तरकीब

gratitude

एक संन्यासी लंबे-चौड़े शिलाखंड को बमुश्किल बैलगाड़ी पर चढ़ाने की कोशिश कर रहा था. एक राहगीर यह देखकर उसके पास आया और बोला, “माफ़ करें, लेकिन आप गलत तरह से काम कर रहे हैं”.

पसीने से लथपथ संन्यासी चिढ़कर बोला, “तुम अपना काम करो. मैं यह पहले भी कई बार कर चुका हूँ.”

राहगीर ने कहा, “आपको मेरी बात ज़रूर सुननी चाहिए. मैं एक तरीका जानता हूँ जो आपको मालूम नहीं है.”

संन्यासी ने कहा, “सुनो भाई, मैं तुम्हें नहीं जानता. मुझे शांति से अपना काम करने दो. मैं यह कई बार कर चुका हूँ और भली-भांति जानता हूँ कि यह काम कैसे करते हैं. ठीक है!”

राहगीर ने कहा, “लेकिन एक बार मेरी बात सुनने में क्या हर्ज़ है?”

संन्यासी ने पत्थर को जमीन पर टिका दिया, हाथ फटकारे, और बोला, “अच्छी बात है, अब बताओ तुम कौन सी राज़ की बात बताने वाले थे. मैं भी तो सुनूँ तुम कौन सी तरकीब जानते हो!”

राहगीर ने पत्थर का एक कोना उठाया और बोला, “हम दोनों मिलकर करें तो काम आसान हो जाएगा”.

संन्यासी ने मुस्कुराते हुए पत्थर का दूसरा कोना उठा लिया.

Thanx to John Weeren for this story

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