नेत्रहीनों की संतानें

श्री देवदत्त पटनायक का यह आलेख अंग्रेजी अखबार कॉरपोरेट डॉज़ियर ईटी में 5 नवम्बर,  2010 को प्रकाशित हो चुका है. उनकी अनुमति से मैं इसका हिंदी अनुवाद करके यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ. यदि आप मूल अंग्रेजी आलेख पढना चाहें तो यहाँ क्लिक करें.

gandhariमहाभारत में ज्येष्ठ कौरव दुर्योधन खलनायक है. उसकी ईर्ष्या के परिणामस्वरूप वह महायुद्ध हुआ जिसमें लाखों लोग मारे गए. दुर्योधन को अपने चचेरे भाई पांडवों से डाह है. वह उनकी सफलता नहीं सह पाता. पांडवों का विनाश ही उसके जीवन का लक्ष्य है. उन्हें मारने के लिए उसने एकाधिक षडयंत्र किये. शांति बनाए रखने के लिए उसने पांडवों को सुई की नोक के बराबर धरती देने से भी मना कर दिया. पांडवों का विनाश करने के लिए उसने न केवल अपना सुख-चैन खोया बल्कि अपने राज्य और नागरिकों के जीवन को भी छिन्न-भिन्न कर दिया. उसके भीतर घनघोर घृणा है. इतनी घृणा उसके ह्रदय में कहाँ से आई?

कोई व्यक्ति दुर्योधन कैसे बन जाता है. उसके भीतर इतनी कड़वाहट और इतना क्रोध है कि उसे अपने समीप बिखरी खुशियाँ (अच्छे माता-पिता, पत्नियाँ, मित्र, सत्ता) नहीं दिखती और उसकी आँख पांडवों के हितों पर गड़ी रहती है. उनसे तुलना करते-करते वह स्वयं को हीन अनुभव करने लगता है. उसका पूरा जीवन पांडवों से अपनी तुलना करने में बीतता है और इसके फलस्वरूप वह स्वयं को दुखी, और दुखी करता जाता है.

महाभारत के लेखक महर्षि वेद व्यास ने स्पष्ट रूप से तो नहीं पर ग्रन्थ में कई स्थानों पर दुर्योधन के रुग्णचित्त होने के कारण गिनाये हैं. दुर्योधन के पिता राजा धृतराष्ट्र नेत्रहीन हैं. उसकी माता गांधारी ने भी अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली है. पिता पुत्र को देख नहीं सकता, और माता पुत्र को देखना नहीं चाहती, कारण चाहे जो हो. इन परिस्तिथियों में दुर्योधन अपने माता-पिता की देखरेख के बिना बड़ा होता है. उसके माता-पिता यह देख ही नहीं पाते कि उसके भीतर कैसी विषमताएं घर कर रहीं हैं. वे यह देख ही नहीं पाते कि क्रोध उसे भीतर-ही-भीतर लील रहा है. इसलिए कोई उसे सुधारने का जतन भी नहीं करता. वह चापलूसों और ईर्ष्यालुओं की संगति में बिगड़ता जाता है. उसका समग्र व्यक्तित्व खंडित हो जाता है जिसके परिणाम भयावह होते हैं.

संस्थाओं में भी बहुतेरे दुर्योधन होते हैं. वे ऐसे कर्मचारी होते हैं जिनके भीतर हीन भावनाएं और क्रोध पनपता रहता है, जिसका निर्णय लेने की काबिलियत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. अपने संस्थागत उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रयास करने के बजाय पर वे उस समय अपने व्यक्तित्व को थोपने लगते हैं जब कोई महत्वपूर्ण निर्णय लिया जाना होता है. उदाहरण के लिए, वे बड़े केबिन, बड़े पैकेज, या बड़ी टीम के लिए आपस में लड़ते हैं, बिजनेस को बड़ा करने के लिए नहीं. उनकी आँखें ग्राहक को नहीं बल्कि खुद को ही देखती रहतीं हैं. वे हर समय दूसरों का ध्यान खींचना चाहते हैं. उन्हें सब कुछ प्रबंधन से मिलता है पर प्रबंधन या तो उन्हें देख नहीं सकता या उन्हें देखना नहीं चाहता. कर्मचारी भी या तो प्रबंधन को देख नहीं पाते या उसे देखना नहीं चाहते.

