सेवा का महत्त्व

सिखों के पांचवें गुरु अर्जुनदेव जी जब चौथे गुरु के अखाड़े में शामिल हुए तो उन्हें छोटे-छोटे काम करने को दिए गए। उन्हें ढेरों जूठे बर्तन भी साफ करना होता था

अर्जुनदेव जी को जो भी काम बताया जाता उसे वे बड़ी लगन से पूरा करते थे। छोटे-से-छोटा काम करने में भी उन्होंने कभी संकोच नहीं किया। वे सभी कामों को ज़रूरी और महत्वपूर्ण समझते थे। किसी भी काम को करने में उन्हें हीन भावना अनुभव नहीं हुई।

जब दूसरे शिष्य दिनभर सत्संग का आनंद लेने के बाद रात में विश्राम करते थे तब अर्जुनदेव जी आधी रात तक अखाड़े के ज़रूरी कामों में लगे रहते थे और अगली सुबह जल्दी उठकर पुनः कामों में लग जाते थे।

दूसरे शिष्यों में यह बात फ़ैल गई थी कि गुरूजी अर्जुनदेव को तुच्छ समझते हैं। परन्तु वे यह नहीं जानते थे कि गुरु में शिष्यों की सच्ची परख है और वे मानव सेवा को सबसे महान कार्य समझते हैं।

समाधि लेने के पूर्व गुरूजी ने काफी सोच-विचार के बाद अपने शिष्यों में से एक को अपना उत्तराधिकारी चुन लिया और उसके नाम का अधिकार पत्र लिखकर बक्से में बंद कर दिया।

चौथे गुरु के चोला छोड़ने के बाद वह अधिकार पत्र सबके सामने खोलकर पढ़ा गया तो पता चला कि दिवंगत गुरूजी ने अपना उत्तराधिकारी गुरु अर्जुनदेव जी को चुन लिया था।

अन्य शिष्यों ने तब सेवा के महत्त्व को समझा। गुरु अर्जुनदेव जी ने सभी कि आशाओं के अनुरूप कार्य करके बड़ी ख्याति अर्जित की और गुरु नानकदेव जी के ‘एक ओंकार सतनाम’ के मत को दूर-दूर तक पहुँचाया।

चित्र: गुरु अर्जुन देव जी भाई गुरुदास को आदि ग्रन्थ लिखवाते हुए। चित्र विकिपीडिया से यहाँ से लिया गया)

(An anecdote of Guru Arjun Dev Ji)

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About Nishant Mishra

Nishant studied art history and literature at the university during 1990s. He works as a translator in New Delhi, India and likes to read about arts, photography, films, life-lessons and Zen.

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