बचपन – Childhood

कन्फ्यूशियस अपने शिष्यों के साथ लंबी यात्रा पर था. मार्ग में उसने किसी गाँव में रहनेवाले एक बुद्धिमान बालक के बारे में सुना. कन्फ्यूशियस उस बालक से मिला और उससे पूछा:

“विश्व में मनुष्यों के बीच बहुत असमानताएं और भेदभाव हैं. इन्हें हम किस प्रकार दूर कर सकते हैं?”

“लेकिन ऐसा करने की आवश्यकता ही क्या है?”, बालक ने कहा, “यदि हम पर्वतों को तोड़कर समतल कर दें तो पक्षी कहाँ रहेंगे? यदि हम नदियों और सागर को पाट दें तो मछलियाँ कैसे जीवित रहेंगीं? विश्व इतना विशाल और विस्तृत है कि इन असमानताओं और विसंगतियों का उसपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता.”

कन्फ्यूशियस के शिष्य बालक की बात सुनकर बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने बालक की भूरि-भूरि प्रशंसा की. लेकिन कन्फ्यूशियस ने कहा:

“मैंने ऐसे बहुत से बच्चे देखे हैं जो अपनी अवस्था के अनुसार खेलकूद करने और बालसुलभ गतिविधियों में मन लगाने की बजाय दुनिया को समझने की कोशिश में लगे रहते हैं. और मैंने यह पाया कि उनमें से एक भी प्रतिभावान बच्चे ने आगे जाकर अपने जीवन में कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं किया क्योंकि उन्होंने अपने बचपन की सरलता और सहज अनुत्तरदायित्व का कोई अनुभव नहीं किया.


 

Confucius was travelling with his disciples when he learned that a very intelligent boy lived in a certain village. Confucius went there to talk to him and asked:

“What if you helped me put an end to inequality?

“Why put an end to inequality?” asked the boy. “If we flatten the mountains, the birds will no longer have shelter. If we put an end on the depth of the rivers and oceans, all fish will die. If the chief of the village has the same authority as the fool, no one will understand one another right. The world is very vast, let us keep its differences.”

The disciples left very impressed with the boy’s wisdom. As they were already on their way to another city, one of them said all children should be like that.

“I have met many children who instead of playing and doing things of their age, sought to understand the world,” said Confucius. “And none of these precocious children was able to something important later, because they never experienced innocence and the healthy irresponsibility of childhood.”

About these ads

19 Comments

Filed under Tao Stories

ख़ुशी, संतोष, और कामयाबी

sanjay sinhaसंजय सिन्हा पेशे से पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं. फेसुबक पर उनके लंबे स्टेटस जिंदगी और उससे जुड़े मसलों पर संजीदगी से सोचने को मजबूर करते हैं. उन्हें पढ़ने पर यह अहसास गहरा होता है कि अपनी तमाम दुश्वारियों और लाचारियों के बावजूद हमारी ज़िंदगी और ये दुनिया यकीनन बहुत सुंदर है. प्यार, पैसा और हर तरह की ऊंच-नीच के दुनियावी मसले सदा से कायम हैं और कायम रहेंगे… ज़िंदगी और वक्त ऐसी शै हैं जिनपर आप ऐतबार नहीं कर सकते… न जाने कब ये मुठ्ठी में बंद रेत की मानिंद बिखर जाएं. इसलिए अपनी अच्छाइयों को बरक़रार रखकर छोटे-छोटे लम्हों से खुशी चुराने की बात कहते हुए संजय अपने अनुभवों को साफ़गोई से बहुत रोचक अंदाज़ में बयां करते हैं. इन्हें पढ़कर आपको यकीनन बहुत अच्छा लगेगा.

संजय सिन्हा जी की अन्य पोस्टें पढ़ने के लिए पोस्ट के नीचे दिए गए टैग पर क्लिक करें.


cornelia kopp photo

जिन दिनों मैं जनसत्ता में नौकरी करता था और मेरी शादी नहीं हुई थी उन दिनों मेरे साथी अक्सर मुझसे पूछा करते थे कि तुम बेवजह इतना खुश क्यों रहते हो? हर बात पर हंसते हो और ऐसा लगता है कि तुम्हें दूसरों की तुलना में अधिक सैलरी मिलती है.

