पथ का निर्माण : Making the Path

austrian calfजंगल में चराई के बाद किसी बछड़े को गाँव की गौशाला तक लौटना था. नन्हा बछड़ा था तो अबोध ही, वह चट्टानों, मिट्टी के टीलों, और ढलानों पर से उछलता-कूदता हुआ अपने गंतव्य तक पहुँचने में सफल हो गया.

अगले दिन एक कुत्ते ने भी गाँव तक पहुँचने के लिए उसी रास्ते का इस्तेमाल किया. उसके अगले दिन एक भेड़ उस रास्ते पर चल पड़ी. एक भेड़ के पीछे अनेक भेड़ चल पडीं. भेड़ जो ठहरीं! 

 उस रास्ते पर चलाफिरी के निशान देखकर लोगों ने भी उसका इस्तेमाल शुरू कर दिया. ऊंची-नीची पथरीली जमीन पर आते-जाते समय वे पथ की दुरूहता को कोसते रहते – पथ था ही ऐसा! लेकिन किसी ने भी सरल-सुगम पथ की खोज के लिए प्रयास नहीं किये.

समय बीतने के साथ वह पगडंडी उस गाँव तक पहुँचने का मुख्य मार्ग बन गयी जिसपर बेचारे पशु बमुश्किल गाड़ी खींचते रहते. उस कठिन पथ के स्थान पर कोई सुगम पथ होता तो लोगों को यात्रा में न केवल समय की बचत होती वरन वे सुरक्षित भी रहते.

कालांतर में वह गाँव एक नगर बन गया और पथ राजमार्ग बन गया. उस पथ की समस्याओं पर चर्चा करते रहने के अतिरिक किसी ने कभी कुछ नहीं किया.

बूढ़ा जंगल यह सब बहुत लंबे समय से देख रहा था. वह बरबस मुस्कुराता और यह सोचता रहता कि मनुष्य हमेशा ही सामने खुले पड़े विकल्प को मजबूती से जकड़ लेते हैं और यह विचार नहीं करते कि कहीं कुछ उससे बेहतर भी किया जा सकता है.

यह मलयालम लोककथा है. इसे पाउलो कोएलो के ब्लॉग से लिया गया है.

(~_~)

One day, a calf needed to cross a virgin forest in order to return to its pasture. Being an irrational animal, it forged out a tortuous path full of bends, up and down hills.

The next day, a dog came by and used the same path to cross the forest. Next it was a sheep’s turn, the head of a flock which, upon finding the opening, led its companions through it.

Later, men began using the path: they bent down, deviating obstacles, complaining and cursing – and quite rightly so. But they did nothing to create a different route.

After so much use, in the end, the path became a trail along which poor animals toiled under heavy loads, being forced to go three hours to cover a distance which would normally take thirty minutes.

Many years passed and the trail became the main road of a village, and later the main avenue of a town. Everyone complained about the traffic, because the route it took was the worst possible one.

Meanwhile, the old and wise forest laughed, at seeing how men tend to blindly follow the way already open, without ever asking whether it really is the best choice.

Advertisements

About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

There are 6 comments

टिप्पणी देने के लिए समुचित विकल्प चुनें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s