अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य के बच्चों को जन्म देते समय अधिक दर्द क्यों होता है?

आपने शायद कभी वास्तविकता में या फिल्मों में गर्भवती स्त्रियों को प्रसव करते (बच्चा पैदा करते) वक्त देखा होगा कि उन्हें इस दौरान बहुत अधिक दर्द और कष्ट होता है. मनुष्य भी दूसरे जीवजंतुओं की भांति प्राणी परिवार के सदस्य हैं, फिर केवल मनुष्य स्त्रियों को ही बच्चा जनते समय इतना दर्द क्यों होता है? अन्य प्राणियों की मादाएं स्त्रियों की तुलना में अपेक्षाकृत आसानी से और कम दर्द में बच्चा पैदा कैसे कर लेती हैं?

इस प्रश्न के उत्तर का संबंध स्त्रियों की श्रोणि या पेल्विस (pelvis, कमर-कूल्हे की हड्डियों का समूह) से है. अन्य स्तनधारियों कि तुलना में हमारे पेल्विस का आकार अधिक गोलाकर होता है. नीचे दिए गए चित्र में गर्भस्थ शिशु के सिर के आकार को गहरे काले रंग के गोले से दिखाया गया है और उसके बाहर का हिस्सा मादा के शरीर का भाग है. आप देख सकते हैं कि मादा मनुष्य के पेल्विस का आकार हमारे निकटतम प्राइमेट्स कपियों के पेल्विस के आकार की तुलना में कितना छोटा है. यही कारण है कि एक छोटी सी जगह से बच्चे के बाहर निकलने की प्रक्रिया के दौरान बहुत अधिक कष्ट होता है.

लेकिन इससे यह प्रश्न उठता है कि स्त्रियों का पेल्विस इतना छोटा क्यों होता है? यह इतना बड़ा और फैला हुआ क्यों नहीं होता कि बच्चे को बाहर आने में आसानी हो और प्रसव-पीड़ा कम हो? इस प्रश्न के उत्तर का संबंध हमारे सीधे खड़े होकर चलने की क्षमता या कुशलता से है. और सीधे खड़े होकर चलने की क्षमता का संबंध दो बातों से हैः 1. हमारे उदर (पेट) को सहारा मिलना और 2. चलना-दौड़ना.

चिंपांजी और गोरल्ला जैसे चारों हाथों व पैरों की सहायता से चलने वाले प्राणियों में पेट के भीतर के अंगों के भार को पेट की मजबूत मांसपेशियों की तीन परतों वाली मोटी दीवार से सहायता मिलती है. कपियों से विकसित होने के दौरान जब हमारे पूर्वज केवल अपने पैरों पर खड़े होने लगे तो पेट के अंगों का भार पेल्विस पर पड़ने लगा. इस भार को संभालने के लिए नीचे किसी चीज़ का होना ज़रूरी हो गया. दौ पैरों पर चलने वाले प्रारंभिक मनुष्यों की आंतों के साथ यह समस्या हो गई उनके लूप पेल्विस के ऊपरी हिस्से पर गिरकर या लिपटकर हर्निया की अवस्था उत्पन्न करने लगे. हर्निया घोर कष्टदायक स्थिति होती है जिसमें आंत जैसा कोई नाजुक अंग दबाव पड़ने या किसी खाली जगह में धंसकर मुड़-तुड़ जाता है और ठीक से काम नहीं कर पाता. हमारी आंतों को इस स्थिति से बचाने के लिए प्रकृति को कोई उपाय करना ज़रूरी हो गया.

इस प्रकार सीधे खड़े होकर चलने की प्रक्रिया के इवोल्यूशन के दौरान हमारे पेल्विस का निचला हिस्सा इस तरह भीतर की ओर मुड़ने लगा कि पेल्विस क्षेत्र की मांसपेशियां अधिक मजबूत होकर लंबी व भारी-भरकम आंतों को सहारा देने में सक्षम हो गईं.

पेल्विस के छोटा होने का दूसरा कारण हमारे चलने-फिरने की क्षमता से है. इवोल्यूशन के दौरान हमारे घुटनों से पेल्विस को जोड़नेवाली बड़ी हड्डी फ़ीमर (femur) भीतर की ओर इस तरह से मुड़ने लगी कि हमारे घुटने शरीर के गुरुत्व के केंद्र से नीचे चले गए. नीचे दिए गए चित्र में आप बांई ओर चिंपांजी और दांई ओर प्रारंभिक मनुष्य के पेल्विस व फ़ीमर की स्थितियों की तुलना कर सकते हैं. हड्डियों की स्थिति में इस बदलाव के कारण आराम से सीधे खड़े होने और चलने-फिरने में आसानी होने लगी और लंबी दूरी तक दौड़ना संभव हो गया. मनुष्य के सीधे खड़े होकर चलने की तुलना आप फिल्मों में चिंपांजी या ओरांगउटान के दो पैरों पर चलने की स्थिति से करके देखिए, मनुष्य की तुलना में वे बहुत कठिनाई से दो पैरों पर चल पाते हैं.