उन दिनों मैं बतौर उप संपादक नया-नया नौकरी पर आया ही था, और यकीनन मेरी सैलरी वहां मुझसे पहले से काम कर रहे लोगों से कम ही रही होगी. खैर, किसकी सैलरी कितनी थी ये मुझे ठीक से तब भी पता ही नहीं चला और आज भी नहीं पता. मुझे हमेशा लगता है कि जितने पैसों की मुझे जरुरत है, उतना पैसा मेरे पास होना चाहिए. इसलिए मेरी हंसी और मेरी खुशी की वजह किसी को सैलरी लगी, किसी को मेरा तनाव रहित जीवन लगा, किसी को मेरा खिलंदड़पन लगा और किसी को लगा कि मैं ज़िंदगी को सीरियसली नहीं लेता.

इतना पक्का है कि मैं दफ्तर जाता तो मस्ती, चुटकुले और ठहाके मेरे साथ ही दफ्तर में घुसते और चाहे-अनचाहे दिन भर की खबरों का तनाव, कइयों के घरेलू कलह कुछ समय के लिए काफूर हो जाते और अक्सर मेरे तत्कालीन बॉस हमसे कहा करते कि यार इतनी जोर जोर से मत हंसा करो, लोग बेवजह दुश्मन बन जाएंगे. वो मुझे समझाया करते कि लोग अपने दुख से कम दूसरों की खुशी से ज्यादा तकलीफ में आते हैं, इसलिए तुम जरा संभल कर रहा करो.

खैर, मैं दस साल जनसत्ता में रहा और एक दिन भी खुद को संभाल नहीं पाया. काम के समय काम और बाकी समय फुल मस्ती. मेरा मानना है कि खुश रहना असल में एक आदत है. ऐसा नहीं है कि खुश रहने वाले की जिंदगी में दुखी रहने वाले की तुलना में कम समस्याएं होती हैं. मैंने ही लिखा है कि बचपन में मां को खो देने वाला मैं, भला जीवन के किस सिद्धांत के तहत खुश रह सकता था, लेकिन फिर यही सोच कर मन को मनाता रहा कि मां जितनी तकलीफ में थी उस तकलीफ से तो उसे मुक्ति मिल गई. और उसकी मुक्ति को अपने अकेलेपन पर मैंने हावी नहीं होने दिया और खुश रहने लगा.

इतना तो मैं दस या बारह साल में समझ गया था कि ज़िंदगी सचमुच उतनी बड़ी होती नहीं है, जितनी बड़ी लगती है. वक्त उतना होता नहीं है, जितना नजर आता है. मैं ये भी समझ गया था कि कोई नहीं जानता कि जिंदगी में कल क्या होगा. कोई ये भी नहीं जानता कि आखिर में इस ज़िंदगी के होने का अर्थ ही क्या है? जब मन में इतनी बातें समा गई तो फिर ज़िंदगी एक सफर ही लगने लगा, एक ऐसा सफर जिसमें सचमुच कल क्या हो, नहीं पता. और उसी समय से मैं खुश रहने लगा. बीच-बीच में मैं भी विचलित हुआ, लेकिन फिर मन को मना लेता. दुख के तमाम पलों में भी खुशी तलाशने को अपनी आदत बनाने लगा.

मेरी खुश रहने की इसी आदत से जुड़ा एक वाकया आपको बताता हूं. जिन दिनों मैं कॉलेज में पढ़ता था, पिताजी के पेट का ऑपरेशन हुआ था, और अस्पताल के जिस कमरे में उन्हें रखा गया था उसी कमरे में रह कर मैं पिताजी की देखभाल करता था. एक दिन पिताजी सो रहे थे, और मेरा एक दोस्त मुझसे मिलने आया था. हम दोनों दोस्त बैठ कर एक दूसरे को चुटकुले सुना रहे थे. हमें ध्यान नहीं रहा कि पिताजी कब जाग गए हैं, और हमारी बातें सुन रहे हैं. किसी चुटकुले पर अचानक वो जोरों से हंसने लगे. इतनी ज़ोर से कि नर्स अंदर चली आई. उसे लगा कि पिताजी को दर्द उठ आया है. डॉक्टर कमरे में आ गए. सबने देखा कि हम तीनों जोर जोर से हंस रहे हैं. डॉक्टर तो आते ही हम पर पिल पड़ा. कहने लगा, “आप लोग मरीज की जान ले लेंगे. इतनी जोर से पागलों की तरह हंसे जा रहे हैं.”

