प्रथम पोस्ट – प्रथम भूमिका
“बहुत कुछ लिखने को, अच्छा लिखने को और पढ़ने को मन करता है. मन की यही इच्छा मुझे पहले हिंदीज़ेन तक ले गई और फिर निशांत मिश्र तक. आगे पता चला कि निशांत वही हैं जिन्होंने मेरे साथ करीब 7 – 8 साल पहले दैनिक भास्कर भोपाल में संपादकीय विभाग में काम किया था. तार गहरे जुड़े, जुड़ते गए और अब हम निशांत की ही पहल पर हिंदीज़ेन के लिए साथ आए हैं. निशांत को बहुत धन्यवाद और इतना अच्छा सकारात्मक आधार देने के लिए आभार. सचमुच, बहुत श्रमसाध्य और समर्पण का काम है कुछ अच्छा लिखना या फिर लिखे हुए को सरल, सहज बनाकर बांटना.”
ओशो पर बहुत – बहुत लिखा गया है, हर दिन लिखा जा रहा है, फिर भी वे बहुत सामयिक, प्रेरक और सच्चे लगते हैं . हिंदीज़ेन के लिए ओशो की सुनाई एक बोध कथा, ‘अज्ञात की ओर’ पुस्तक से साभार:
बुद्ध एक बार एक गांव के पास से निकलते थे. उस गांव के लोग उनके शत्रु थे. हमेशा ही जो भले लोग होते हैं, उनके हम शत्रु रहें हैं. उस गांव के लोग भी हमारे जैसे लोग होंगे. तो वे भी बुद्ध के शत्रु थे. बुद्ध उस गांव से निकले तो गांव वालों ने रास्ते पर उन्हें घेर लिया. उन्हें बहुत गालियां दी और अपमानित भी किया.
बुद्ध ने सुना और फिर उनसे कहा, “मेरे मित्रों तुम्हारी बात पूरी हो गई हो तो मैं जाऊं, मुझे दूसरे गांव जल्दी पहुंचना है”. वे लोग थोड़े हैरान हुए होंगे. और उन्होंने कहा, “हमने क्या कोई मीठी बातें कहीं हैं, हमने तो गालियां दी हैं सीधी और स्पष्ट. तुम क्रोध क्यों नहीं करते, प्रतिक्रिया क्यों नहीं देते?”
बुद्ध ने कहा, “तुमने थोड़ी देर कर दी. अगर तुम दस वर्ष पहले आए होते तो मजा आ गया होता. मैं भी तुम्हें गालियां देता. मैं भी क्रोधित होता. थोड़ा रस आता, बातचीत होती, मगर तुम लोग थोड़ी देर करके आए हो”. बुद्ध ने कहा, “अब मैं उस जगह हूं कि तुम्हारी गाली लेने में असमर्थ हूं. तुमने गालियां दीं, वह तो ठीक लेकिन तुम्हारे देने से ही क्या होता है, मुझे भी तो उन्हें लेने के लिए बराबरी का भागीदार होना चाहिए. मैं उसे लूं तभी तो उसका परिणाम हो सकता है. लेकिन मैं तुम्हारी गाली लेता नहीं. मैं दूसरे गांव से निकला था वहां के लोग मिठाइयां लाए थे भेंट करने. मैंने उनसे कहा कि मेरा पेट भरा है तो वे मिठाइयां वापस ले गए. जब मैं न लूंगा तो कोई मुझे कैसे दे पाएगा”.
बुद्ध ने उन लोगों से पूछा, “वे लोग मिठाइयां ले गए उन्होंने क्या किया होगा?” एक आदमी ने भीड़ में से कहा, “उन्होंने अपने बच्चों और परिवार में बांट दी होगी”. बुद्ध ने कहा, “मित्रों, तुम गालियां लाए हो मैं लेता नहीं. अब तुम क्या करोगे, घर ले जाओगे, बांटोगे? मुझे तुम पर बड़ी दया आती है, अब तुम इन इन गालियों का क्या करोगे, क्योंकि मैं इन्हें लेता नहीं? क्योंकि, जिसकी आंख खुली है वह गाली लेगा और जब मैं लेता ही नहीं तो क्रोध का सवाल ही नहीं उठता. जब मैं ले लूं तब क्रोध उठ सकता है. आंखे रहते हुए मैं कैसे कांटों पर चलूं और आंखे रहते हुए मैं कैसे गालियां लूं और होश रहते मैं कैसे क्रोधित हो जाऊं, मैं बड़ी मुश्किल में हूं. मुझे क्षमा कर दो. तुम गलत आदमी के पास आ गए. मैं जाऊं मुझे दूसरे गांव जाना है”. उस गांव के लोग कैसे निराश नहीं हो गए होंगे, कैसे उदास नहीं हो गए होंगे? आप ही सोचिये?