ऐसी ही एक कंपनी में रमेश दुर्योधन की भांति है. वह मानता है कि वह उसकी कंपनी का सबसे अच्छा सेल्स मैनेजर है. उसने गुण और मात्रा की दृष्टि से कंपनी के किसी भी दूसरे सेल्स मैनेजर से बेहतर काम किया है. लेकिन रमेश को यह लगता है कि उसका प्रबंध निदेशक (Managing Director or MD) उसे देखता भी नहीं. MD सारे सेल्स मैनेजरों से एक समान बर्ताव करता है और सभी को समान बोनस और सुविधाएँ देता है. MD का कोई चहेता सेल्स मैनेजर नहीं है. रमेश चाहता है कि उसकी ओर ध्यान दिया जाए. वह चाहता है कि उसकी सराहना हो और उसे ख़ास माना जाए. लेकिन MD को तो रमेश की इन भावनाओं का पता भी नहीं है. वह तो सिर्फ यह चाहता है कि उसकी टीम के सभी सदस्य प्रोफेशनल रवैये से अपना-अपना काम करें. रमेश की भावनात्मक ज़रूरतों को या तो वह देख नहीं पाता या उन्हें नज़रंदाज़ कर देता है. अपने इस अति-प्रोफेशनल रवैये के कारण वह गांधारी बन जाता है. कुछ लोग यह भी कह सकते हैं कि वह धृतराष्ट्र है और अपनी टीम सदस्यों के प्रति संवेदनशून्य है. इस सबका परिणाम यह होता है कि रमेश और उसकी टीम के अन्य सेल्स मैनेजर स्वयं को नेत्रहीन माता-पिता की संतानें समझने लगते हैं. अपनी ओर सबका ध्यान खींचने की उनकी इच्छाएं कई रूपों में लक्षित होने लगतीं हैं – वे बोर्डरूम में लड़ते हैं, टीमवर्क से काम नहीं करते, MD से और अधिक समय मांगते हैं (जो वह देता नहीं है), बिजनेस नीतियों को दरकिनार कर अपने लिए अधिक वेतन, कमीशन, और सुविधाएँ मांगते हैं (जिनके मिलने की कोई उम्मीद नहीं होती).

कंपनी को रमेश के भीतर पनपती विषमताओं और क्रोध का खामियाजा भरना पड़ता है. सभी यह आश्चर्य करते हैं कि रमेश भी औरों की तरह प्रोफेशनली अपना काम पूरा करके शांति से घर क्यों नहीं जाता. वे यह भूल जाते हैं कि रमेश कोई मशीन नहीं है. उसकी भी कुछ भावनात्मक ज़रूरतें हैं. वह चाहता है कि उसके काम को सराहकर उसे महत्वपूर्ण समझा जाए. रमेश की इस सोच को अतार्किक और फ़िज़ूल की कह सकते हैं पर यह सोच उसके भीतर गहरी पैठ बना चुकी है. हम हमेशा ही यह उम्मीद करते हैं कि दफ्तर में घुसते समय कर्मचारियों को अपनी भावनाएं बाहर छोड़ देनी चाहिए पर वास्तविकता में ऐसा नहीं होता. संस्थाएं और कम्पनियाँ अपने कर्मचारियों को पहिये के दांत सदृश मान सकती हैं पर यह मैकियावेली मानसिकता तर्कसंगत और व्यावहारिक नहीं है. हर मनुष्य को दुलार और सराहना की ज़रुरत होती है भले ही यह कितनी ही बचकानी बात क्यों न लगे.

हर कंपनी में MD को ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की ज़रुरत है. महाभारत के विनाशकारी युद्ध के लिए केवल दुर्योधन ही नहीं बल्कि धृतराष्ट्र और गांधारी भी समान रूप से उत्तरदायी हैं.

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

There are 8 comments

  1. akash

    Nishant ji, kyaa aap meri madad kar sakte hain?

    I am B.tech. final year student. This time i am going through very bad phase of life. My problem is my studying performance. I have got fail in many subjects in almost all the subjects. The reason is, i am not able to concentrate on my studies. And i am not even good at studies also. I am a slow learner. My parents are expecting a lot and put a lot of pressure on me of clearing my degree in the current year, which is not easy for me. And i am not seeing any future for myself in this world. I can not live like a looser. I am continuously thinking about suicide I have tried a lot to improve but i could not. I am finding it easy to die than to live in this world suffering. If you can help, please … I am a regular reader of your blog. You write very good. I feel you can show me the way, give me some suggestions that my mind cant think of…

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