मन और पत्थर

एक ज़ेन शिष्य ने गुरु से प्रश्न किया, “ज़ेन में ऐसा क्या है जो बहुत बुद्धिमान लोग भी इसे समझ नहीं पाते?”

ज़ेन गुरु उठे, उन्होंने एक पत्थर उठाया और पूछा, “यदि झाड़ियों से एक शेर निकलकर हमारी ओर बढ़ने लगे और हमपर हमले के लिए तैयार हो तो क्या इस पत्थर से हमें कुछ मदद मिलेगी?”

“हाँ, बिलकुल!”, शिष्य ने कहा, “हम यह पत्थर उसपर फेंककर उसे डरा सकते हैं और जान बचाने के लिए भाग सकते हैं, लेकिन इस सबका ज़ेन से क्या लेना….”

“अब तुम मुझे बताओ”, गुरु ने शिष्य से पूछा, “यदि मैं तुम्हें यह पत्थर फेंककर मारूं, क्या तब भी इसकी कोई उपयोगिता है?”

“हरगिज़ नहीं!”, शिष्य ने हैरान होकर कहा, “यह तो बहुत ही बुरा विचार होगा. लेकिन इसका मेरे प्रश्न से क्या संबंध है?”

गुरु ने पत्थर नीचे गिरा दिया और बोले, “हमारा मन बहुत शक्तिशाली है पर वह इस पत्थर की ही भांति है. इसे अच्छाई और बुराई दोनों के लिए ही प्रयुक्त किया जा सकता है”.

“ओह”, शिष्य ने कहा, “इसका अर्थ यह है कि ज़ेन को समझने के लिए अच्छा मन होना चाहिए”.

“नहीं”, गुरु ने कहा, “केवल पत्थर गिरा देना ही पर्याप्त है”.

Thanx to John Weeren for this post

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13 Comments

Filed under Zen Stories

13 Responses to मन और पत्थर

  1. sunil kumar

    sargarbhit post

  2. यही है जेन दृष्टि.

  3. जेन की परिभाषा, दरसल अपरिमेय है . इसे समझाने के लिए तर्क शक्ति नही वरन जीवन जीने का दृष्टी कोण चाहिए.

  4. “केवल पत्थर गिरा देना ही पर्याप्त है”.{ समझ सको तो समझो ……वाह क्या बात है } ,

  5. बहुत ही अलग किस्म की बेहद प्रभावित करने वाला प्रसंग निशांत भाई ।

  6. me apke is prayas se atyadhik prabhavit hua hu, zen kathaye bahut gehri parantu saral hoti he.

    Apka bahut bahut dhanyavaad, kripya yah prayas jari rakhen.

  7. बहुत बुद्धिमान नहीं हैं तब तो हम!

  8. बुद्धिमान लोग भी इसे समझ नहीं पाते

  9. Bahut Pyari, Niraali, Sanketik Bodh-Katha K Liye Shukriya.

  10. aastha

    Manoj Sharma
    “केवल पत्थर गिरा देना ही पर्याप्त है”.{ समझ सको तो समझो ……वाह क्या बात है } ,
    hum bhi yahi baat se sahemat hai …

  11. sunita goel

    Really story bhut gehri hai. Sirf patthar girana hi paryapat hai lakin vastav mein yeh karna bhut muskil hai.

  12. story thora aour clear hona chahiye.

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