डॉक्टर ने हमें कमरे से निकाल दिया. पिताजी को अभी अस्पताल में रहना था, लेकिन मैंने देखा कि पिताजी अपना डिस्चार्ज सर्टिफिकेट खुद ही बनवाने के लिए उठ गए थे. उन्होंने कहा, “आपकी दवाइयों से ज्यादा मुझे इस हंसी की जरुरत है और आप वही छीन लेंगे तो फिर मैं जल्दी कैसे ठीक होउंगा?”

हमें दुबारा कमरे में बुलाया गया. डॉक्टर थोड़ा ठंडा पड़ चुका था. हम दोनों दोस्त अंदर गए तो डॉक्टर ने पूछा, “आपने ऐसी कौन सी बात कही थी जो सब के सब इतनी जोर से हंस रहे थे?”

मैंने डॉक्टर से कहा कि आप एक मिनट बैठिए. एक चुटकुला सुनिए. फिर मैंने उसे ये चुटकुला सुनायाः

“एक बार एक आदमी पागलखाने के पास से गुजर रहा था कि उसकी गाड़ी पंचर हो गई. उसने वहीं अपनी गाड़ी खड़ी की और उसका पहिया खोल कर बदलने की कोशिश करने लगा. तभी पागलखाने की खिड़की से झांकता हुआ एक पागल उस आदमी से पूछ बैठा, “भैया आप क्या कर रहे हो?”

आदमी ने पागल की ओर देखा और मुंह बना कर चुप रह गया. उसने सोचा कि इस पागल के मुंह क्या लगना? उसने उस पहिये के चारों स्क्रू खोल दिए, और टायर बदलने ही वाला था कि कहीं से वहां भैंसों का झुंड आ गया. वो आदमी वहां से भाग कर किनारे चला गया. जब भैंसे चली गईं तो वह दुबारा गाड़ी के पास आया कि टायर बदल ले. जब वो वहां पहुंचा तो उसने देखा कि जिस पहिए को उसने खोला था उसके चारों स्क्रू गायब हैं. वो बड़ा परेशान हुआ. उसकी समझ नहीं पा रहा था कि अब वो क्या करे. पहिया खुला पड़ा था, चारों स्क्रू भैंसों की भगदड़ में गायब हो गए थे.

वो परेशान होकर इधर-उधर तलाशने लगा. तभी खिड़की से फिर उसी पागल ने पूछा कि भैया क्या हुआ? परेशान आदमी ने झल्ला कर कहा, “अरे पागल मैंने पहिया बदलने के लिए चारों स्क्रू बाहर निकाले थे अब मिल नहीं रहे. क्या करूं समझ में नहीं आ रहा, ऊपर से तुम सिर खा रहे हो.”

उस पागल ने वहीं से कहा, “भैया स्क्रू नहीं मिल रहे तो कोई बात नहीं. आप बाकी तीनों पहियों से एक एक स्क्रू निकाल कर चौथे पहिए को तीन स्क्रू लगाकर टाइट कर लीजिए और फिर गैराज जाकर नए स्क्रू लगवा लीजिएगा. ऐसे परेशान होने से तो कुछ नहीं होने वाला.”

आदमी चौंका. बात तो पते की थी. चार की जगह तीन स्क्रू पर गाड़ी चल जाती. उसने पागल की ओर देखा और कहा, “यार बात तो तुमने ठीक कही है, लेकिन बताओ जब तुम इतने समझदार हो तो यहां पागलखाने में क्या कर रहे हो?”

पागल ने वहीं से जवाब दिया, “भैया, मैं पागल हूं, मूर्ख थोड़े ही हूं?”

