Nature’s Beauty – मंदिर का उद्यान

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एक मंदिर का पुजारी मंदिर के साथ लगे उद्यान की देखभाल भी करता था. उसे बागवानी में बहुत आनंद आता था. उसके भव्य मंदिर से लगा हुआ एक छोटा सा मंदिर भी था जहाँ एक महात्मा रहते थे.

एक दिन पुजारी को सूचना मिली कि उसके मंदिर में दर्शन करने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण व्यक्ति का आगमन होनेवाला है. उसने मंदिर को साफ़-सुथरा करने के बाद उद्यान को व्यवस्थित करने का बीड़ा उठाया. उसने उद्यान से सारी खरपतवार उखाड़ डाली, टहनियों की छंटाई की, और उद्यान में गिरे हुए हर पत्ते को बड़ी मेहनत से उठाकर फेंक दिया.

दोनों मंदिरों के बीच में एक दीवार थी और महात्मा पुजारी को यह सब करते हुए देख रहे थे. जब पुजारी ने अपना कार्य समाप्त कर लिया तो उसने अपनी मेहनत के प्रति प्रशंसा पाने के उद्देश्य से महात्मा से पूछा – “अब यह उद्यान बहुत सुन्दर लग रहा है न?”

“हाँ” – महात्मा ने कहा – “लेकिन मुझे अभी भी इसमें कुछ कमी लग रही है. ज़रा मुझे दीवार के उस पार आने में कुछ सहायता करो ताकि मैं इसे तुम्हारे लिए ठीक कर सकूँ”.

पुजारी ने महात्मा को दीवार के पार से खींचकर अपने उद्यान में उतार दिया. महात्मा धीरे-धीरे चलकर उद्यान के बीचोंबीच लगे एक वृक्ष के पास गए. उन्होंने पेड़ के तने को पकड़कर उसे जोरों से हिला दिया. पेड़ की पत्तियां झड़कर पूरे उद्यान में बिखर गईं.

“अब उद्यान वास्तव में परिपूर्ण हो गया है” – महात्मा ने कहा – “तुम मुझे मेरे मंदिर में वापस उतरने में थोड़ी सहायता कर सकते हो?”.

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मनुष्य अथक प्रयत्न कर ले तो भी प्रकृति से अधिक परिपूर्ण नहीं हो सकता. ईश्वर की बनाई हुई किसी भी रचना को और अधिक सुन्दर करने का प्रयत्न इसके प्राकृतिक सौंदर्य को खंडित करके इसे कुरूप बना देता है.

(A story about a tree in a temple – in Hindi)

A priest was in charge of the garden within a famous Zen temple. He had been given the job because he loved the flowers, shrubs, and trees. Next to the temple there was another, smaller temple where there lived a very old Zen master. One day, when the priest was expecting some special guests, he took extra care in tending to the garden. He pulled the weeds, trimmed the shrubs, combed the moss, and spent a long time meticulously raking up and carefully arranging all the dry autumn leaves. As he worked, the old master watched him with interest from across the wall that separated the temples.

When he had finished, the priest stood back to admire his work. “Isn’t it beautiful,” he called out to the old master. “Yes,” replied the old man, “but there is something missing. Help me over this wall and I’ll put it right for you.”

After hesitating, the priest lifted the old fellow over and set him down. Slowly, the master walked to the tree near the center of the garden, grabbed it by the trunk, and shook it. Leaves showered down all over the garden. “There,” said the old man, “you can put me back now.”

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

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