, चीन, मंगोलिया गया और बहुत से ज्ञानियों और गुरुओं से मिला पर उसे कुछ भी नहीं जंचा.

उसे किसी ने नेपाल में रहनेवाले एक संत के बारे में बताया. वह नेपाल की ओर चल पड़ा. पहाड़ी रास्तों पर नसरुद्दीन का गधा थकान से मर गया. नसरुद्दीन ने उसे वहीं दफ़न कर दिया और उसके दुःख में रोने लगा. कोई व्यक्ति उसके पास आया और उससे बोला – “मुझे लगता है कि आप यहाँ किसी संत की खोज में आये थे. शायद यही उनकी कब्र है और आप उनकी मृत्यु का शोक मना रहे हैं.”

“नहीं, यहाँ तो मैंने अपने गधे को दफ़न किया है जो थकान के कारण मर गया” – मुल्ला ने कहा.

“मैं नहीं मानता. मरे हुए गधे के लिए कोई नहीं रोता. इस स्थान में ज़रूर कोई चमत्कार है जिसे तुम अपने तक ही रखना चाहते हो!”

नसरुद्दीन ने उसे बार-बार समझाने की कोशिश की लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. वह आदमी पास ही गाँव तक गया और लोगों को दिवंगत संत की कब्र के बारे में बताया कि वहां लोगों के रोग ठीक हो जाते हैं. देखते-ही-देखते वहां मजमा लग गया.

संत की चमत्कारी कब्र की खबर पूरे नेपाल में फ़ैल गयी और दूर-दूर से लोग वहां आने लगे. एक धनिक को लगा कि वहां आकर उसकी मनोकामना पूर्ण हो गयी है इसलिए उसने वहां एक शानदार मज़ार बनवा दी जहाँ नसरुद्दीन ने अपने ‘गुरु’ को दफ़न किया था.

यह सब होता देखकर नसरुद्दीन ने वहां से चल देने में ही अपनी भलाई समझी. इस सबसे वह एक बात तो बखूबी समझ गया कि जब लोग किसी झूठ पर यकीन करना चाहते हैं तब दुनिया की कोई ताकत उनका भ्रम नहीं तोड़ सकती.

एकांत और रचनात्मकता

रचनात्मकता के लिए ‘एकांत’ अथवा ‘निजता’ का बड़ा महत्व है. विश्व इतिहास में अनेक महान रचनाशील चिन्तक, वैज्ञानिक, और कलाकार हुए हैं जिन्होंने एकांत के क्षणों में दुनिया को अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दिया. ऐसे ही कुछ महान व्यक्तियों जीवन और निजता पर उनके विचारों की बानगी आपके लिए प्रस्तुत है.

वोल्फगैंग अमेडियस मोज़ार्ट (Wolfgang Amadeus Mozart) – मोज़ार्ट उन्नीसवीं शताब्दी के महान शास्त्रीय संगीतकार थे. उन्होंने 600 से भी अधिक अमर धुनों की रचना की. पैंतीस वर्ष की अवस्था में ही उनका निधन हो गया.
“घोड़ागाड़ी के भीतर सफ़र करते समय, भोजन के बाद की सैर के वक़्त या नींद की तलाश में अपने बिस्तर पर मैं खुद के साथ, निपट अकेला और अपने में मगन रहता हूँ. यही वे क्षण हैं जब मेरे विचारों की श्रृंखला निर्बाध चलती है और रचनात्मकता फूट पड़ती है”.

* * *

अलबर्ट आइन्स्टीन – (Albert Einstein) – सैद्धांतिक भौतिकविद, दार्शनिक, और लेखक के रूप में विभूषित होने वाले विद्वान और बीसवीं शती के सबसे चर्चित और प्रभावशाली वैज्ञानिक. इन्हें आधुनिक भौतिकी का जनक भी कहते हैं.
“हांलांकि मैं नियत समय के अनुसार काम करता हूँ पर मुझे अचानक ही समुद्रतट पर अकेले लम्बी सैर पर चल  पड़ना अच्छा लगता है. उस समय मैं अपने भीतर हो रही हलचल को सुन सकता हूँ. जब मेरा काम नहीं बन रहा हो तब मैं उसे बीच में ही छोड़कर लेट जाता हूँ और छत को निहारता रहता हूँ. तब मेरी कल्पनाशक्ति मेरे समक्ष साकार हो उठती है. मैं उसे देख और सुन भी सकता हूँ.”