डॉक्टर ने चुटकुला सुना और जोर जोर से ठहाके लगाने लगा. फिर उसने कहा, “गॉल ब्लैडर के ऑपरेशन के बाद कोई मरीज अगले दिन दर्द से कराहने की जगह इतना हंस पड़े ये तो कमाल ही है.”

अपने तमाम गमों के बीच भी मैं ऐसे ही हंसी तलाशता रहा. खुशी तलाशता रहा. संतोष तलाशता रहा. आखिर में मैं इसी नतीजे पर पहुंचा कि संतुष्ट होना कामयाब होने से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है. कामयाबी का पैमाना दूसरे तय करते, जबकि संतोष का पैमाना आपके पास होता है. संतोष का पैमाना दिल होता है. कामयाबी खुशी की गारंटी नहीं होती, लेकिन संतुष्ट होना खुशी की गारंटी देता है. इसीलिए उस दिन अस्पताल में डॉक्टर ने हमें भले शुरू में पागल कहा, पर इतना तो वो भी समझ गया था कि ये मूर्ख नही हैं, और जो मूर्ख नहीं होते वो कामयाबी के पीछे नहीं भागते, वो खुशियों को गले लगाते हैं.

कामयाबी के पीछे भागने वाले अक्सर भागते रहते हैं, और जीवन भर अपनी गाड़ी के पहिए को फिट करने के लिए खोए हुए स्क्रू को तलाशते रहते हैं. जो समझदार होते हैं, वो बाकी पहियों से एक-एक स्क्रू लेकर आगे बढ़ चलते हैं.

4 Comments

Filed under प्रेरक लेख

बूढा और बेटा – An Old Man & His Son

crowएक बहुत बड़े घर में ड्राइंग रूम में सोफा पर एक 80 वर्षीय वृद्ध अपने 45 वर्षीय पुत्र के साथ बैठे हुए थे। पुत्र बहुत बड़ा विद्वान् था और अखबार पढने में व्यस्त था।

तभी कमरे की खिड़की पर एक कौवा आकर बैठ गया।

पिता ने पुत्र से पूछा – “ये क्या है?”

पुत्र ने कहा – “कौवा है”।

कुछ देर बाद पिता ने पुत्र से दूसरी बार पूछा – “ये क्या है?”

पुत्र ने कहा – “अभी दो मिनट पहले तो मैंने बताया था कि ये कौवा है।”

ज़रा देर बाद बूढ़े पिता ने पुत्र से फ़िर से पूछा – “ये खिड़की पर क्या बैठा है?”

इस बार पुत्र के चेहरे पर खीझ के भाव आ गए और वह झल्ला कर बोला – “ये कौवा है, कौवा!”

पिता ने कुछ देर बाद पुत्र से चौथी बार पूछा – “ये क्या है?”

पुत्र पिता पर चिल्लाने लगा – “आप मुझसे बार-बार एक ही बात क्यों पूछ रहे हैं? चार बार मैंने आपको बताया कि ये कौवा है! आपको क्या इतना भी नहीं पता! देख नहीं रहे कि मैं अखबार पढ़ रहा हूँ!?”

पिता उठकर धीरे-धीरे अपने कमरे में गया और अपने साथ एक बेहद फटी-पुरानी डायरी लेकर आया। उसमें से एक पन्ना खोलकर उसने पुत्र को पढने के लिए दिया। उस पन्ने पर लिखा हुआ था:

“आज मेरा तीन साल का बेटा मेरी गोद में बैठा हुआ था तभी खिड़की पर एक कौवा आकर बैठ गया। उसे देखकर मेरे बेटे ने मुझसे 23 बार पूछा – पापा-पापा ये क्या है? – और मैंने 23 बार उसे बताया – बेटा, ये कौवा है। – हर बार वो मुझसे एक ही बात पूछता और हर बार मैं उसे प्यार से गले लगाकर उसे बताता – ऐसा मैंने 23 बार किया।”

(~_~)

An 80 year old man was sitting on the sofa in his house along with his 45 years old highly educated son. Suddenly a crow perched on their window.

The father asked his son, “What is this?”

The son replied “It is a crow”.

After a few minutes, the father asked his son the 2nd time, “What is this?”

The son said “father, I have just now told you “It’s a crow”.

