नवजात शिशु जन्म लेते ही रोते क्यों हैं? उन्हें तो खुश होना चाहिए और हंसना चाहिए!
बच्चों का जन्म लेते ही रोना बहुत ज़रूरी है, रोते वक्त ही वे अपनी पहली सांस लेते हैं. प्रथम रूदन अर्थात प्रथम श्वास.
टेकनीकली कहें तो खिलखिलाकर हंसने से भी बच्चे सांस लेने की शुरुआत कर सकते हैं. खिलखिलाते वक्त भी तो हमारे फेफड़ों में हवा तेजी से आती-जाती है.
लेकिन रोते हुए दुनिया में आने की बजाए हंसते हुए दुनिया में आना बच्चे के लिए व्यावहारिक नहीं होता. क्योंकि…
शिशु जब अपनी मां के गर्भ में होते हैं तब वे सांस नहीं लेते. वे एम्नियोटिक सैक (amniotic sac) नामक एक थैली में होते हैं जिसमें एम्नियोटिक द्रव (amniotic fluid) भरा होता है. उस समय शिशुओं के फेफड़ों में हवा नहीं होती. उनके फेफड़ों में भी एम्नियोटिक द्रव भरा होता है.
इस स्थिति में बच्चे को सारा पोषण अपनी मां के द्वारा गर्भनाल के माध्यम से मिलता है. मां के शरीर से बाहर आती ही गर्भनाल काट दी जाती है.
जन्म लेते ही शिशु को उल्टा लटकाकर उसके फेफड़ों से एम्नियोटिक द्रव निकालना ज़रूरी होता है ताकि फेफडे सांस लेने के लिए तैयार हो सकें. इसके लिए यह ज़रूरी है कि शिशु कई लंबी सांसें ले ताकि फेफड़ों के कोने-कोने से एम्नियोटिक द्रव निकल जाए और फेफड़ों की कार्यात्मक इकाई एल्विओली (alveoli) तक हवा आने-जाने के मार्ग खुल जाएं. यदि शिशु स्वतः नहीं रोता तो उसे हल्की सी चपत लगाकर रुलाया जाता है.
द्रव के निकल जाने पर श्वास का मार्ग खुल जाता है और वायु का संचार होने लगता है.
रोने की क्रिया यह महत्वपूर्ण काम करती है. रोते समय शिशु एक बहुत गहरी सांस लेता है. नवजात शिशु द्वारा रोने की यह क्रिया दो चरणों में होती है:
- शिशु रोने की तैयारी के लिए एक गहरी सांस लेता है
- वह रोना शुरु करता है और सांस चलने लगती है
अच्छा रूदन यह सुनिश्चित करता है कि फेफड़ों से द्रव पूरी तरह से निकल चुका है. कभी-कभी शिशु यह अपने आप नहीं कर पाता तो मेडिकल स्टाफ किसी सक्शन ट्यूब या पंप का उपयोग करके उसके फेफड़ों से द्रव खींच लेता है.
हंसने की क्रिया से यह सब अच्छी तरह से नहीं हो सकता. हंसते समय हमें गहरी सांस लेने की ज़रूरत नहीं होती. खिलखिलाते वक्त हम छोटी-छोटी सांसें लेते हैं.
इसके अतिरिक्त प्रसव की क्रिया मां और शिशु दोनों के लिए कष्टदायक होती है. शिशु बहुत संकरे मार्ग से निकलकर दुनिया में आता है. बाहर का वातावरण उसके लिए मां के शरीर के भीतर के संरक्षित वातावरण से पूरी तरह से भिन्न होता है. सुरक्षित और संरक्षित वातावरण से निकलकर मुश्किलों से भरी दुनिया में आना किसके लिए खुशी की बात होगी? (image credit)