बुद्ध ने क्या कहा? यही कि इस बुद्ध ने क्रोध को दबाया नहीं है. यह बुद्ध भीतर से जाग गया है इसलिए क्रोध अब नहीं है. अस्तु . (featured image)
अच्छी बात!
कमल माहेश्वरी का हिन्दी जेन में स्वागत ! 🙂
शुक्रिया अनूप जी, आशा है हम सब मिलकर अपनों के बीच अच्छा और सकारात्मक लेखन बांटेंगे. . .
बुद्ध कथाओं में सर्वाधिक लोकप्रिय और अत्यधिक प्रभावशाली कथा, जिससे बुद्ध की शैली समझने में भी मदद मिलती है, बढि़या प्रस्तुति.
sir very truthfull lines.
गहन बोध-दृष्टांत, जहाँ भीतर मान कषाय (ईगो) उत्पन्न होगा, निंदा आवेश प्रेरक होगी। आवेश गालियों का स्वीकृति सूचक होगा। जिस किसी के ‘मान कषाय’ का शमन हो गया, वह अलिप्त ही रहेगा।
हिन्दीजेन साहित्यिक सशक्तीकरण की ओर अग्रसर है। हिंसा की प्रतिक्रिया भी हिंसा है।
ऐसी सार्थक बोध कथाओं को जन जन तक पहुँचाने का प्रयास बहुत ही सराहनीय है। धन्यवाद।
बेहतरीन प्रस्तुति,वरेण्य भाव…
आप अपने इस ब्लॉग में गूगल फोल्लो वाला सिस्टम शुरू करिए ना जो ब्लागस्पाट के ब्लॉग में होता है
भाई अंकित, यह ब्लौग वर्डप्रेस पर बनाया गया है. इसमें ब्लौगर वाले फौलोवर्स को शामिल करने या वह सुविधा देने का विकल्प नहीं है.
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सर, आपके साथ जो थोडा बहुत समय बिता वो बहुत ही अच्छा था। मैंने आपसे बहुत कुछ सीखा।
आपका यह प्रयास भी बहुत ही अच्छा है।
बेहतरीन प्रस्तुति…….. और विचारणीय पोस्ट.
साधुवाद.
Hi,
Thanks for sharing this story.
Every thing depends upon our choice.not others.Others will give what they have but we have a choice what we want to take.
राहुल सिंह जी से सहमत !
नया तो नहीं क्योंकि ओशो ने इसे जब कहा तो यह कथा और महत्वपूर्ण हो गई और हमेशा यह याद रहती ही है लेकिन आपने इसे याद दिला दिया।
गांधीजी के जीवन से सम्बंधित एक घटना याद आ गयी ! किसी विफल बात चीत के बाद इंग्लैंड से वापस लौटते हुए , रोज़ सवेरे समुद्रीजहाज़ में उनका सामना एक रुष्ट अंग्रेज़ से होता जो उन्हें अपमानजनक बातें कहता जिन्हें वे अनसुना कर देते | एक दिन उस अंग्रेज़ ने एक लम्बी चिट्टी गालियों से भरी लिख डाली और उन तक एक बच्चे के हाथों पहुंचा दी | गांधीजी ने बड़े आराम से उस पुलिंदे से आलपिन को निकालकर अपने पास एक डिबिया में रख लिया और चिट्टी पर कोई ध्यान नहीं दिया| कोई प्रतिक्रिया न पाकर अंग्रेज़ बोला “अरे गाँधी उसमे तुम्हारे काम की चीज़ है ,देख तो लो ” जिस पर गांधीजी का जवाब था कि “काम की चीज़ तो मैंने निकाल के रख ली”.
अच्छी प्रस्तुति। ओशो को जितना पढ़ लें कम है।
नीति से,
कहानी छुपा ली? पिन निकाल ली थी गाँधी जी ने।
गालियां न लेने का अभ्यास, सुसंस्कृत होने का अभ्यास है। हम कर तो रहे हैं, पर रफ्तार धीमी है!
पूर्व पठित ! ओशो को खूब पढ़ा है । बहुत खजाना बिखरा है वहाँ ।
प्रविष्टि का आभार ।
this is not jatahak katha . it is realy true
Bht achi kahani h Nishant ji
कितने सहज थे बुध्द जी