After a little while, the old father again asked his son the 3rd time,

What is this?”

At this time some expression of irritation was felt in the son’s tone when he said to his father with a rebuff. “It’s a crow, a crow, a crow”.

A little after, the father again asked his son the 4th time, “What is this?”

The son lost his temper and shouted at his father, “Why do you keep asking me the same question again and again, although I have told you so many times ‘IT IS A CROW’. Are you not able to understand this?”

A little later, the father went to his room and came back with an old tattered diary, which he had maintained since his son was born. He opened a page and asked his son to read that page. When the son read it, the following words were written in the diary :-

“Today my little son aged three was sitting with me on the sofa, when a crow was sitting on the window. My son asked me 23 times what it was, and I replied to him all 23 times that it was a crow. I hugged him lovingly each time he asked me the same question again and again for 23 times. I did not at all feel irritated I rather felt affection for my innocent child”. 

4 Comments

Filed under Stories

शेर और हाथी – A Story of a Lion and an Elephant

9709721541_25a72be2e7_z

एक शेर जंगल में किसी संकरी जगह से गुज़र रहा था. उसने सामने से एक हाथी को अपनी ओर आते देखा तो गरज कर कहा, “मेरे रास्ते से हट जाओ”.

“मैं? मैं हट जाऊं?”, हाथी ने जवाब दिया, “मैं तुमसे बहुत बड़ा हूं और कायदे से मुझे यहां से पहले निकलना चाहिए. मेरी बजाए तुम्हारे लिए किनारे लगना ज्यादा आसान है”.

“लेकिन मैं इस जंगल का राजा हूं और तुम्हें अपने राजा को आता देख उसके लिए रास्ता छोड़ देना चाहिए”, शेर ने गुस्से से कहा, “मैं तुम्हें रास्ते से हटने का हुक्म देता हूं”.

यह सुनकर हाथी ने अपनी सूंड से शेर को उठा लिया और उसे जमीन पर कई बार पटका. फिर उसने शेर को एक पेड़ के तने पर दे मारा और उसे सर के बल गिरा दिया.

शेर किनारे पर पड़ा कराहता रहा और हाथी उसके बगल से अपने रास्ते चला गया. शेर जैसे-तैसे कुछ ताकत सहेजकर खड़ा और चिल्लाकर बोला, “इसमें इतना नाराज़ होने की कौन सी बात थी”!

(~_~)

A Lion was walking down a small trail in the jungle when he came upon an Elephant whom was going the opposite direction. “Move out of my way so that I may pass.” Bellowed the Lion.

“Me, move?” The Elephant replied. ” I am larger and should have the right of way. It is easier for you to move aside than I.”

“But I am the King of the jungle. It is you who should move aside for your king.” The lion replied. “So I command you to move.” With this the Elephant reached out with his long trunk and picked up the Lion. He pounded the Lion into the ground several times and then banged him against a tree then dropped him on his head.

With the Lion dazed and laying to the side, the Elephant then passed and began walking away, down the small trail. The Lion regained himself and shouted, “Well, you didn’t have to get mad about it.”

2 Comments

Filed under Stories

जिंदगी की U ट्यूब

sanjay sinhaसंजय सिन्हा पेशे से पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं. फेसुबक पर उनके लंबे स्टेटस जिंदगी और उससे जुड़े मसलों पर संजीदगी से सोचने को मजबूर करते हैं. उन्हें पढ़ने पर यह अहसास गहरा होता है कि अपनी तमाम दुश्वारियों और लाचारियों के बावजूद हमारी ज़िंदगी और ये दुनिया यकीनन बहुत सुंदर है. प्यार, पैसा और हर तरह की ऊंच-नीच के दुनियावी मसले सदा से कायम हैं और कायम रहेंगे… ज़िंदगी और वक्त ऐसी शै हैं जिनपर आप ऐतबार नहीं कर सकते… न जाने कब ये मुठ्ठी में बंद रेत की मानिंद बिखर जाएं. इसलिए अपनी अच्छाइयों को बरक़रार रखकर छोटे-छोटे लम्हों से खुशी चुराने की बात कहते हुए संजय अपने अनुभवों को साफ़गोई से बहुत रोचक अंदाज़ में बयां करते हैं. इन्हें पढ़कर आपको यकीनन बहुत अच्छा लगेगा.


alice popkorn photo

इस संसार में बहुत से लोग ईश्वर को मानते हैं. बहुत से लोग नहीं मानते. बहुत से लोग कहते हैं उन्हें नहीं पता. बहुत से लोग आधा मानते हैं, आधा नहीं मानते. बहुत से लोग सिर्फ इतना मानते हैं कि ईश्वर नहीं है लेकिन कोई शक्ति है.

