The Tunnel – सुरंग

light at the end of the tunnel

ज़ेन्केई एक समुराई का पुत्र था. वह इदो प्रांत की यात्रा पर गया और वहां एक बड़े अधिकारी का सहायक बन गया. अधिकारी की पत्नी से उसके अंतरंग संबंध बन गए जिसका पता चलने पर ज़ेन्केई और अधिकारी के बीच द्वंद्वयुद्ध हो गया. आत्मरक्षा के लिए ज़ेन्केई को अधिकारी का वध करना पडा. फिर वह उस स्त्री के साथ भाग गया.

वे दोनों राजमार्ग पर लोगों को ठगने लगे. अधिकारी की पत्नी का लालच बढ़ता ही जा रहा था और इससे ज़ेन्केई भयभीत हो गया. एक दिन वह उसे छोड़कर बुज़ेन प्रांत चला गया और वहां भिक्षावृत्ति करने लगा.

अपने अतीत का प्रायश्चित करने के लिए ज़ेन्केई ने प्रण किया कि वह भले कर्म करेगा. जब उसे यह पता चला कि एक खतरनाक पहाड़ी मार्ग से गिरकर बहुत लोगों की मृत्यु हो चुकी है तो उसने निश्चय कर लिया कि वह पहाड़ के भीतर एक सुरंग बनाएगा.

ज़ेन्केई दिन में भिक्षा मांगता और रात को पहाड़ काटने का काम करता. इस काम में तीस साल गुज़र गए. सुरंग अब तक 2000 हाथ लंबी, 20 हाथ ऊंची, और 30 हाथ चौड़ी बन चुकी थी.

काम ख़त्म होने में लगभग दो साल ही बचे थे तभी तीस साल पहले मारे गए अधिकारी का युवा पुत्र ज़ेन्केई को खोजता हुआ वहां आ पहुंचा. वह बहुत कुशल तलवारबाज था. उसने ज़ेन्केई से कहा कि वह अपने पिता की हत्या का प्रतिशोध लेने आया है.

ज़ेन्केई ने उससे कहा, “मैं सहर्ष अपना जीवन तुम्हें सौंप दूगा, मुझे बस अपना काम पूरा कर लेने दो. जिस दिन यह सुरंग बनकर तैयार हो जाये उस दिन तुम मुझे मार सकते हो”.

युवक ने ज़ेन्केई की बात मान ली. कुछ महीने गुज़र गए और ज़ेन्केई अपने काम में लगा रहा. युवक खाली बैठे-बैठे उकता गया और वह भी ज़ेन्केई के काम में हाथ बंटाने लगा. वर्ष बीतने तक वह ज़ेन्केई के चरित्र और दृढ़निष्ठा का कायल हो गया.

अंततः सुरंग पूरी बन गयी और आमजन उसका उपयोग करने लगे.

“अब तुम मुझे मार सकते हो”, ज़ेन्केई ने कहा, “मेरा काम पूरा हो गया है”.

“मैं अपने गुरु का वध कैसे कर सकता हूँ?!”, युवक ने अश्रुपूरित नेत्रों से कहा.

* * * * * * * * * *

Zenkai, the son of a samurai, journeyed to Edo and there became the retainer of a high official. He fell in love with the official’s wife and was discovered. In self-defense, he slew the official. Then he ran away with the wife.

Both of them later became thieves. But the woman was so greedy that Zenkai grew disgusted. Finally, leaving her, he journeyed far away to the province of Buzen, where he became a wandering mendicant.

To atone for his past, Zenkai resolved to accomplish some good deed in his lifetime. Knowing of a dangerous road over a cliff that had caused the death and injury of many persons, he resolved to cut a tunnel through the mountain there.

Begging food in the daytime, Zenkai worked at night digging his tunnel. When thirty years had gone by, the tunnel was 2,280 feet long, 20 feet high, and 30 feet wide.

Two years before the work was completed, the son of the official he had slain, who was a skilful swordsman, found Zenkai out and came to kill him in revenge.

“I will give you my life willingly,” said Zenkai. “Only let me finish this work. On the day it is completed, then you may kill me.”

So the son awaited the day. Several months passed and Zenkai kept on digging. The son grew tired of doing nothing and began to help with the digging. After he had helped for more than a year, he came to admire Zenkai’s strong will and character.

At last the tunnel was completed and the people could use it and travel in safety.

“Now cut off my head,” said Zenkai. “My work is done.”

“How can I cut off my own teacher’s head?” asked the younger man with tears in his eyes.

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

There are 14 comments

  1. विवेक गुप्ता

    जो बात छोटी-छोटी कथाओं में है, वह तथाकथित प्रेरक वक्ताओं के दो-दो घंटे लंबे भाषणों में भी नहीं.
    शुक्र है कि आप फ़िर से पुराने फ़ार्म में आ गए हैं.
    बडी अच्छी सीख है- जब गलती का भान हो जाए, प्रायश्चित शुरू कर दें. प्रायश्चित करने से पाप, शत्रुता सब नष्ट हो जाती है.

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  2. चंदन कुमार मिश्र

    इसका शीर्षक सुरंग ठीक नहीं लगा। हाँ यह पूर्णविराम की जगह फुल स्टाप भी हिन्दी में नहीं लिखा जाता तो बेहतर होता। लिखता तो मैं भी हिन्दीराइटर से ही हूँ!

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