अफ्रीकी लोक-कथा : अनानसी और जादू की हांडी

earthen potअनानसी जहाँ रहता था वहां बहुत भीषण अकाल पड़ा. अनानसी और उसका परिवार भूख से बेहाल हो गया. एक दिन जब अनानसी उदास मन से समुद्र की ओर देख रहा था तब उसने समुद्र के बीचोंबीच अचानक एक खजूर का पेड़ पानी में से ऊपर उठते देखा. अनानसी ने तय किया कि वह किसी भी तरह उस पेड़ तक पहुंचेगा और उसपर चढेगा. क्या पता पेड़ में उसके लिए कुछ खजूर लगे हों! अब, वहां तक जाना ही बड़ी समस्या थी.

लेकिन हर समस्या का समाधान हो ही जाता है. अनानसी जब सागरतट पर पहुंचा तो उसने वहां एक टूटी हुई नौका पड़ी देखी. नौका को कामचलाऊ ठीक करके उसने खेना शुरू कर दिया.

पेड़ तक पहुँचने के अनानसी के पहले छः प्रयास असफल हो गए. हर बार ताक़तवर थपेडों ने उसकी नौका को सागरतट पर ला पटका. लेकिन अनानसी भी हार मानने वाला नहीं था. अपने सातवें प्रयास में वह पेड़ तक पहुँचने में कामयाब हो गया. नौका को उसने पेड़ से बाँध दिया और पेड़ पर चढ़ने लगा. पेड़ पर कुछ खजूर लगे थे जो उस वक़्त के लिए काफी थे. अनानसी खजूर तोड़-तोड़कर उन्हें नौका में गिराने लगा लेकिन एक भी खजूर नौका में नहीं गिरा. सारे समुद्र के पानी में गिरकर डूब गए. पेड़ पर सिर्फ एक ही खजूर बचा रह गया. अनानसी ने उसे बड़ी सावधानी से नौका में फेंका लेकिन वह भी पानी में गिरकर डूब गया. बेचारे अनानसी ने खजूरों के लिए इतनी मेहनत की लेकिन उसे एक भी खाने को नहीं मिला.

अनानसी बहुत दुखी हो गया. वह खाली हाथ घर नहीं जाना चाहता था. अपने जीवन से निराश होकर उसने आत्महत्या करने के लिए समुद्र में छलांग लगा दी. उसे यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि डूबकर मरने के बजाय वह सागरतल तक सुरक्षित चला गया और वहां खड़ा हो गया. उसने वहां एक झोपड़ी देखी. झोपड़ी में से एक बूढ़े बाबा निकलकर बाहर आए. उन्होंने अनानसी से पूछा कि वह वहां क्यों आया है. अनानसी ने अपनी दर्द भरी दास्तान बूढ़े बाबा को सुना दी और बाबा ने अनानसी के प्रति बहुत सहानुभूति दिखाई.

बाबा झोपड़ी के भीतर गए और लोहे की एक हांडी लेकर बाहर आए. उन्होंने वह हांडी अनानसी को दे दी और कहा कि वह अब कभी भूखा नहीं रहेगा. “इस हांडी से तुम जितना खाना चाहे निकाल सकते हो – इससे यह कहना ‘जो कुछ तुम अपने पुराने मालिक के लिए करती थी वही तुम मेरे लिए करो’ बस”. अनानसी ने हांडी के लिए बाबा का शुक्रिया अदा किया और वहां से चल पड़ा.

अनानसी हांडी को एक बार परखकर देखना चाहता था. अपनी नौका में बैठकर उसने हांडी से कहा – “हांडी, हांडी, जो कुछ तुम अपने पुराने मालिक के लिए करती थी वही तुम मेरे लिए करो’ – इतना कहते ही हांडी सबसे स्वादिष्ट पकवानों से भर गई. अनानसी ने मरभुख्खों की तरह लज़ीज़ खाना खाया और आनंद मनाया.

जब वह अपने गाँव पहुंचा तो सबसे पहले उसके मन में घर जाकर अपने परिवार को हांडी से भरपूर खाना खिलने का विचार आया. लेकिन एक स्वार्थी विचार ने भी उसे घेर लिया – “लेकिन कहीं ऐसा न हो की हांडी की दिव्यशाक्तियाँ जल्दी ही चुक जाएँ और मैं पहले की तरह खाने को तरसने लगूं. नहीं, नहीं, मैं तो हांडी को सिर्फ अपने लिए ही छुपाकर रखूँगा और रोज़ जी भरके बढ़िया खाना खाऊँगा”. उसने हांडी को छुपा दिया.