लेकिन पेल्विस में आनेवाले इन सभी बदलावों ने प्रसव को कठिन बना दिया. इवोल्यूशन के दौरान पेल्विस के संकरे होते जाने पर प्रारंभिक मनुष्यों के शिशुओं को इसमें से निकलने में दिक्कत होने लगी क्योंकि विकास की प्रक्रिया के दौरान आरंभिक मनुष्यों के सर का आकार भी बड़े होते जा रहे मस्तिष्क को सहारा देने के लिए बड़ा होता जा रहा था. इस समस्या का हल इवोल्यूशन ने इस प्रकार निकाला कि शिशुओं की खोपड़ी की हड्डियां इस तरह से मुलायम होने लगीं कि वे योनि मार्ग के रास्ते पेल्विस से बाहर आते वक्त पड़नेवाले दबाव व ऐंठन को सह लें. इवोल्यूशन ने शिशुओं के जन्म का काल इस प्रकार से भी रूपांतरित कर दिया कि वे खोपड़ी के कठोर होने के पहले ही जन्म लेने लगे.

इसके परिणामस्वरूप मनुष्यों के नवजात शिशु अन्य प्राणियों के शिशुओं की तुलना में अल्पविकसित अवस्था में जन्म लेने लगे. जन्म के समय उनके तंत्रिका तंत्र की अपरिपक्वता इस रूप में परिलक्षित होती है कि दूसरे प्राणियों के नवजात शिशुओं की तरह वे जन्म लेते ही चल-फिर या दौड़-भाग नहीं सकते. वे बंदर के बच्चों की तरह अपनी मां को जकड़ नहीं सकते. हमारे नवजात शिशु इतने शक्तिहीन होते हैं कि वे किसी वस्तु को अपने हाथ में कसकर पकड़ भी नहीं सकते. दो पैरों पर खड़े होकर चलने और दौड़ने की कीमत हमने बच्चे पैदा करते समय होने वाले दर्द और हमारे शिशुओं के हम पर लंबे समय तक पूरी तरह से निर्भर होने से चुकाई है. अन्य प्राणियों के बच्चों की तुलना में मनुष्य के बच्चों की सबसे अधिक देखभाल करनी पड़ती है.

इन सारी बातों से जुड़ा एक अन्य रोचक पक्ष यह है कि इवोल्यूशन ने हमारे शिशुओं को जन्म के समय असहाय बना दिया लेकिन उनकी देखभाल के लिए स्त्री-पुरुषों के संंबधों को दीर्घ-जीवी बना दिया. मनुष्य के शिशुओं को माता-पिता दोनों ही मिलकर पालते हैं हालांकि माता की भूमिका इसमें अधिक और महत्वपूर्ण होती है. पेलविक शरीर-रचना विज्ञान (pelvic anatomy) के कारण नर और मादा मनुष्य शारीरिक और भावनात्मक रूप से एक-दूसरे के अधिक निकट आए और अन्य प्राइमेट्स की तुलना में वे एक ही जीवनसाथी से अधिक संपृक्त रहने लगे.

संक्षेप में कहें तो दो पैरों पर सुविधाजनक रूप से खड़े होने की प्रवृत्ति ने हमें दो नुकसान पहुंचाए. पहला यह कि हमारे बच्चों का मां के पेल्विस से बाहर आकर जन्म लेना कठिन हो गया, और दूसरा यह कि हमाने नवजात शिशुओं को असहाय और माता-पिता पर लंबे समय तक निर्भर होना पड़ा. मनुष्य की सभ्यता और संस्कृति के उन्नत होने की कीमत हम बच्चे को जन्म देते समय होने वाले दर्द से चुकाते हैं.


Gyan.Blog में ही एक पोस्ट और भी है जिसमें बच्चे को जन्म देते समय होने वाली दर्द की काल्पनिक यूनिट के बारे में बताया गया है.

By Ken Saladin, Emeritus professor of biology. (featured image)

There is one comment

  1. बच्चे को जन्म देते समय मां को कितना दर्द होता है? | हिंदीज़ेन : HindiZen

    […] इस पोस्ट में बताया गया है कि अन्य मादा स्तनधारियों की तुलना में स्त्रियों को बच्चे को जन्म देते समय अधिक दर्द क्यों होता है. (featured image courtesy) […]

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