प्रवीणता : Mastery

japan sword

याग्यु ताजिमा महान तलवारबाज़ था और उस समय के शोगन तोकुगावा लेमित्सू के विद्यालय में अपनी कला की शिक्षा देता था. एक दिन लेमित्सू के एक निजी रक्षक ने गुरु याग्यु से उसे तलवारबाजी की कला में पारंगत करने का अनुरोध किया.

गुरु याग्यु ने कहा, “तुम्हें देखकर मुझे ऐसा लगता है कि तुम तलवारबाजी की कला में पहले से ही सिद्धहस्त हो. मुझे बताओ, तुमने किस मठ में शिक्षा पाई है ताकि हम गुरु-शिष्य का संबंध स्थापित कर सकें”.

रक्षक ने कहा, “मुझे यह कहते हुए शर्मिंदगी हो रही है पर मैंने किसी से भी तलवारबाजी की शिक्षा नहीं ली है”.

गुरु याग्यु बोले, “क्या तुम मुझे अँधेरे में रखना चाहते हो? मैंने स्वयं आदरणीय शोगन को सिखाया है और मैं यह जानता हूँ कि मेरी पारखी नज़र धोखा नहीं खा सकती. मैं यह देख पा रहा हूँ कि तुम पहले से ही निष्णात हो”.

“मुझे क्षमा करें, माननीय, लेकिन मैं सत्य कह रहा हूँ कि मैं कुछ नहीं जानता हूँ”, रक्षक ने कहा.

रक्षक के बार-बार दृढ़तापूर्वक अस्वीकार करने से गुरु भी कुछ क्षणों के लिए सोच में पड़ गए, अंततः वे बोले, “यदि मैंने कुछ कहा है तो उसका भी आधार होगा. मैं आश्वस्त हूँ कि कुछ तो ऐसा है जिसमें तुम निष्णात हो पर मुझे वह पता नहीं चल पा रहा है”.

“आप पूछ रहे हैं तो मैं आपको यह बताता हूँ कि एक ऐसी चीज़ है जिसमें मैं निपुण हूँ. जब मैं छोटा लड़का था तब मुझे यह लगने लगा था कि समुराई होने के नाते मुझे किसी भी परिस्तिथि में मृत्यु से भयभीत नहीं होना है. कुछ वर्षों तक मुझे मृत्यु से भय लगता रहा पर अंततः मैंने उसपर विजय प्राप्त कर ली. मृत्यु का विचार मुझे चिंता में नहीं डाल सकता, संभवतः आपने इसी बात को भांप लिया है”.

“हाँ, बिलकुल वही!”, गुरु याग्यु ने उत्साहपूर्वक कहा, “मैं यही कह रहा था. मैं खुश हूँ कि मेरे निर्णय में कोई त्रुटि नहीं थी, क्योंकि तलवारबाजी का सबसे बड़ा रहस्य इसी में है कि इसे सीखनेवाला व्यक्ति मृत्यु की चिंता से मुक्त हो जाये. मैंने सैंकड़ों शिष्यों को इसी मान्यता को केंद्र में रखकर शिक्षा दी है पर उनमें से कोई भी वास्तव में परिपूर्ण तलवारबाज कहलाने का पात्र नहीं है. तुम्हें किसी तकनीकी प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं है क्योंकि तुम पहले से ही इसमें निपुण हो”.

* * * * *

Yagyu Tajima no Kami was a great swordsman and a teacher in the art to Tokugawa Iemitsu, the Shogun during that time. One day, a personal guard of Iemitsu’s visited Yagyu Sensei seeking instruction in the art of swordsmanship.

Master Yagyu said: “As I observe, you seem to already be a master of swordsmanship; pray tell me to which school you belong, before we enter into a relationship as teacher and student.”

The guardsman said, “I am ashamed to say that I have never really learned the art of swordsmanship.”

Master Yagyu replied by saying “Are you trying to trick me? I am teacher to the honorable Shogun himself, and I know that my judging eyes never fail me. I can see that you already are a master”

“I am sorry to defy your honor, but I really know nothing” replied the guardsman.

This resolute denial on the part of the visitor made the old swordsman think for a while, and then he finally said, “If you say so, then it must be so; but still I am sure that you are a master of something, though I know not what.”

“If you insist, I will tell you this. There is one thing of which I can say that I am a complete master. When I was a boy, it appeared to me that as a Samurai I should never be afraid of death regardless of the circumstances. I had grappled with this obstacle for some years but finally overcame it. Death ceases to worry me and perhaps this is what you sense.”

“Exactly!” exclaimed Yagyu sensei. “That is what I mean. I am glad that I made no error in my judgment. For the ultimate secrets of swordsmanship also lie in being released the preoccupation of death. I have trained ever so many hundreds of my disciples along this line, but so far none of them really deserve the final certificate for swordsmanship. You need no technical training, you are already a master.”

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

There are 11 comments

  1. अली सैयद

    निशांत जी ,
    आप हमेशा बेहतर कथायें चुनते हैं , इस कथा को पढ़ते हुए जो सूझा वह दर्ज कर रहा हूं ! टिप्पणी लिखता तो लंबी हो जाती इसलिये कथा में निहित / मुझे सूझे, संकेतों का उल्लेख करके, कथन समाप्त कर रहा हूं !

    शिशु – प्रश्न , जिज्ञासा
    तलवार – वैचारिक परिष्कार का उपकरण
    तलवार बाज़ी / समुराईयत – ज्ञान की विधा
    भय / मृत्यु – अज्ञान
    निष्णात / पारंगत / गुरु – ज्ञानी

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