घृणा

 

good journey

एक ज़ेन संन्यासी ने अपने गुरु से पूछा, “हमें अपने शत्रुओं से कैसा व्यवहार करना चाहिए?”

गुरु ने कहा, “तुम अपने शत्रुओं से केवल घृणा ही कर सकते हो?”

शिष्य ने अचरज से कहा, “ऐसा कहकर क्या आप घृणा का समर्थन नहीं कर रहे?”

गुरु ने कहा, “नहीं. मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि तुम उनसे घृणा करो. मेरे कहने का अर्थ यह है कि जब तुम किसी व्यक्ति को अपना शत्रु जानने लगते हो तब तुम उससे केवल घृणा ही कर सकते हो.”

Thanx to John Weeren for this story

There are 13 comments

  1. ali syed

    ज़ेन (?) होकर भी अंतस में शत्रुता का शेष रह जाना अपने आप में एक बड़ा प्रश्न है ! यदि कोई अपने अंतस में शेष रह गये इस प्रश्न ( भाव ) को जानकर भी उससे घृणा ना कर पाए तो फिर उसका ज़ेन बने रह पाना कठिन है !

    संभवतः गुरु का तात्पर्य ‘घृणा के उस रूप’ ( बोध ) से है जिससे सहमत होकर एक ज़ेन को अपने अंदर की त्रुटि का शमन करना है !

  2. vasantujas

    घॄणां करना या न करना अपने हाथमें नही हैं। घृणा करनेका कारण अगर समजमें आ जाए तो बात बन शक्ति है। समजना शुरु करते है, तो सभी कारण समाप्त हो जाते हैं । सभी शस्त्रोंने समजका मार्ग दिया है। घृणा करने के परिणाम समजने लगेंगे तो घॄणा अपने आप कम हो जायेगी।
    आभार।

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