डरपोक चूहा

benबहुत पुरानी बात है. कहीं एक चूहा रहता था जो बिल्लियों से बहुत डरता था. वह एक ओझा के पास गया और बोला, “मुझे बिल्लियों से बहुत डर लगता है. कृपया मुझे भी एक बिल्ली बना दें ताकि मैं उनसे भयभीत न रहूँ.”

ओझा को चूहे पर दया आ गयीं और उसने चूहे को बिल्ली में बदल दिया. चूहे (बिल्ली) ने ओझा को धन्यवाद कहा और अपने रास्ते चल दिया.

कुछ दिनों बाद चूहा (बिल्ली) ओझा के पास फिर आया और बोला, “मैं बिल्लियों से नहीं डरता लेकिन अब मुझे कुत्ते बहुत सताते हैं.” ओझा ने चूहे (बिल्ली) को कुत्ते में बदल दिया.

चूहा (बिल्ली/कुत्ता) कुछ दिन बाद फिर से ओझा से मिलने आ गया और बोला, “मैं जंगल में नहीं जा सकता क्योंकि वहां भयानक शेर रहता है. वह मुझे खा जायेगा. आप मुझे शेर में बदल दें तो बड़ी कृपा होगी.” ओझा ने पिंड छुड़ाने के लिए उसे शेर में बदल दिया. चूहा (बिल्ली/कुत्ता/शेर) भयंकर गर्जना करते हुए वहां से चला गया.

कुछ दिनों के बाद परेशान चूहा (बिल्ली/कुत्ता/शेर) फिर से ओझा के सामने आ खड़ा हुआ और बोला, “जंगल में मैं सबसे ताकतवर हूँ लेकिन शिकारियों के तीरों का सामना नहीं कर सकता. अब मैं क्या करूं?”

बार-बार की शिकायतों से तंग आकर ओझा ने चूहे (बिल्ली/कुत्ता/शेर) को फिर से चूहे में बदल दिया और कहा, “तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता क्योंकि तुम्हारे भीतर चूहे की आत्मा है.”

There are 22 comments

  1. चंदन कुमार मिश्र

    यह तो संस्कृत की कथा ‘मूषक: पुनर्मूषको भव:’ में की गई छेड़छाड़ है…उसमें है कि जब चूहा बाघ बन जाता है तब भी बार-बार मुहल्ले वाले कहते हैं कि देखो इस साधु ने इस चूहे को बाघ बना दिया…यह सुनते-सुनते चूहा एकदिन साधू पर गुस्सा कर उसी को मार देना चाहता है…जैसे ही मारना चाहता है…साधू उसे फिर चूहा बना देता है…

  2. सुज्ञ

    आवश्यक्ता हो या आशा, अन्ततः मात्र इच्छा ही तो है। खत्म नहीं होती इसलिए तृष्णा कहलाती है। और तृष्णाएँ कभी नहीं मिटती।

    संतोष और साहस हो तो कुछ भी हीन अथवा दुष्कर नहीं है।

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