लियोनार्दो दा विंची का अभिशाप

आप लियोनार्दो दा विंची के बारे में जानते हैं. विश्वप्रसिद्ध मोनालिसा पेंटिग बनाने वाला वह कलाकार मध्ययुग का विलक्षण जीनियस व्यक्ति था. वह चित्रकार, मूर्तिकार, आर्कीटेक्ट, शरीर रचना विज्ञानी, डिज़ाइनर, और इंजीनियर था. उसकी विशेषज्ञता कला और विज्ञान के किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं थी, और उसके युग में ऐसा होना कोई बहुत बड़ी बात नहीं थी. दा विंची के अनेक समकालीन कई-कई क्षेत्रों में महारत रखते थे. महान चित्रकार माइकलएंजेलों भी इसी प्रकार का जीनियस था.

लेकिन आज हालात बहुत बदल गए हैं. आधुनिक समाज में दा विंची जैसे व्यक्तियों की कुछ खास पूछ-परख नहीं है. उस जैसी असाधारण प्रतिभा रखनेवाले व्यक्ति अब किसी एक क्षेत्र में पूरी तरह मास्टरी हासिल नहीं कर पाते और ज्ञान-विज्ञान केंद्रित हमारे अतिजटिल समाज में वे औसत प्रतिभाशाली व्यक्तियों से पिछड़ जाते हैं.

ऐसा क्यों होता है और दा विंची जैसे व्यक्तियों को इस समस्या से निकलने के उपाय मैं इस लेख में बताऊंगा. इससे आपको यह समझने में मदद मिलेगी कि क्यों कुछ लोग (जैसे मैं और शायद आप भी) किसी एक विषय या फ़ील्ड में मास्टरी हासिल नहीं कर पाते. इस पोस्ट में मुख्यतः इन बिंदुओं पर चर्चा की जाएगीः

  • क्यों किसी भी फ़ील्ड में कंपिटीशन अधिक होने पर हमारा हौसला पस्त पड़ने लगता है,
  • वे कौन सी एक्टीविटीज़ हैं जो दा विंची के अभिशाप से हमें मुक्त कर सकती हैं, और,
  • गाय, श्वान, और तारा एक्टीविटीज़ में क्या अंतर है।

मल्टी-टैलेंट्ड लोग स्पेशलाइजेशन पर केंद्रित वैश्विक व्यवस्था में अलग-थलग क्यों पड़ जाते हैं?

कुछ डॉक्टर केवल स्पाइनल सर्जरी करते हैं, कुछ मानसिक चिकित्सक महिलाओं के शिज़ोफ़्रेनिया के एक्सपर्ट होते हैं, और कुछ भौतिकविज्ञानी सिर्फ क्वांटम फ़िज़िक्स का ही अध्ययन करते हैं. हमारे समाज में किसी भी विषय की एक फ़ील्ड पर विशेषज्ञता रखनेवाले व्यक्तियों का महत्व और उनकी मांग बढ़ती जा रही है, और इसका बहुत अच्छा कारण है.

ऐसा इसलिए है कि सोलहवीं शताब्दी में दा विंची के काल से ही ज्ञान-विज्ञान का लगातार विस्तार होता जा रहा है. जैसे-जैसे सभी विषयों में जानकारियां और जटिलताएं बढ़ती जा रही हैं वैसे-वैसे उनके अलग-अलग टॉपिक्स पर विशेषज्ञता रखनेवालों का महत्व भी बढ़ रहा है.

स्पानल सर्जन का उदाहरण लेते हैं. स्पाइन से जुड़ी सर्जरी इतनी जटिल और कठिन हो गई है कि अब ऐसे सर्जनों की ज़रूरत पड़ती है जिन्होंने वर्षों तक इससे जुड़े मामलों का ही अध्ययन किया हो, ताकि उनसे किसी भी केस में छोटी-से-छोटी गलती भी न हो सके.

