एक मुर्गी खेत में बैल से बातें कर रही थी. वह बोली, “मैं उस पेड़ की ऊंची टहनी तक पहुंचना चाहती हूं, लेकिन मुझमें इतनी ताकत नहीं है.”
बैल ने कहा, “तुम्हें पता है, हमारे गोबर में बहुत पौष्टिक तत्व होते हैं. तुम इसे थोड़ा-थोड़ा रोज़ खाओगी तो तुममें ताकत आ जाएगी”.
मुर्गी ने गोबर में चोंच मारकर देखा और उसे यह वाकई पौष्टिक लगा. उसमें थोड़ी ताकत आ गई और वह पेड़ की निचली टहनी तक पहुंच गई.
अगले दिन उसने फिर थोड़ा गोबर चखा और वह पेड़ की दूसरी शाखा तक पहुंच गई.
गोबर खाते-खाते चार-पांच दिनों के भीतर मुर्गी में इतनी जान आ गई कि वह पेड़ की सबसे ऊपरी शाखा पर चढ़ बैठी. बदकिस्मती से किसान ने उसे कोई बुरी चिड़िया समझकर गोली से उड़ा दिया.
इस छोटी सी कहानी से मिलनेवाली सीख बहुत रोचक है जिसे नीचे मूल अंग्रेजी में पढ़ना ही सही होगा 🙂
Moral of the story: Bullshit might get you to the top, but it won’t keep you there.
बहुत बढ़िया …जो गोबर खाकर ऊपर चढ़ेगा उसका यही हश्र होगा.
अब समझ में आया कि ब्राह्मणों की ऐसी तैसी क्यों हुई पंचामृत में गोबर भी होता है
सुन्दर बोधकथा है हालांकि सुब्रमणियन जी के जातिवादी पूर्वाग्रह को पचा नहीं पा रहा सो उल्टी कर रहा हूँ…आ..आ..उ..ल़्टी ।
सुब्रमण्यम जी पंचामृत में गोबर नहीं पड़ता. दूध, दही, शहद, घी और गन्ने के रस से बने प्रसाद को पंचामृत कहते हैं और आजकल ऐसा पंचामृत कोई नहीं बनाता.
गाय के दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर का पानी को सामूहिक रूप से पंचगव्य कहा जाता है. आयुर्वेद में इसे औषधि की मान्यता है और कई मांगलिक कार्य इनके बिना पूरे नहीं होते.
shandar
सुन्दर कथा ,सुन्दर सबक
हा हा हा हा…
पंचामृत में गोबर… इसे डिस्क्लोज नहीं करना चाहिए, वरना सभी टॉप पर आ जाएंगे… 😉
गलत तरीकों दं़ारा जिंदगी में कुछ लोग चालाकी से धन बना कर ऊँचाईयों तक जगह बना तो लेते हैं॰पर प्भु कृपा बिन वहँापर टिकना असंभव है।