मैं ईश्वर के बारे में कुछ भी कह पाने वाला कोई नहीं हूं. मैंने ईश्वर को नहीं देखा है, फिर भी बहुत से लोगों की इस दुविधा पर मैं अपनी एक राय रखना चाहता हूं. ये राय मैं उन लोगों के लिए रखना चाहता हूं, जो ईश्वर पर सिर्फ इसलिए यकीन नहीं करना चाहते क्योंकि वो उसकी पूजा करते हैं, उसकी उपासना करते हैं, मगर वो उन्हें अपनी मौजूदगी का अहसास नहीं कराता. ये राय मैं उन लोगों के लिए लिखना चाहता हूं जिन्हें अच्छे कर्मों के बदले अच्छा मिलने और बुरे कर्मों के बदले बुरा मिलने वाली बात पर संदेह है. यकीनन जो लोग ऐसा सोचते हैं, उनके पास अपने अनुभव भी होंगे. आप में से तमाम लोगों ने कभी अच्छे काम किए होंगे, कोई पुण्य किया होगा फिर भी आपको उसके बदले में बुराई मिली. आपके पास तमाम वे उदाहरण भी होंगे ही जिनमें आपके जानने वाले ने कोई गलत काम किया, पाप किया पर उसकी ज़िंदगी में अच्छा ही अच्छा होता चला गया. ऐसे उदाहरण अक्सर हमें गुमराह करते हैं.

ऐसे उदाहरण हमें ये मानने को मजबूर करते हैं कि इस बात की गारंटी नहीं है कि पाप करने का अंजाम बुरा होगा और पुण्य करने के बदले में भला होगा.

मैं कहता हूं कि इस बात की गारंटी है. आप जो कर्म करेंगे उसका प्रतिफल वैसा ही मिलेगा. और सिर्फ समझाने के लिए मैं आपके सामने एक उदाहरण पेश करने जा रहा हूं, जिसे मैंने इक्का-दु्क्का अब तक अपने मित्रों से ही साझा किया था.

आप मान लीजिए जब बच्चा पैदा होता है, उसकी जिंदगी एक यू ट्यूब (U) की तरह होती है. अब U आकार के इस हिस्से में आधा ‘अच्छा’ भरा है और आधा ‘बुरा’. इसे आप चाहें तो आधा पुण्य कह लीजिए और आधा पाप. आप इसे आधा पॉजीटिव कह लीजिए या आधा निगेटिव.

ये अच्छा और बुरा जन्म के साथ जुड़ कर आपके साथ आया है. अब आप जब कोई अच्छा काम करते हैं, तो U आकार के इस ट्यूब के आधे हिस्से में अच्छाई भरे होने वाले छोर से इसके भीतर अच्छाई जाती है. जब उसमें थोड़ी अच्छाई अंदर जाती है तो दूसरी तरफ से उतनी ही बुराई बाहर निकलती है. क्योंकि U ट्यूब पूरी तरह से भरी हुई और उसमें कुछ और भरने की जगह ही नहीं है. इसलिए इसके एक छोर से उसमें अच्छाई भीतर जाने पर  दूसरी तरफ से बुराई बाहर निकल गई.

फिर कभी आपको लगा, हे भगवान! हमने तो भला किया लेकिन हमारे साथ ये बुरा क्यों हो गया?

अब मान लीजिए कि आपने किसी का बुरा कर दिया. आपके U ट्यूब के दूसरे छोर से उसमें बुराई घुसी और दूसरी ओर से लबालब भरी अच्छाई में से थोड़ी सी अच्छाई बाहर निकल गई. आपको लगा, ये हुई न बात! ईश्वर नहीं है. कर्म कुछ नहीं है. देखो मैंने तो पाप किया लेकिन मेरा भला हुआ.

