विश्व का सबसे खतरनाक इन्फ़ेक्शन/वायरस कौन सा है?

क्या आप जानते हैं कि विश्व का सबसे खतरनाक इन्फ़ेक्शन और उसे पैदा करनेवाला वायरस कौन सा है? यह वह रोग या इन्फ़ेक्शन है जिससे ग्रसित हो जाने पर मरीज के मरने की आशंका 100% होती है, अर्थात इसका शिकार हो जाने पर रोगी को किसी भी हालत में बचाया नहीं जा सकता.

उस रोग का नाम है रेबीज़ (Rabies) जो पागल कुत्ते के काट लेने से होता है और इसका इन्फ़ेक्सन एक विशेष प्रजाति के न्यूरोट्रोपिक वायरस से होता है जिन्हें रेब्डोवॉयरस (rhabdoviruses) कहते हैं. रेबीज़ का वायरस मनुष्यों और अन्य स्तनधारी प्राणियों के मष्तिष्क पर प्रभाव डालता है.

इस रोग के लक्षण प्रकट होने पर मृत्यु अवश्यंभावी होती है. रोग के प्रारंभिक लक्षण होते हैं बुखार आना और काटे जानी वाली जगह पर झुनझुनी होना. इसके बाद कुछ अन्य लक्षण उभर आते हैं जैसे मरीज हिंसक व्यवहार करता है, अत्यधिक उत्तेजित होने लगता है, उसे पानी देखकर डर लगता है, शरीर के कुछ अंग निष्क्रिय होने लगते हैं, कन्फ्यूज़न होने लगता है और मरीज अंततः चेतनाशून्य हो जाता है.

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में वैज्ञानिकों और डॉक्टरों ने ऐसी पद्धति विकसित की है जिससे रेबीज़ के कुछ मरीज़ों को बचाया जा सका है. इस व्यवस्था को मिलवॉकी प्रोटोकॉल (Milwaukee Protocol) का नाम दिया गया है.

मिलवॉकी प्रोटोकॉल को विस्कोंसिन प्रोटोकॉल (Wisconsin Protocol) भी कहते हैं. यह चिकित्सा व्यवस्था अभी भी अपने प्रायोगिक चरण में है. इसमें मरीज को रसायनों के द्वारा नियंत्रित कोमा में पहुंचा दिया जाता है और उसे एंटीवायरल दवाएं दी जाती हैं. इसे डॉक्टर रॉडनी विलोबाय, जूनियर (Rodney Willoughby, Jr.) ने विकसित किया और अपनी मरीज जेना गीस (Jeanna Giese) का सफलतापूर्वक उपचार किया.

12 सितंबर, 2004 को 15 वर्षीय हाइ स्कूल छात्रा जेना गीस ने अपने शहर के एक चर्च में एक चमगादड़ को उठा लिया. चमगादड़ ने उसे बाएं हाथ में काट लिया. जेना ने हाथ अच्छे से धो लिया लेकिन डॉक्टर को नहीं दिखाया. जब उसका हाथ अपने आप झटकने लगा और उसकी दृष्टि धुंधली होने लगी तब उसे अस्पचाल ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने इसकी पुष्टि की कि उसे रेबीज़ हो गया था.

डॉक्टर यह जानते थे कि हमारा शरीर पर्याप्त समय के भीतर किसी भी तरह के इन्फ़ेक्शन से लड़ने की ताकत रखता है लेकिन रेबीज़ के मामले में ऐसा इसलिए नहीं हो पाता क्योंकि इसके वायरस का सीधा हमला हमारे मष्तिष्क पर होता है. यह वायरस मष्तिष्क में प्राणघातक सूजन (inflammation) उत्पन्न करता है जिसके परिणामस्वरूप मृत्यु की दर 100% हो जाती है. जेना के मामले में डॉक्टरों ने प्रयोग के तौर पर उसे रसायनों के माध्यम मे कोमा में भेज दिया जिससे उसके मष्तिष्क की गतिविधियां थम गईं. इसके साथ ही डॉक्टरों ने उसे कई प्रकार की एंटीवायरल दवाएं भी दीं जिससे वायरस के फैलने की गति पर विराम लग गया.

जेना 6 दिन के बाद कोमा से बाहर आ गई. उसने रेबीज़ को हरा दिया और उसे वायरस-मुक्त (virus-free) घोषित कर दिया गया. उसे सोचने-समझने की क्षमताएं बहुत हद तक अप्रभावित बनी रहीं हालांकि उसे चलने-फिरने से जुड़ी कई प्रकार की दिक्कतों का सामना करना पड़ा. अब वह पूरी तरह से ठीक हो गई है. उसका विवाह भी हो गया है और वह जीवविज्ञान में पी.एच.डी. कर रही है.

इस पोस्ट के लिखे जाने तक केवल 5 लोगों को मिलवॉकी प्रोटोकॉल की सहायता से रेबीज़ के लक्षणों के दिखने के बाद भी बचाया जा सका है. इस चिकित्सा व्यवस्था को विकसित करनेवाले वैज्ञानिक और डॉक्टर वाकई बधाई के पात्र हैं. (featured image)

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