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फ्रेंज काफ्का (Franz Kafka) – बीसवीं शताब्दी के सर्वथा मौलिक रचनाकार थे. उनके लघु उपन्यासों और छोटी-छोटी कहानियों को आधुनिक साहित्य में बेजोड़ माना जाता है.
“तुम्हें अपना कमरा छोड़कर कहीं जाने की ज़रुरत नहीं है. अपनी टेबल पर बैठकर ध्यान से सुनते रहो. तुम्हें सुनने की ज़रुरत भी नहीं है – बस इंतजार करो… शांत और अचल रहने का प्रयास करो. यह दुनिया खुद-बखुद तुम्हारे सामने स्वयं को उजागर करेगी. इसके सामने और कोई विकल्प नहीं है…यह भावातिरेक में तुम्हारे पैरों पर उमड़ पड़ेगी.”
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निकोला टेस्ला (Nikola Tesla) – आविष्कारक और विद्युत के व्यापारिक उत्पादन के क्षेत्र में सर्वाधिक योगदान देनेवाले वैज्ञानिक. विद्युत चुम्बकत्व के क्षेत्र में उनकी खोज ने अनेक वैज्ञानिकों को प्रेरित किया.
“एकांत में हमारा मन केन्द्रित और स्पष्ट हो जाता है. निजता के क्षणों में मौलिकता उर्वर हो जाती है और इसपर बाहरी उद्दीपनों का प्रभाव नहीं पड़ता. कुछ पल अकेले रहकर देखिये – यही आविष्कारकों का रहस्य है. अकेले रहिये और अपने विचारों को जन्म लेते देखिये.”

* * *

जोज़फ़ हैडेन (Joseph Haydn) – ऑस्ट्रिया के संगीतज्ञ हैडेन ने अपना लगभग पूरा जीवन एक धनिक के निजी संगीतज्ञ के रूप में उनकी दूरस्थ रियासत पर व्यतीत किया. इस तरह उनपर दूसरे संगीतज्ञों और रचनाकारों का प्रभाव नहीं पड़ा. उन्हीं के शब्दों में – “मौलिक होना तो जैसे मेरी मजबूरी ही थी”.

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योहान वोल्फगैंग वोन गोथे (Johann Wolfgang von Goethe) – जर्मनी के बहुश्रुत लेखक. कविता, नाटक, धार्मिक साहित्य, दर्शन, और विज्ञान के विषयों पर उनका समान अधिकार था.
“सामाजिकता हमें सिखा सकती है पर निजता हमें प्रेरित करती है”.

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पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso) – बीसवीं शती के लम्बे कालखंड में अपनी विविध रचना शैलियों के कारण आधुनिक कला पर अपनी अभिनव छाप छोड़नेवाले कलाकार. उनकी क्रांतिकारी उपलब्धियों के कारण वे अत्यधिक सम्मानित और समृद्ध हुए. बीसवीं शती के संभवतः एकमात्र प्रतिनिधि कलाकार.
“गहन एकांत के बिना गंभीर कर्म कर पाना मुमकिन नहीं है”.

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थॉमस मान (Thomas Mann) – महान जर्मन उपन्यासकार, कथाकार, आलोचक, मानवतावादी, निबंधकार और 1929 के नोबल पुरस्कार विजेता. वे अपने लेखन में गहन प्रतीकों और विसंगतियों के चित्रण और मानव स्वभाव की परख करनेवाले साहित्यकार के रूप में प्रसिद्द हैं.
“एकांत के क्षणों में हमारे भीतर कुछ मौलिक उपजता है – जैसे अनजानी खूबसूरत या ध्वंसात्मक कविता.”