फिर आप लगातार बुरा करते जाते हैं. और अधिक बुराई उस ट्यूब में अंदर जाती रहती है, और अच्छाई बाहर आती रहती है. आप रिश्वत लेते रहते हैं, आप चोरी करते रहते हैं, आप व्यभिचार करते रहते हैं और आपका जीवन लगातार जगमग रोशनी से चमकता रहता है. एक दिन सारी अच्छाई उस ट्यूब से निकल जाती है. इसके बाद उस ट्यूब से जो कुछ भी बाहर निकलता है, वो सिर्फ और सिर्फ बुरा निकलता है. जिस दिन उस यू ट्यूब से सारी अच्छाई निकल जाती है, उस दिन आप चाहे चमचमाती मर्सिडीज़ कार में चलते रहे होंगे, चाहे आप खुद सरकार ही क्यों न हों, एक दिन आपका ही भाई आता है और अपनी बंदूक की सारी गोलियां आपके सीने में उतार देता है.

क्यों? सब कुछ तो इतना अच्छा चल रहा था! आज भाई का दिमाग फिर क्यों गया?

नहीं समझे? अरे भाई, अपने बड़े बुजुर्ग इसी को तो कहते थे कि पाप का घड़ा भर गया.

एक वाकया सुनाता हूं आपको. भोपाल में मेरे घर के टॉयलेट को साफ करने वाली एक महिला, दो वक्त की रोटी को तरसने वाली एक महिला अपने अच्छे कर्म को नहीं छोड़ती. उसे गरीबी मंजूर है, लेकिन गलत काम नहीं. जिस ईश्वर ने उसे कुछ नहीं दिया उस पर उसका इतना भरोसा है कि बिना उसकी तस्वीर को प्रणाम किए वो कोई काम ही नहीं करती. एक दिन बाथरूम में उसे हीरे की एक अंगूठी मिलती है, तो उसे धो कर वापस कर देती है. मैंने उससे पूछा भी कि ‘क्या तुम्हें पता है, ये अंगूठी कितने की होगी?’ उसने कहा ‘दाम तो नहीं पता साहब लेकिन बहुत महंगी होगी. सोना और हीरा तो महंगे ही होते हैं’. मैंने पूछा, ‘तुम्हारे मन में क्या ऐसा नहीं आया कि बाथरूम में गिरी चीज न भी मिले तो कोई तुम पर शक नहीं ही करता. तुम इसे अपने पास ही रख सकती थीं.’ उसने दोनों कानों को हाथ लगाया और कहा, ‘साहब पिछले जन्म की गलतियों के बाद तो आज इस जन्म में ये गरीबी देख रही हूं, अभी भी नहीं चेती तो अगले कई जन्मों का चक्र बिगड़ जाएगा. इस पर कहीं तो रोक लगानी ही होगी.’

मेरे घर के टॉयलेट साफ करने वाली उस महिला को मैंने मन-ही-मन प्रणाम किया. एक दिन वो मेरे ही पास यह कहने के लिए आई कि उसकी बेटी दसवीं में पढ़ती है और मैं उसे कुछ पढ़ा दूं ताकि वो हाई स्कूल ठीक से पास हो जाए. मैं उस लड़की से मिला. मुझे वो मेधावी लगी. मैंने उसे अपने एक शिक्षक के पास भेज दिया.

लड़की प्रथम श्रेणी से पास हुई. फिर उसका परिचय भोपाल में ही एक रूसी अध्ययन संस्थान की अपनी एक टीचर से मैंने करा दिया. ये बात तब की है जब रूस का विघटन नहीं हुआ था. 1987 में उस लड़की ने रूसी भाषा में पढ़ाई शुरू कर दी. फिर उसे सोवियत संघ में कोई स्कॉलरशिप मिली. जिस लड़की ने कभी ट्रेन को नहीं देखा था, वो एक शाम मालवा एक्सप्रेस से भोपाल से दिल्ली आई और दिल्ली से एयरोफ्लोत एयर लाइंस से मॉस्को पहुंची. वहां वह कुछ पढ़ने लगी. मैं जिन दिनों मॉस्को गया था वो मुझसे मिली थी.

