किताबों के बारे में

यह बात अक्सर कही जाती है कि “यदि पूरी दुनिया में किसी काम को करनेवाला मात्र एक ही आदमी है तो हम भी वह काम कर सकते हैं. ज़रुरत इस बात की है कि हम उसे करने की दिशा में कदम बढ़ाएं या कोशिश करें”. मैं काफी हद तक इसमें यकीन रखता हूँ लेकिन यह मेरे लिए एक किताबी बात ही बनकर रह गई है. इसी तरह यह वेबसाईट भी किताबी बातों का एक संग्रह ही है. इसमें दुनिया भर का ‘ज्ञान’ मौजूद है लेकिन ज्यादातर लोगों के लिए उसकी अहमियत उतनी ही है जितनी किसी अखबार में रोजाना छपनेवाली सूक्तियों की होती है. हम उसे दो सैकंड में पढ़ लेते हैं, फिर हम राशिफल भी पढ़ते हैं और चंद मिनटों में दोनों चीज़ें भुला दी जाती हैं. व्यक्तिगत अनुभव के सांचे में ढलकर कोई ‘ज्ञान’ की बात जब तक व्यक्तित्व का अंग न बन जाए तब तक वह किताबी ही तो कहलायेगी.

किताबी बातों और किताबों का ज़िक्र करूं तो कुछ दिन पहले मैं अपने घर गया था जहाँ मैंने अपनी किताबें उल्टी-पलटीं और गैरज़रूरी किताबों को निकाल बाहर किया. बहुत सी किताबों को रद्दी का रास्ता दिखने में अफ़सोस तो हुआ लेकिन मुझे लगता नहीं कि वे किसी और के काम आ सकतीं हैं. ऐसी किताबों में ज्यादातर वे किताबें शामिल थीं जो कभी कोर्स का हिस्सा थीं या गलती से खरीद ली गयीं थीं. मैंने किताबों के शेल्फ के फोटो फेसबुक पर भी डाले थे.

चाहे जो हो, किताबों का जादू अभी भी सर चढ़कर बोलता है. मुझे अपने कलेक्शन में शामिल बहुतेरी किताबें पढ़ना बाकी हैं लेकिन गाहे-बगाहे नई किताबें आती रहतीं हैं और पढ़ी जाने के बाद पलंग के बॉक्स में रख दी जातीं हैं. मुझे यकीन नहीं होता कि बिना किताबों के मेरी ज़िंदगी कैसी होती. नेट तो अभी कुछ बरस पहले ही आया है, उससे पहले तो दुनिया भर की बातें किताबों में पढ़ने से ही मेरी विचार प्रक्रिया और कुछ हद तक शख्सियत भी बन चुकी थी. मनुष्यता के इतिहास में जिसने भी कभी कुछ अलहदा सोचा या किया, वह किताबों की शक्ल में हमारे सामने है. हमारे मन के भीतर पल रहे भ्रम और चल रहे द्वंद्व को दुनिया में कहीं किसी ने अनुभव किया और लिखा है. न जाने किस भाषा में लिखी वह किताब दुनिया के किस घर में धूल से पटे शेल्फ पर कई दशकों से खड़ी बाट जोह रही हो.

अंग्रेजी की कुछ पुरानी किताबों की तलाश मुझे अंतरजाल पर एक नए पाते तक ले गयी. यह ‘ओपन लाइब्रेरी’ नामक प्रोजेक्ट है. इसे देखकर मुझे इसके ही समानांतर हिंदी वेबसाईट की कमी बड़ी गहराई से महसूस हुई. बहुत कम हिंदी पुस्तकें अंतर्जाल पर उपलब्ध हैं. उन्हें टाइप करके उपलब्ध कराना बहुत अधिक परिश्रम व साधन मांगता है और स्कैन करके पोस्ट करने में कॉपीराईट आदि के बड़े पचड़े हैं.

‘ओपन लाइब्रेरी’ प्रोजेक्ट देखकर कुछ सवाल मेरे मन में कौंध गए:

क्या कोई ऐसी लाइब्रेरी हो सकती हैं जिसमें अब तक छपी हर किताब मौजूद हो? सिर्फ बिकने लायक या महत्वपूर्ण या किसी एक भाषा की किताब नहीं बल्कि हर वह किताब जो पृथ्वी पर मनुष्यों की सांस्कृतिक विरासत की साक्षी हो.

अगर कभी ऐसा हुआ तो यकीनन इंटरनेट पर ही होगा. दुनिया की कोई लाइब्रेरी इतनी बड़ी नहीं हो सकती जिसमें करोड़ों किताबें समा सकें. लेकिन वेबसाईट की तो कोई सीमा नहीं है, ऐसा हम विकिपीडिया में देख चुके हैं जिसे दुनिया के हर देश के नागरिक देख सकते हैं और उसकी सामग्री की देखरेख भी कर सकते हैं.