वह घर पहुंचा और ऐसा दर्शाया जैसे वह भूख से मरा जा रहा है. दूर-दूर तक किसी के पास अनाज का एक दाना भी नहीं था. अनानसी के बीबी-बच्चे भूख से बेहाल हो रहे थे लेकिन उसने उनकी कोई परवाह नहीं की. अपने घर के एक कमरे में उसने हांडी को छुपाया हुआ था. वह वहां रोज़ जाता और दरवाजा बंद करके हांडी से खूब सारा बढ़िया खाना जी भर के खाता. उसके बीबी-बच्चे सूखकर कटखने हो गए लेकिन अनानसी मोटा होता गया. घर के दूसरे लोग अनानसी पर शक करने लगे और इसका कारण तलाशने लगे. अनानसी के बेटे कवेकू के पास एक जादुई ताक़त थी और वह पलक झपकते ही अपने आप को किसी भी जीव में बदल सकता था. वह एक मक्खी बन गया और अपने पिता के इर्दगिर्द मंडराने लगा. भूख लगने पर अनानसी कमरे में गया और उसने हांडी से निकलकर बढ़िया खाना खाया. फिर पहले की भांति हांडी को छुपाकर वह बहार निकलकर खाने की तलाश करने का नाटक करने लगा.

जब वह गाँव से दूर चला गया तब कवेकू ने हांडी को बाहर निकाला और अपनी माँ और भाई-बहनों को खाने के लिए बुलाया. उन सबने उस दिन इतना अच्छा खाना खाया कि उन्हें अनानसी पर बहुत गुस्सा आने लगा. श्रीमती अनानसी अपने पति को सबक सिखाना चाहती थी इसलिए वह हांडी लेकर गाँव के एक मैदान में गई ताकि वहां सभी को बुलाकर खाना खिला सके. हांडी ने कभी भी इतना खाना नहीं बनाया था इसलिए वह बहुत गरम हो गई और पिघलकर बह गई. अब कुछ नहीं हो सकता था.

भूख लगने पर अनानसी वापस अपने कमरे में आया और उसने हांडी की तलाश की. उसे हांडी नहीं मिली. वह समझ गया कि किसी ने हांडी को ढूंढ लिया है. उसका पहला शक अपने परिवार पर गया और उसने अपने बीबी-बच्चों को सजा देने के बारे में सोचा.

अनानसी ने किसी से कुछ नहीं कहा और अगली सुबह का इंतज़ार करने लगा. सूरज निकलते ही वह सागरतट की और चल दिया और टूटी नौका में बैठकर वह उसी खजूर के पेड़ की और चला. इस बार नाव बिना किसी रूकावट के अपने आप पेड़ तक जाकर ठहर गई. अनानसी नौका को पेड़ से बांधकर पेड़ पर चढ़ने लगा. पहले की भांति पेड़ पर फल लगे हुए थे. अनानसी ने फल तोड़कर उन्हें संभालकर नौका में फेंका और सारे फल ठीकठीक नौका में ही गिरे. एक भी फल पानी में नहीं गिरा. यह देखकर अनानसी ने नौका से सारे फल उठाये और उन्हें जानबूझ कर पानी में फेंक दिया और फेंकते ही समुद्र में छलांग लगा दी. पहले की भांति वह बूढ़े बाबा की झोपड़ी तक पहुंचा और उन्हें सारी बात बता दी. बाबा ने भी पहले की भांति अनानसी से सहानुभूति जताई.

इस बार बाबा झोपडी के भीतर गए और अन्दर से एक डंडा लेकर आये. उन्होंने डंडा अनानसी को दे दिया और दोनों ने एक दूसरे से विदा ली. नौका में बैठते ही अनानसी ने डंडे की ताक़त जांचने के लिए उससे कहा – “डंडे, डंडे, जो कुछ तुम अपने पुराने मालिक के लिए करते थे वही तुम मेरे लिए करो’. इतना सुनते ही डंडे ने अनानसी को दनादन मार-मारके लाल-नीला कर दिया. अनानसी किसी तरह डंडे से बचकर पानी में कूद गया और अपनी नौका और डंडे को वहीँ छोड़कर वापस अपने गाँव आ गया. घर पहुँचने पर उसने अपने बीबी-बच्चों से अपने बुरे आचरण के लिए माफ़ी मांगी और वादा किया कि वह उनके प्रति हमेशा दयालुता और स्नेह रखेगा.

(चित्र यहाँ से लिया गया है)

(An African folktale of Ananasi and the magic cauldron – in Hindi)

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

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