इसका अर्थ यह है कि जिस सर्जन को स्पानल सर्जरी की फ़ील्ड में अपना कैरियर बनाना है वह किसी वाद्य यंत्र को सीखने में या दुनिया भर के बेहतरीन व्यंजन खुद बनाकर खाने के शौक को समय नहीं दे पाएगा. उसे इन दो या तीन चीजों में से एक का ही चुनाव करना होगा क्योंकि तीनों एक्टीविटीज़ बहुत समय मांगती हैं. यदि आप एक बहुत जटिल स्किल डेवलप करना चाहते हैं तो आपको खुद को किसी एक फ़ील्ड में ही समर्पित करना होगा.

मल्टी-टैलेंटेड लोगों के सामने सबसे बड़ी समस्या यही है. उन्हें इससे ही संघर्ष करना है.

मल्टी-टैलेंटेड व्यक्तियों के भीतर उनके हर टैलेंट को साकार करने की इच्छा बहुत तीव्र होती है लेकिन वे इस बात को भली-भांति जानते हैं कि उन्हें इसके लिए पर्याप्त समय नहीं मिलेगा. ऐसे लोग बहुत उत्सुक स्वभाव के होते हैं और  उनकी उत्सुकता उन्हें एक से दूसरे विषय पर भटकाती रहती है, जिसके परिणामस्वरूप वे एक बिंदु पर महारत हासिल करने के लिए ज़रूरी परिश्रम नहीं कर पाते. किसी नई फ़ील्ड की जानकारी मिलने पर वे उत्साह से भर जाते हैं और उसमें गोता लगा देते हैं लेकिन उसके बेसिक्स को सीखने-समझने के दौरान ही उनकी दृष्टि किसी और फ़ील्ड पर पड़ती है और पहली फ़ील्ड में उनकी रूचि और आकर्षण कम पड़ जाता है.

इसे मैं अपने ही उदाहरण से समझाता हूं. किशोरावस्था में मेरी रुचि शास्त्रीय संगीत में जगी और मैंने वायलिन सीखना शुरु कर दिया. कुछ महीनों के भीतर ही मेरा उत्साह कम होने लगा. मैंने वायलिन क्लास जाना बंद कर दिया और मैं किसी दूसरी एक्टीविटी में उलझ गया.

दा विंची व्यक्तित्व के लोग कंपीटीशन से घबराते हैं और उस फ़ील्ड की खोज करते रहते हैं जहां वे अकेले टिके रह सकें.

सधी हुई दृष्टि होने पर जीवन को उसका उद्देश्य मिल जाता है लेकिन दा विंची व्यक्तियों में इस टेंडेंसी का अभाव होता है. वे बार-बार अपनी दिशा बदलते हैं, वे नित-नए शौक पालते रहते हैं और किसी भी नौकरी में टिक नहीं पाते.

क्यों?

क्योंकि वे कंपीटिशन से डरते हैं.

बहुत से लोगों के लिए स्वस्थ कंपीटिशन का होना उनकी स्किल्स को निखारने और उभारने में सहायक होता है, लेकिन दा विंची व्यक्तियों के साथ ऐसा नहीं होता.

किसी भी क्षेत्र में कंपीटिशन होने पर दा विंची व्यक्ति ठीक उसी समय उस फ़ील्ड को छोड़ देते हैं जब चीजें रोचक लगने लगती हैं और उनका हाथ जमने लगता है. वे किसी दूसरे शौक या स्किल पर हाथ आजमाने लगते हैं – और थोड़ा-बहुत सीख जाने पर उनके मन में यह विश्वास घर कर जाता है कि वे उसे फिर कभी पूरी तरह सीख लेंगे… लेकिन वे उसे भी अधूरा छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं.

