जिम्मेदारियां : Responsibilities

रेगिस्तान को पार करने के बाद एक युवक सीटा मॉनेस्ट्री पहुँचने में सफल हो गया. उसने महंत के सत्संग में भाग लेने की अनुमति मांगी.

उस दिन दोपहर में महंत ने खेती-किसानी से जुड़ी काम की बातों पर चर्चा की.

चर्चा की समाप्ति होने के बाद युवक ने एक साधू से कहा:

“यह सब बहुत अजीब है. मैं तो यहाँ इस उम्मीद से आया था कि मुझे पाप और पुण्य के बारे में ज्ञानवर्धक प्रवचन सुनने को मिलेंगे, लेकिन महंत ने तो टमाटर उगाने, सिंचाई करने और ऐसी ही बातों का ज़िक्र किया. मैं जहाँ से आया हूँ वहां तो सब यही कहते हैं कि ईश्वर करुणावान है और हमें सदैव उसकी प्रार्थना करनी चाहिए”.

साधू ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया:

“यहाँ हम यह मानते हैं कि ईश्वर ने अपने हिस्से की जिम्मेदारियां बहुत अच्छे से निभा दीं हैं और अब यह हमारे ऊपर है कि हम उसके काम को आगे बढायें”.

(~_~)

The youngman crossed the desert and finally reached the Sceta monastery. There he asked – and was given permission – to attend one of the abbot’s talks.

That afternoon the abbot spoke about the importance of farm work.

When the talk came to an end, the young man commented to one of the monks:

“That really impressed me. I thought that I was going to hear an illuminated sermon on virtues and sins, but the abbot only spoke about tomatoes, irrigation and things like that. Where I come from, everyone believes that God is mercy: all you need to do is pray.”

The monk smiled and answered:

“Here we believe that God has already done His part; now it’s up to us to continue the process.”

Image credit

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

There are 7 comments

  1. ANSHUMALA

    अच्छी कथा ! मुझे भी हर समय सांसारिक मोह माया त्यागने का प्रवचन समझ नहीं आता है सब ने त्याग दिया तो संसार चलेगा कैसे क्या सभी का साधू बन जाना ही ठीक है क्या संसारिकता इतनी बुरी है |

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  2. सुज्ञ

    पता नहीं ईश्वर की जिम्मेदारियां के बाद वो कौन सी जिम्मेदारियाँ थी जिसे मानव को पूर्ण करना था। कौन निश्चित करेगा वे जिम्मेदारियाँ यही है।
    ईश्वर प्रदत्त संसाधनो का अनियंत्रित भोग-उपभोग भी तो गैरजिम्मेदारी है, परपीड़ा का कारक है। संयमित तो रहना ही पड़ेगा, पुण्य का काम है, दूसरों के लिए अभावो का निर्माण पाप का।

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