(A post on ‘Merits of Solitude’ from zenhabits)

मनुष्य की रचना

एक विराट सम्मलेन में बहुत से ज्ञानी जन ईश्वर और उसके द्वारा किये गए कार्यों पर चर्चा करने के लिए एकत्र हुए. एक सत्र में चर्चा का विषय यह था कि ईश्वर ने मनुष्य की रचना सृष्टि निर्माण के छठवें दिन क्यों की.

“पहले ईश्वर ने ब्रह्माण्ड को व्यवस्थित करने का निश्चय किया ताकि इसके सभी आश्चर्य हमारे लिए उपलब्ध हों” – एक ने कहा.

“पहले ईश्वर ने अन्य जीवों की रचना करके उनपर प्रयोग किये ताकि मनुष्यों की रचना करते समय किसी प्रकार की चूक न रह जाए” – दूसरे ने तर्क दिया.

सभा में एक बुद्धिमान यहूदी व्यक्ति भी आमंत्रित था. उससे भी यह पूछा गया – “ईश्वर ने छठवें दिन ही मनुष्य की रचना क्यों की? इस बारे में आपका दृष्टिकोण क्या है?”

“यह समझना तो बहुत सरल है!” – बुद्धिमान यहूदी ने कहा – “ईश्वर के मन में यह था कि जब कभी हम मनुष्य होने के घमंड से अकड़ जाएँ तब हमें यह बात नहीं भूलें कि एक मामूली मच्छर भी ईश्वरीय योजना में हमसे पहले वरीयता पर था.”

(यह तो एक कहानी ही है. परन्तु वास्तविकता में भी यही देखने में आया है कि पृथ्वी में मनुष्य के पदार्पण से भी पहले जीव-जंतुओं की लाखों-करोड़ों प्रजातियाँ पल्लवित होकर नष्ट हो चुकी हैं. मनुष्य को पूर्णरूपेण विकसित हुए अभी एक लाख वर्ष भी नहीं हुए हैं जबकि कॉकरोच पिछले पचास करोड़ वर्षों से बिना किसी परिवर्तन के उपस्थित हैं.)

शराबी शिष्य

एक ज़ेनगुरु के सौ शिष्य थे. उनमें से एक हमेशा नशे में रहता था जबकि बाकी शिष्य नियमानुसार प्रार्थना करते रहते थे.

ज़ेनगुरु बूढ़ा हो रहा था. कुछ गुणी शिष्यों के मन में यह प्रश्न उठने लगा कि आश्रम का अगला गुरु कौन बनेगा. गुरु की गद्दी पर बैठनेवाला शिष्य आश्रम की सदियों पुरानी रहस्यमयी गौरवशाली परंपरा का स्तम्भ बन जाता.

शरीर छोड़ने से पहले ज़ेनगुरु ने शराबी शिष्य को बुलाया और उसे गुप्त मन्त्रों से दीक्षित करके अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया.

इस घटना ने आश्रम में विद्रोह की स्थिति निर्मित कर दी.

“कितने शर्म की बात है!” – शिष्य चिल्ला रहे थे – “हमने अपना जीवन ऐसे गुरु को समर्पित कर दिया जो हमारे गुणों को नहीं देख पाया.”

बाहर कोलाहल की आवाज़ सुनकर मरते हुए ज़ेनगुरु ने कहा – “मैं गुप्त रहस्यों और मन्त्रों को उसी के सामने प्रकट कर सकता था जिसे मैं भली भांति जानता हूँ. मेरे सभी शिष्य सद्गुणी और योग्य हैं लेकिन इसके भी कई खतरे हैं क्योंकि सद्गुण बहुधा भीतरी लघुता, अहंकार और अनुदारता को ढँक देते हैं. यही कारण है कि मैंने केवल उसी शिष्य का चयन किया जिसे मैं बहुत अच्छे से जानता हूँ और उसके एकमात्र दोष ‘शराब पीना’ को देख सकता हूँ.”

(A zen story about a drunkard disciple)

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