उदारहण के लिए, यदि वे टेनिस सीखना शुरु करते हैं तो उस सीमा तक प्रेक्टिस करते हैं जब उनका मन यह कहने लगता है कि “यह तो कोई खास मुश्किल नहीं है  – मैं तो जब चाहूं तब बढ़िया टेनिस प्लेयर बन सकता हूं”. इस पॉइंट पर फ़ील्ड को छोड़ देने पर उनके मन में किसी अच्छे प्लेयर को चैलेंज किए बिना ही जीत जाने जैसी गर्वीली अनुभूति बनी रहती है.

इसके साथ ही दा विंची व्यक्ति  आलोचना से भी घबराते हैं. वे इस तथ्य को नहीं समझना चाहते कि हर मास्टर को स्टूडेंट के स्तर से ही शुरुआत करनी पड़ती है. वे फ़ीडबैक को बाधा की तरह लेते हैं. किसी भी काम में जब जटिलता बढ़ जाती है या कठिनाई आने लगती है तब वे उसे पार करके अगले लेवल तक जाने की बजाए अक्सर फ़ील्ड ही चेंज कर देते हैं.

इस प्रकार की दिशाहीनता से दा विंची व्यक्तियों में निराशा जन्म लेने लगती है.

किसी भी एक फ़ील्ड के प्रति समर्पित हो सकने की यह अक्षमता उन्हें कई फ़ील्ड्स की सतही जानकारी होने तक सीमित कर देती है. वे बहुत सी फ़ील्ड्स की औसत जानकारी ही रख पाते हैं फिर भी अपने मन को यह कहकर दिलासा देते हैं कि वे “Jacks of all trades, masters of none” हैं.

इस तरह कई साल तक एक से दूसरी फ़ील्ड पर उछलते-कूदते रहने पर उन्हें यह अहसास होने लगता है कि उन्होंने अपना वक्त बर्बाद कर दिया है. उन्होंने अनेक फ़ील्ड्स की मामूली जानकारियां तो जुटा लीं लेकिन वे किसी भी विषय की गहराई में नहीं गए. इससे भी बुरी बात यह है कि वे यह कभी जान ही नहीं पाए कि उनकी योग्यता किस क्षेत्र में थी. प्रौढ़ावस्था तक पहुचते-पहुंचते उनकी निराशा गहराने लगती है क्योंकि वे यह जान जाते हैं कि उनके पास अब बहुत अधिक समय नहीं बचा, और वे अभी भी अपने तमाम तरह के टैलेंट को व्यर्थ होते देखते रहते हैं.

दा विंची के अभिशाप से मुक्ति पाने के लिए ऐसी एक्टीविटी खोजिए जो आपके अधिक-से-अधिक टैलेंट को समाहित करती हो.

यदि आप भी मेरी तरह हैं और खुद को दा विंची समुदाय से जुड़ा महसूस करते हैं तो इस समस्या का समाधान आप कैसे करेंगे? दा विंची  के अभिशाप से मुक्ति कैसे मिलेगी?

इसके लिए आपको सिर्फ इतना करना है कि आप पर्याप्त रूप से जटिल कोई ऐसी एक्टीविटी खोजें जिसमें आपके अधिक-से-अधिक टैलेंट्स शामिल किए जा सकें.

दा विंची व्यक्तियों की पर्सनालिटी जटिल होती है और जटिलता भरी चीजें या टास्क ही उन्हें संतुष्ट करते हैं. यदि उस टास्क में ऐसी बातें नहीं हैं जो उनके अलग-अलग टैलेंट्स से जुड़ी हों तो उनका ध्यान भटकने लगेगा और वे उस टास्क में रुचि नहीं लेंगे.

मैं इसे अपने उदाहरण से समझाता हूं. मैं एक टिपिकल दा विंची व्यक्तित्व हूं और मैंने सैंकड़ों तरह की चीजें आजमाकर देखी हैं. मैंने टीचिंग, पत्रकारिता, मार्केटिंग, फ्रीलांसिग और पब्लिक सेक्टर में नौकरी करने से लेकर तमाम तरह की हॉबीज़ और इंट्रेस्ट पाले – लेकिन मैं कभी भी यह नहीं जान पाया कि वह कौन सा एकमात्र कार्य था जो मुझे करते रहना चाहिए था.