फिर सोवियत संघ का विघटन हो गया. वहां पढ़ने के लिए गए बहुत से लोग शराबी-कबाबी बन कर रह गए और अय्याशी करके वापस आ गए. लेकिन वो लड़की वहीं रही. उसने बदलते हुए रूस के साथ खुद को ढाल किया. आज वह मॉस्को में बहुत बड़ा व्यापार समूह संभाल रही है. दुनिया भर की यात्रा करती है. कोई साल भर पहले उसके बारे में पता किया था तो पता चला कि उसकी मां, जो हमारे घर काम करती थी वो बेटी के पास चली गई. कोई बता रहा था कि भोपाल के अरेरा कॉलोनी में उसका बहुत बड़ा बंगला है. दिल्ली-मुंबई में तो है ही. सिंगापुर और पता नहीं कहां-कहां है.

कुछ समझे आप? उस औरत ने अच्छाई का दामन नहीं छोड़ा. उसने पुण्य का दामन नहीं छो़ड़ा. उसने ईश्वर की उंगली नहीं छो़ड़ी. उसके U ट्यूब में एक-एक कर ढेरों पुण्य समाते गए और दूसरी छोर से एक-एक कर सारे पाप निकल गए. जिस दिन सारे पाप निकल गए, U ट्यूब के पास निकालने को सिर्फ ‘गुड’ ‘गुड’ ‘गुड’ ही रह गया.

इसे ही गंवई भाषा में पाप और पुण्य का कुंड कहते हैं. ईश्वर ने भी खुद को किसी आकार में परिभाषित नहीं किया है. अगर गीता को ईश्वर का कथन मान लें तो उसने यही तो कहा है कि मैं तुम-में ही हूं. उसने भी तो कर्म करने की बात ही कही है. यह ईप पर निर्भर करता है कि आप कितने दिनों तक अपने दुख को सहते हुए पुण्य के खाते को बढ़ाना चाहते हैं. आप पर ही यह भी निर्भर करता है कि कितने दिनों तक पाप करते हुए आप अपने पुण्य के बैलेंस को खत्म करके दुख को बार-बार झेलना चाहते हैं.

ये मत भूलिए कि सबकी मंजिल एक है. अज्ञानी अंधविश्वास के सहारे वहां पहुंचते हैं और ज्ञानी तर्क के सहारे. जो बच्चे सुबह सुबह अपने मम्मी-पापा को, दादा-दादी को, नाना-नानी को गुड मॉर्निंग कहते हैं वो उनके ज्यादा प्यारे तो होते ही हैं, जो बच्चे सुबह उठ कर अपने मां-बाप को, सास-ससुर को कोसते हैं उन्हें तो वो भी कोसेंगे ही. फिर आप ईश्वर की पूजा कर ही लेंगे तो क्या नुकसान है? ईश्वर हो या न हो, लेकिन आपके जुड़े हुए हाथ, मुंह से निकले ‘थैंक यू’ के दो शब्द किसी को बुरे नहीं लगते, फिर मूर्ति को वे क्यों बुरे लगेंगे?

मैं फिर दुहरा रहा हूं… ईश्वर है या नहीं ये मैं नहीं जानता. लेकिन आपके कर्मों का फल आपके ही सामने होगा इसमें आप संदेह मत कीजिएगा. आपके कम्यूटर में वायरस होगा, आपके कम्यूटर का प्रोसेसर सुस्त होगा, लेकिन उसका कम्यूटर बहुत शानदार है. मर्जी आपकी. अगर कण कण में भगवान है तो मैं किसी भी कण को नहीं छोड़ना चाहता, ना मूरत वाले कण को, ना सूरत वाले कण को. मैं भी अपने घर के टॉयलेट को साफ करने वाली उस महिला की तरह अभी ही चेत कर अपने पिछले जन्मों और इस जन्म में किए सारे पापों के चक्र को पूरा कर मुक्त होना चाहता हूं. क्या पता मेरे लिए भी एक मॉस्को, ऊपर ही सही, मेरा इंतजार कर रहा हो.

7 Comments

Filed under प्रेरक लेख