Law of Attraction

chaos inside

Law of Attraction के बारे में मैं कुछ समय से पढता आ रहा हूँ. इस नियम या सिद्धांत को माननेवालों का यह कहना है कि यदि आप किसी चीज़ के मिलने की या किसी बात के होने की कामना अपनी अदम्य इच्छाशक्ति और पूरे विश्वास से करेंगे तो वह चीज़ देर सबेर ज़रूर मिलेगी/होगी. इस बात का दूसरा अर्थ यह भी है कि ‘जो जैसा है वह वैसे को ही खींचता है.’.. सकारात्मक दृष्टिकोण से सकारात्मक बातें होंगी और नकारात्मक दृष्टिकोण रखने के परिणाम नकारात्मक ही होंगे. इसे ही भाषा के स्तर पर ले जाने पर समझें तो “मेरे पास पैसे नहीं है” एक नकारात्मक वाक्य है जो कि लोग आमतौर पर कहते ही रहते हैं. “मुझे पैसों की ज़रुरत है” कहनेवाला व्यक्ति अपना ध्यान ‘ज़रुरत’ पर ही केन्द्रित किये रहता है और ज़रुरत हमेशा एक समस्या के रूप में मौजूद रहती है इसलिए यह भी नकारात्मक ही कहलायेगा.

यह विवाद का विषय है कि यह नियम या सिद्धांत वाकई कुछ मूल्य और महत्व रखता है. भौतिक जगत को निरुपित करनेवाले जांचे-परखे नियम और सिद्धांतों पर जब लोग परस्पर विपरीत विचार रखते हैं तो Law of Attraction तो बहुत अमूर्त संकल्पना है. चाहे जो हो, दुनिया में ऐसे लोगों की भी कोई कमी नहीं है जो यह मानते हैं कि उनकी सफलता का राज़ Law of Attraction में ही है. संशयवादी और घोर तार्किक व्यक्ति होने के नाते मैं भी इसपर आसानी से यकीन नहीं करता पर जब मैंने इसके बारे में विस्तार से जानने के लिए सर्च करी तो मुझे कुछ रोचक जानकारियां मिलीं जो मैं आपसे साझा करूंगा.

कहते हैं कि Law of Attraction का मूल क्वांटम भौतिकी में है. क्वांटम भौतिकी के अंतर्गत अणुओं और परमाणुओं से भी छोटे कणों का अध्ययन किया जाता है जिनके बारे में वैज्ञानिकों का कहना है कि ये कण और कुछ नहीं बल्कि तरंगें ही हैं. इलेक्ट्रॉन या प्रोटौन जैसे अपेक्षाकृत बड़े कणों के विपरीत इन कणों या तरंगों की प्रकृति और व्यवहार बहुत अनूठा और अबोधगम्य है. इसी आधार पर कुछ वैज्ञानिक यह मानने लगे हैं कि हमारा मष्तिष्क भी क्वांटम शैली पर कार्य करता है. मष्तिष्क में भी तरंगें होती हैं और मष्तिष्क की ये तरंगें ब्रह्माण्ड में हमें व्याप्त करनेवाली तरंगों से क्रिया-प्रतिक्रिया करती रहती हैं. यद्यपि यह केवल एक अनुमान मात्र ही है. क्वांटम भौतिकी के अनुसार दिक् और काल दोनों ही रिक्त हैं. हम ही इन्हें अपने विचारों और क्रियाओं से भरते हैं.

यह सुनना अजीब लग सकता है पर यह सच है कि हमारा मष्तिष्क और तंत्रिका तंत्र कोई परिपूर्ण व्यवस्था नहीं है. अवचेतन स्तर पर यह बहुत सी चीज़ों को ठीक से समझ नहीं पाता. यही कारण है कि एक दार्शनिक ने कहा है, “यदि तुम स्वप्न में मरोगे तो वास्तविकता में जीते रहोगे”. भयानक सपना देखते समय हृदयाघात या किसी अन्य कारणवश मर जानेवाले व्यक्तियों के चेहरे पर शायद इसी कारण से आतंक की विकट छाया दिखती है. इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति कुछ पाने की अभिलाषा करता है तो उसके मष्तिष्क से निकलनेवाली तरंगें उस किसी व्यक्ति की तरंगों से सुमेल कर लेतीं हैं जिसके पास वह वस्तु पहले से ही है. फिर से कह दूं कि यह भी एक संकल्पना ही है. यह कितनी सच है और कितनी झूठ यह तो समय ही बताएगा.

Law of attraction तटस्थ और उदासीन है. यह व्यक्ति को केवल वांछित ही नहीं बल्कि अवांछित परिणाम भी दिला सकता है यदि व्यक्ति की सोच वैसी ही हो. वस्तुतः किसी चीज़ को नहीं चाहने की सोच भी उतनी ही प्रबल हो सकती है जितनी उसे चाहने की. शायद इसीलिए भारतीय मनीषियों ने ध्यान साधना में उन अवस्थाओं को श्रेष्ठ माना जिनमें या जिनके द्वारा ‘शून्यता’ की उपलब्धि होती है… जहां ध्याता और ध्येय, ज्ञाता और ज्ञेय का भेद मिट जाता है. स्पष्ट है, जब विचार ही नहीं होगा तो उसके प्रपंच क्यों कर होंगे?