एक दिन मैंने बैठे-ठाले सर्फिंग करने के दौरान ही एक ब्लॉग बना लिया जिसमें मैं उन अबूझ सी कहानियों का अनुवाद डालने लगा जो बहुत कम ही पढ़ी जाती थीं या बहुत कम पढ़ने में आती थीं. शुरुआत में यह सब करना बहुत कठिन था. इसमें कई तकनीकी चुनौतियां थीं. सामग्री को जुटाने के लिए बहुत सर्च करनी पड़ती थी. यह भूसे के ढेर में सुई खोजने जैसा काम था. लेकिन इस काम ने मुझे दा विंची के अभिशाप से मुक्ति दिलाने में मदद की. इस काम में मैंने अपनी साहित्यिक और भाषिक क्षमताओं का उपयोग किया. तकनीकी काम में शुरु से ही रुचि होने के कारण मैंने ब्लॉगिंग से जुड़ी कठिनाइयों का समाधान खोजने के लिए अपन प्रॉब्लम-सॉल्विंग एप्रोच की मदद ली. ब्लॉगिंग ही पिछले नौ सालों से वह एकमात्र एक्टीविटी है जिसमें में टिके रह पाया और उन्नति करता रहा.

ये तो रही मेरी कहानी. आपकी कहानी क्या है?

अब मैं आपको यह बताऊंगा कि किस तरह कोई भी व्यक्ति एक तार्किक पद्धति का उपयोग करके यह पता लगा सकता है कि उसके लिए क्या करना सही रहेगा. उन उपायों ये वह यह पता लगा सकेगा कि उसका वास्तविक उद्देश्य क्या है.

अपने उद्देश्य का पता लगाने के लिए आपको पहले एक लंबी विश लिस्ट और फिर एक छोटी लिस्ट बनानी होगी.

इस विधि में तीन स्टेप्स हैं, जिनमें से पहली स्टेप को मैं प्रीसेलेक्शन स्टेप कहता हूं. प्रीसेलेक्शन के दौरान आपको उन एक्टीविटीज़ की बड़ी लिस्ट बनानी है जो आप करना पसंद करते हैं.

कुछ पलों के लिए यह कल्पना कीजिए कि आपके पास बेहिसाब समय और धन है. ऐसे में आप अपनी ज़िंदगी किस तरह बिताएंगे? अब लिस्ट में आप अपने दिमाग में आनेवाली सारी सब एक्टीविटीज़ नोट करते जाएं जैसे आपको पसंद आनेवाले काम, हॉबीज़ और वन-टाइम एक्टीविटीज़ जैसे  किसी विश्वप्रसिद्ध यूनीवर्सिटी में पढ़ाई, ऑस्ट्रेलिया में स्कूबा डाइविंग, पैराशूटिंग, पियानो खरीदना, आदि-आदि. इस लिस्ट में आप अपने अजीबोगरीब सपनों को भी लिख सकते हैं जैसे पॉप स्टार बनना या मंगल ग्रह की यात्रा करना.

आपकी ख्वाहिशों और सपनों की लिस्ट बन जानेपर आप प्रीसेलेक्शन की प्रोसेस शुरु कर सकते हैं. इस स्टेज से गुज़रने के लिए आपको हर एक्टीविटी को तीन शर्तों पर परखना हैः 1. क्या यह बहुत रोचक (फ़न) है, 2. क्या आपमें यह टैलेंट है, और 3. क्या आप इससे पैसा कमा सकते हैं?

