अन्य स्तनधारियों की भांति मनुष्यों के प्रजनन का कोई सीज़न क्यों नहीं होता?

अन्य पशुओं की भांति मनुष्यों के समागम का कोई मौसम या सीजन नहीं होता. इसके अनेक कारण हैं.

मनुष्यों (अर्थात होमो सेपियंस) ने स्वतंत्र प्रजाति के रूप में विकसित होने के बाद से ही अपनी प्रजनन रणनीतियां नहीं बदली हैं. होमो सेपियंस का उद्भव अफ़्रीका में हुआ था और भूमध्यरेखीय अफ़्रीका का मौसम प्रायः एक सा ही रहता है. वहां ठंड नहीं पड़ती, बारिश कामचलाऊ होती है और बाकी समय मौसम सूखा रहता है. मनुष्यों को साल भर तक पर्याप्त पानी और भोजन की आवश्यकता होती है और इस क्षेत्र में उन्हें सारे संसाधन प्रचुर मात्रा में मिलते थे. उन्हें अपना सर्वाइवल सुनिश्चित करने के लिए किसी खास मौसम में प्रजनन करने की कोई ज़रूरत नहीं थी.

हमारा विकास जंगलों में रहनेवाले प्राइमेट्स से हुआ जिन्हें साल भर पर्याप्त भोजन मिलता था इसलिए इस बात की संभावना कम ही है कि आरंभिक मनुष्यों को किसी खास मौसम में प्रजनन करने के बारे में सोचना पड़ा हो. सीज़नल ब्रीडिंग तब विकसित होती है जब प्रजाति को सफल प्रजनन करने के लिए ज़रूरी होने वाली चीज़ किसी खास मौसम में ही अधिक मात्रा में मिलती हो.

मनुष्य के शिशुओं को पूरी तरह आत्मनिर्भर बनने में लगभग 12-13 वर्ष या इससे भी अधिक समय लग जाता है. छोटे बच्चे लगभग 1 वर्ष के होने तक पूरी तरह से अपनी मां पर निर्भर रहते हैं. कुछ समाजों या संसकृतियों में शिशु लगभग 5 वर्ष की अवस्था का होने तक मां का दूध पीते हैं. ऐसी स्थिति में किसी खास मौसम में उत्पन्न होनेवाली किसी चीज़ का बच्चों के विकास और मनुष्यों की प्रजनन आवश्यकताओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता.

स्त्रियों के मासिक चक्र के लक्षण वस्त्रों के कारण छिपे होते हैं लेकिन हजारों वर्षों तक मनुष्यों के नग्न रहने के कारण वे सबको दिखते रहते थे और उनके बीच समागम सहज था. आज हमें स्त्री के यौनांग नहीं दिखते हैं फिर भी उनकी बहुत गूढ़ बॉडी लैंग्वेज और बोलने के लहज़े में परिवर्तन से यह पता चल जाता है कि उनका शरीर प्रजनन के लिए तैयार है. स्त्रियों के शरीर से निकलनेवाले फ़ेरोमोनेस पुरुषों को प्रभावित करते हैं हालांकि पुरुषों को इस बात का पता नहीं चलता. यह सब बहुत अजीब है!

हम यह कह सकते हैं कि मनुष्य मादाएं हमेशा ही “हीट”में रहती हैं क्योंकि हमारी प्रजाति में अन्य स्तनधारी प्रजातियों के विपरीत माता-पिता दोनों को ही बच्चों का ध्यान रखना पड़ता है. ऐसा तभी हो पाता है जब वे दोनों अपने बच्चों से प्रेम करें. अधिकांश स्तनधारी प्राणी अपने बच्चों से बहुत कम समय के लिए ही प्रेम करते हैं. स्त्रियों के शरीर में स्तनों की स्थिति से भी मां और शिशु के बीच गहरा भावनात्मक लगाव उत्पन्न होता है. जिन प्रजातियों की मादाओं के स्तन सामने की ओर होते हैं उनमें अपने बच्चों से लंबे समय तक जुड़ाव की भावना देखी जाती है.

इसके अलावा स्तनधारी प्राणियों में मनुष्य इस मामले में भी अनोखे हैं कि वे समागम करते समय एक-दूसरे के आमने-सामने होते हैं, क्योंकि मनुष्यों के लिए समागम शारीरिक के साथ-साथ भावनात्मक आवश्यकताओं को पूरा करता है. यही कारण है कि स्त्रियों के स्तन कामोद्दीपक क्षेत्र के रूप में भी विकसित हुए हैं और ये पुरुषों को अपनी ओर खींचते हैं. इसके विपरीत अधिकांश स्तनधारी नर प्राणी मादा के पुठ्ठे देखकर उत्तेजित हो जाते हैं. कुछ प्रजातियों के बंदरों में मादा के हीट पर होने से उसकी दुम के नीचे का हिस्सा कुछ फूल जाता है और रंगीला दिखने लगता है.

इस प्रश्न के उत्तर का संबंध पुरुषों के लिंग के आकार और शरीर में उसकी स्थिति से भी है लेकिन उसकी चर्चा करने पर कुछ अन्य विषय भी जुड़ते चले जाएंगे. इसलिए उसकी बात किसी दूसरी पोस्ट में की जाएगी.


इस प्रश्न के क्वोरा पर विभिन्न उत्तरों का सार. Photo by Kaitlyn Baker on Unsplash

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