Law of attraction अकर्मण्यता का समर्थन नहीं करता. अपने सपनों को मूर्त रूप देने के लिए कर्म करना पड़ता है. बैठे-बैठे सकारात्मक सोचते रहने से ही कुछ नहीं होता. इस नियम के अनुसार किसी वस्तु की कामना करने से वह आपकी ओर खिंचने लगती है और ऐसी संभावनाओं के द्वार खोलती है जिनके परे जाकर आप उसकी प्राप्ति कर सकते हैं. यदि आप द्वार को देख ही न पायें या उसे खोलने के जतन ही नहीं करेंगे तो आपको कुछ नहीं मिलेगा.

यह नियम ब्रह्माण्ड के उद्भव से ही अस्तित्व में है. यह हम पर उसी प्रकार प्रभाव डालता है जैसे गुरुत्वाकर्षण. हमारा वर्तमान हमारे अतीत के विचारों और क्रियाओं का ही परिणाम है. आज हम जो कुछ सोच रहे हैं और कर रहे हैं उससे हमारे भविष्य की रचना होगी. आप law of attraction से असहमत होकर इसे प्लेसबो इफेक्ट, प्रार्थना की शक्ति, या कुछ और कह सकते हैं पर इसे सिरे से ख़ारिज नहीं कर सकते. यह संभव है कि आप इसकी संकल्पना से सहमत न हों क्योंकि आपने कार्य-कारण प्रभाव के बारे में इस दृष्टिकोण से कभी न सोचा हो.

स्टीव पावलिना ने law of attraction पर बढ़िया लेख लिखा है.

Advertisements

About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

There are 16 comments

  1. मनोज पटेल

    अच्छा लगा यह लेख. इस विषय पर कुछ किताबें पहले पढ़ी थीं, ‘पावर आफ यूअर सबकान्शस माइंड’ और ‘सीक्रेट’. आपने क्वांटम भौतिकी वाले पहलू पर रोशनी डालकर अच्छा किया, हालांकि शंकाएं अभी भी हैं…

    Like

  2. सुज्ञ

    यह बहुत ही विचारणीय आलेख है। गहन दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है।
    जैन दर्शन शास्त्र में कर्म-सिद्धांत के अन्तर्गत ‘लेश्या’ का विधान देखा था। जिसमें मानसिकता के पुद्गल उसी अनुरूप शुभ-अशुभ पुद्गलों को आकर्षित करते है। पुद्गल को क्वांटम का समानार्थी कहा जा सकता है और लेश्या को law of attraction

    Like

  3. रवि

    “…इस नियम या सिद्धांत को माननेवालों का यह कहना है कि यदि आप किसी चीज़ के मिलने की या किसी बात के होने की कामना अपनी अदम्य इच्छाशक्ति और पूरे विश्वास से करेंगे तो वह चीज़ देर सबेर ज़रूर मिलेगी/होगी….”

    वैसे, यह बात तो तय है कि यदि आप व्यावहारिक तौर पर संभव (ये नहीं कि चांद पर जाने का ख्वाब पालें,) चीजों की इच्छा अपनी अदम्य इच्छाशक्ति और विश्वास से करेंगे तो देर सबेर वो मिलती ही है. मैंने स्वयं अपने मामले में इसे सिद्ध पाया है.
    पाउलो कोएलो ने भी अपनी बेस्ट सेलर किताब में दार्शनिक अंदाज में कहा है – जब आप किसी चीज को अपनी अदम्य इच्छा शक्ति और विश्वास से पाने के लिए मेहनत और संघर्ष करते हैं तो ब्रह्मांड की तमाम शक्तियाँ उसे आप तक पहुँचाने के लिए षडयंत्र करती हैं.

    Like

  4. Ashok

    I wish to point out that your input from Quantum Mechanics is factually incorrect. Their is no concept of wave in modern quantum mechanics. The electron is a quanta of a Dirac Field. Further, the space time is active (not passive) in General Theory of Relativity. Creating wrong impressions using Physical Theories which you do not understand is not rational.

    Like

  5. योगेन्द्र जोशी

    मैं यह नहीं समझ पाया कि law of attraction मानव व्यवहार एवं मनोविज्ञान के संदर्भ में प्रयोग में लिया गया है, अथवा भौतिक निर्जीव तन्त्रों के लिए भी इसे परिभाषित किया गया है । मानव व्यवहार में चाहने न चाहने का भाव रहता है और चाहत पर नियन्त्रण की संभावना भी रहती है, जब कि भौतिक पदार्थगत तन्त्रों के मामले में प्रकृति के नियम सुनिश्चित और अपरिवर्तनीय रहते हैं ।

    Like

  6. चंदन कुमार मिश्र

    रवि रतलामी साहब की बात पर शाहरुख खान की बोली हुई(मतलब किसी की कही और रटी हुई) बात याद आ गई कायनात वाली। और हाँ, यह लॉ सूरज को जेब में रखने की इच्छा पालने वालों के लिए नहीं है।

    Like

टिप्पणी देने के लिए समुचित विकल्प चुनें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s