अपनी लिस्ट को देखिए और उन एक्टीविटीज़ को गोले से मार्क करते जाएं जो इन तीनों शर्तों को पूरा करती हैं. जो एक्टीविटीज़ इन तीनों शर्तों को पूरा नहीं करतीं उन्हें ढोते रहने में कोई सार नहीं है. जिन एक्टीविटीज़ से आपको कोई आमदनी नहीं हो वे सिर्फ हॉबी हैं. रोचक नहीं होने पर भी आपको धनवान बनाने वाली एक्टीविटीज़ करने पर आपको खुशी नहीं मिलेगी. जिस एक्टीविटीज़ के लिए आपमें ज़रूरी टैलेंट ही न हो उसके बारे में सोचकर परेशान क्यों होना?

प्रीसेलेक्शन की स्टेज से गुज़रने के बाद हम अगली स्टेप पर जाकर अपने उद्देश्य की परख कर सकते हैं.

इस स्टेप में हम अपनी लिस्ट की व्यावहारिक दृष्टि से और चरणबद्ध तरीके से जांच-पड़ताल करते हैं.

अपनी पहली लिस्ट में हमने उन चीजों का पता लगाया जो टैलेंट, पैसा और फ़न के दायरे में आती हैं. अब हम अपनी रिल्ट को दो प्रश्न पूछकर थोड़ा और रिफ़ाइन करेंगे. पहलाः हमारी हर एक्टीविटी में पैसा कमाने का कितना पोटेंशियल है? दूसराः हर एक्टीविटी को करने पर हमें कितनी मानसिक संतुष्टि मिलेगी?

इस प्रश्नों का चरणबद्ध तरीके से उत्तर देने के लिए हम BCG मैट्रिक्स पद्धति का उपयोग कर सकते हैं.

BCG मैट्रिक्स पद्धति को इसे विकसित करनेवाले Boston Consulting Group के नाम से जाना जाता है. यह सिस्टम कंपनियों को यह जानने में मदद करता है कि उन्हें किन प्रोडक्ट्स् में इन्वेस्ट करना चाहिए. इसके लिए यह प्रोडक्ट्स् को चार श्रेणियों (गाय, श्वान, तारा, और प्रश्नचिन्ह) में बांटता है. अपनी एक्टीविटीज़ को इन चार कैटेगरीज़ में बांटकर हम उस एक्टीविटी का पता लगा सकते हैं जिसे करते रहना हमारे लिए हर तरह से उपयुक्त होगा.

गाय एक्टीविटीज़ वे हैं जो हमें संपन्न बनाती हैं (जैसे दूध देनेवाली गाय) लेकिन जिन्हें करने में बिल्कुल मज़ा नहीं आता. श्वान एक्टीविटीज़ वे हैं जिनसे हमें किसी तरह का लाभ नहीं होता. आप गाय और श्वान एक्टीविटीज़ को दरकिनार कर सकते हैं लेकिन तारा गतिविधियों को नहीं क्योंकि वे आपके ड्रीम ज़ॉब्स हैं, जो आपको धनवान बनाने के साथ-साथ संतुष्टि भी प्रदान करेंगे.

प्रश्नचिन्ह वाली एक्टीविटीज़ वे हैं जिन्हें आप करना पसंद करते हैं लेकिन जिनसे किसी तरह की आय होने की संभावना न के बराबर है. आप इन एक्टीविटीज़ को कचरे के डिब्बे में नहीं फेंक सकते. आप इन्हें करना ज़ारी रखें और उन तरीकों का पता लगाने की कोशिश करें जो आपको इन एक्टीविटीज़ के ज़रिए कुछ कमाने का अवसर दें. अगर आप लकी होंगे तो एक दिन ये एक्टीविटीज़ आपको बहुत लाभ पहुंचा सकती हैं.

यदि आपने अपनी गाय, श्वान, तारा, और प्रश्नचिन्ह एक्टीविटीज़ को पहचान लिया हो तो हम अब तीसरी और फ़ाइनल स्टेप की ओर बढ़ेंगे.

