ऊपर चित्र में लाल रेखाओं के पीछे वाले क्षेत्र में गोली के लगने पर व्यक्ति को गोली मारे जाने का पता भी नहीं चलता और एक सेकंड से भी कम समय में मृत्यु हो जाती है.
पुलिस और मिलिटरी से जुड़े लोग इसके विशेष आकार के कारण इसे टी-बॉक्स (T-box) कहते हैं. प्राणघातक मुठभेड़ों के दौरान शत्रु के सिर के इस भाग में गोली मारना सबसे बड़ा उद्देश्य होता है. यदि यह संभव न हो तो छाती के बीचोंबीच गोली मारी जाती है. टी-बॉक्स का सर्वाधिक महत्व इसलिए है क्योंकि शरीर के इस भाग पर गोली लगने जैसी तेज हिंसक गतिविधि का परिणाम प्राणघातक होता है. यदि गोली चलानेवाले का निशाना अचूक हो तो जीवित बचने की संभावना शून्य हो जाती है. यदि गोली चलानेवाला व्यक्ति इस छोटे से क्षेत्र पर सफलतापूर्वक निशाना लगा दे तो मारे जाने वाले व्यक्ति को कुछ भी पता नहीं चलता. उसे गोली लगने का दर्द भी नहीं होता. लेकिन पुलिस या मिलिटरी में किसी को भी इस क्षेत्र में गोली मारने की ट्रेनिंग नहीं दी जाती क्योंकि यहां निशाना लगाना बहुत कठिन है. वास्तविक मुठभेड़ों के दौरान किसी के भी पास इतना समय नहीं होता और कोई भी इतना स्थिर नहीं होता कि ऐसा निशाना लगाया जा सके.
सर में गोली लगने पर भी बचने के बहुत से किस्से मौजूद हैं. सर में गोली लगने पर भी इसकी गारंटी नहीं होती कि शत्रु तत्काल मर जाएगा. वीडियो गेम्स और फिल्में देखकर लोगों को यह गलतफहमी हो गई है कि सर में गोली लगते ही लोग पलक झपकते ही ढेर हो जाते हैं. सर में गोली लगने पर भी लोग कई बार बच जाते हैं. कई बार गोली लगने पर ब्रेन में किसी तरह का डैमेज नहीं होता. कुछ ऐसे मामले भी देखे गए हैं कि बहुत नजदीक से और किसी खास एंगल से गोली मारे जाने पर गोली ने व्यक्ति की खोपड़ी से टकराकर रास्ता बदल लिया और मारे जाने व्यक्ति को बस मामूली खरोंच ही आई. यही कारण है कि ज्यादातर हेड-शॉट्स से व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती.
टी-बॉक्स की विशेषता क्या है?
टी-बॉक्स नाक और आंखों के पीछे के हिस्से को कवर करता है. नाक और आंख तो महज टारगेट एरिया हैं, असली खतरा इनके ठीक पीछे है. इनके ठीक पीछे खोपड़ी के भीतर ब्रेन का निचला भाग होता है जिसे ब्रेन-स्टेम (brain stem) कहते हैं. ब्रेन का यह हिस्सा न केवल हमारे हृदय, फेफड़े, और केंद्रीय तंत्रिका तंत्र का बल्कि पूरे ब्रेन की गतिविधि का नियंत्रण करता है. इसपर गोली लगने के परिणामस्वरूप जीवन और चेतना का लोप पलक झपकते ही हो जाता है.

गोली के केलिबर की तुलना में टी-बॉक्स का आकार अधिक होता है लेकिन ब्रेन के सॉफ्ट टिशूज़ पर गोली का आघात और ऊर्जा इतना विशाल प्रभाव डालती है कि ब्रेन की सारी गतिविधियां तत्काल थम जाती हैं. शूटिंग से जुड़ी एक और गलतफहमी यह भी है कि गोली का काम व्यक्ति के शरीर में केवल छेद करना ही नहीं होता बल्कि यह तीव्र गति से शरीर के भीतर जाने पर अपनी गतिज (kinetic) ऊर्जा को शरीर में स्थानांतरित कर देती है. 9mm की बेरेटा पिस्टल की गोली बहुत आसानी से मिलती हैं और इनका वजन 10 ग्राम से भी कम होता है. लेकिन लगभग 381 मीटर प्रति सेकंड की गति से आगे बढ़ने पर यह लगभग 3 न्यूटन का बल उत्पन्न करती हैं. 3 न्यूटन के इस बल को लोग मजाक में 3 सेब फल गिरने के बराबर बताते हैं लेकिन तीव्र गति से आपकी ओर बढ़ता हुआ धातु का नुकीला गर्म ऑब्जेक्ट जब शरीर से टकराता है तो उससे उत्पन्न कैविटी वास्तविकता में कहीं अधिक विशाल होती है. ब्रेन जैसा एक नाजुक अंग इतनी ऊर्जा को झेलने के लिए नहीं बना है. ब्रेन के भीतर के जो महत्वपूर्ण भाग एक दूसरे से गुंथे हुए होते हैं वे गोली के आघात से फटकर दूर-दूर हो जाते हैं और क्षत-विक्षत हो जाते हैं.
तो हमने यह जाना कि इस क्षेत्र में गोली लगने पर मृत्यु तत्काल और अवश्यंभावी होती है, लेकिन क्या हमें गोली लगने का पता चलेगा? जैसा कि ऊपर बताया गया है, 9mm बेरेटा पिस्टल की गोली की गति बैरल से निकलते वक्त लगभग 381 मीटर प्रति सेकंड होती है. यदि व्यक्ति बहुत निपुण है तो उसे किसी भी बात पर रिएक्ट करने के लिए कम से कम 0.2 सेकंड का समय चाहिए. बैरल से निकलनेवाली गोली व्यक्ति की ओर ध्वनि की गति से भी तेजी से आ रही है इसलिए उसे गोली चलने की आवाज़ गोली लगने के बाद ही सुनाई देगी. तब तक बहुत देर हो चुकी होगी. यदि गोली उसकी आंखों के ठीक सामने कुछ दूरी से चलाई गई है तो उसके ब्रेन में अंकित आखरी छवि केवल पिस्तौल की नली की होगी और अगले ही पल उसका ब्रेन बिखर चुका होगा.
अमेरिकन सैनिक ब्लॉगर जॉन डेविस की क्वोरा पोस्ट पर आधारित
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