विकिसोर्स या विकिबुक्स इसके वर्तमान विकल्प हैं लेकिन वे अधिक उपयोगी नहीं हैं. विराट ओपन लाइब्रेरी जैसी योजना के अंतर्गत विश्व के हर महत्वपूर्ण प्रकाशन और पुस्तकालय को लिंकित किया जा सकता है. लाइब्रेरी को उन्नत बनाने के लिए व्यक्तियों को किताबें उपलब्ध कराने के लिए प्रेरित किया जा सकता है. वेबसाईट का डेटाबेस इतना अच्छा बनाया जा सकता है कि उपयोक्ता विश्व में कहीं से भी वांछित पुस्तक को पढ़, खरीद, या डाउनलोड कर सके. इसे और बेहतरीन बनाने के लिए इसमें गुडरीड्स की भांति रेटिंग, रिव्यू, और डिस्कशन के फीचर जोड़े जा सकते हैं. अंग्रेजी में इससे मिलती-जुलती सेवाएं देने वाली कई वेबसाईट हैं लेकिन वे परिपूर्ण नहीं हैं. हिंदी के लिए ऐसी एक भी वेबसाईट नहीं है. हिंदी वाले सुन रहे हैं न?

ऐसी वेबसाईट जब कभी भी बने उसे पूरी तरह ‘ओपन’ होना चाहिए. सिर्फ ‘मुफ्त’ या ‘निशुल्क’ होना ही काफी नहीं होगा. यह इतनी मुक्त हो कि एक आम पाठक या उपयोक्ता उसका कैटलोग में नयी प्रविष्टियाँ बना सके या उसे अपडेट रख सके. ऐसी वेबसाईट में वैतनिक/अवैतनिक कर्मी भी रखे जा सकते हैं. वेबसाईट का संचालन किसी समूह या मंडल द्वारा किया जा सकता है. बीते दशक में किताबों में लोगों की दिलचस्पी कुछ कम हुई है क्योंकि छपी किताब के कई विकल्प आ गए हैं. बीच में मैंने किन्डल आजमाने के बारे में सोचा लेकिन रवि रतलामी जी के ब्लॉग पर रिचर्ड स्टालमेन के विचार पढ़कर मन बदल गया.

किताबें ज्यादा छपें या कम, उनपर प्रकाशकीय नियंत्रण कठोर ही है. लाइब्रेरी की अलमारियों में बंद किताबों तक भी लोगों की पहुँच कम है. इसलिए यह ज़रूरी हो गया है कि किसी तरह की मुक्त व्यवस्था का उदय हो.

ओपन लाइब्रेरी की शुरुआत करनेवाले व्यक्तियों का प्रयास प्रशंसनीय है. काश ऐसा ही कुछ हिंदी जगत में भी हो सके. कविता कोश वाले ललित कुमार इसके बारे में बेहतर बता सकते हैं.

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

There are 13 comments

  1. अनूप शुक्ल

    किताबें सारी नेट पर न जाने कब आ पायेंगी। काश कभी ऐसा हो पाता। लेकिन अगर ऐसा कभी होगा तो वो भी एक दूसरी दुनिया की ही तरह होगा। न जाने कब किसी किताब तक पहुंच सकेंगे। कब पढ़ सकेंगे। 🙂

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  2. Himanshu

    ओपन लाइब्रेरी प्रोजेक्ट अच्छा है। विभिन्न संस्करण व उनके उपलब्धता के ब्यौरे कुछ हद तक मिल जाते हैं।
    हिन्दी में स्वयं-सेवा जुनून बन जाय तो काम बने! कविता कोश का काम बड़ा है..पर कितना ठिठका हुआ-सा इस वक़्त!
    हिन्दी-पट्टी नेट पर भी आयी तो अपनी सीमाओं के साथ! अनूप जी द्वारा लिया गया आलोक जी का इण्टरव्यू भी कुछ बातें खोलता है।
    ब्लॉगिंग की गाड़ी थोड़ी चल तो निकली (अपने पूर्वाग्रह, अपनी सीमाओं के साथ) पर हिन्दी की पठनीय सामग्री, उल्लेखनीय ग्रंथ आदि यूँ ही अनजान से बने हुए हैं नेट के लिए!
    आड़े तो आता है….कहीं धन, कहीं मन और कहीं समर्पण!

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  3. indiasmart

    विचारणीय आलेख! दिनों दिन बढती जानकारी/सूचना (सही, पूरी, ग़लत और अधूरी) का एकत्रीकरण और उपयोग एक विश्वव्यापी समस्या है। हिन्दी पुस्तकों के डिजिटलीकरण में ललित कुमार जैसे अनुभवी लोगों की जानकारी और अनुभव बड़े काम के सिद्ध हो सकते हैं।

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  4. hsonline

    “हिन्दी समय” एक अच्छा प्रयास है। प्रामाणिक भी क्योंकि इंदी विश्वविद्यालय वर्धा का है, तो ये चलता रहेगा काम वहां का। कृपया देखें हिंदीसमय डॉट कॉम

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