इसके लिए हमें अपने डर, टालमटोल की आदत, मेंटल ब्लॉक और नारसीसिज्म के बीच संतुलन कायम करना होगा.

पहली दो स्टेप्स ने हमें अपनी प्रिय एक्टीविटीज़ को पहचानने और उनकी परख करने में सहायता की. तीसरी स्टेप में हम यह सुनिश्चित करते हैं कि हमारा बनाया नया प्लान ध्वस्त न हो जाए. चलिए देखते हैं कि हमें अपनी कार्ययोजना को कुशलतापूर्वक पूरा करने के लिए किन बाधाओं को पार करना ज़रूरी है.

सबसे पहले हमें थोड़ा भय चाहिए… थोड़ा सा डर… ज्यादा नहीं.

यदि आपकी नई योजना आपको ज़रा सा भी भयभीत नहीं करती तो वह पर्याप्त महत्वाकांक्षी योजना नहीं है. और यदि वह महत्वाकांक्षी नहीं है तो आपको खुशी नहीं दे पाएगी.

वहीं दूसरी ओर यदि आप अपनी योजना को लेकर अधिक भयभीत हो तो आपने सायद बहुत ऊंचे मंसूबे बना लिए हैं. आपको अपनी योजना को पुनरावलोकन तब तक करना चाहिए जब तक आप किसी संतुलन तक नहीं पहुंच जाओ… वह संतुलन जहां भय न तो अस्पष्ट हो और न ही प्रचंड हो.

दूसरी ज़रूरी चीज़ यह है कि हम टालमटोल करने से पूरी तरह से बचें. यदि हम टालमटोल करते रहेंगे तो हम अपने लक्ष्य की दिशा में एक कदम भी नहीं चल सकेंगे. किसी-किसी दिन थोड़ा आलसी हो जाना चलता है लेकिन इसे अपनी आदत बना लेना बहुत बुरा होगा.

तीसरा, हमें अपने क्रिएटिव ब्लॉक पर जीत हासिल करनी होगी. हम सभी अपने महत्वाकांक्षी ड्रीम प्रोजेक्ट पर मन लगाकर काम कर रहे होते हैं पर किसी दिन हमें अचानक यह अहसास होता है कि हमारी सारी इन्सपिरेशन गायब हो गई है. लोगों को लगता है कि ऐसा आलस के कारण होता है लेकिन यह गलत तथ्य है. असल में होता यह है कि हम यह भूल जाते हैं कि क्या कर रहे हैं और क्यों कर रहे हैं. इस क्रिएटिव ब्लॉक से छुटकारा पाने के लिए हमें उस बात की तह तक दोबारा जाकर देखना चाहिए जिसने हमें उस काम में जी-जान से जुट जाने के लिए प्रेरित किया था.

और अंत में हमें अपने नारसीसिज्म को संभालना होगा. नारसीसिज्म का मलतब है खुद पर हद से0 ज्यादा गुमान होना या खुद को ही सबसे अधिक पसंद करना. हम सभी में आत्मसम्मान की स्वस्थ भावना होनी ही चाहिए लेकिन कभी-कभी यह इतने गहरे अहंकार में बदल जाती है कि उन्माद या तनाव का कारण बन जाती है. जब हम खुद को या खुद की काबिलियत को लेकर बहुत ऊंचा सोचने लगते हैं तो हमारा व्यवहार विचित्र हो जाता है. ऐसी स्थिति में हम किसी ऐसे व्यक्ति की तरह व्यवहार करने लगते हैं जिसपर कोई जुनून सवार हो गया हो. इस दशा में कुछ समय तक काम करने के बाद जब हमारा सामना वास्तविकता से होता है तो हम डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं क्योंकि हमने बिना सोचेसमझे ही इतने विराट लक्ष्य बना लिए थे जिन्हें पूरा करना हमारे लिए संभव नहीं था.

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

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