मुसीबत

नसरुद्दीन एक शाम अपने घर से निकला. उसे किन्हीं मित्रों के घर उसे मिलने जाना था. वह चला ही था कि दूर गाँव से उसका एक दोस्त जलाल आ गया. नसरुद्दीन ने कहा, “तुम घर में ठहरो, मैं जरूरी काम से दो-तीन मित्रों को मिलने जा रहा हूँ और लौटकर तुमसे मिलूंगा. अगर तुम थके न हो तो मेरे साथ तुम भी चल सकते हो”.

जलाल ने कहा, “मेरे कपड़े सब धूल-मिट्टी से सन गए हैं. अगर तुम मुझे अपने कपड़े दे दो तो मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ. तुम्हारे बगैर यहां बैठकर मैं क्या करूंगा? इसी बहाने मैं भी तुम्हारे मित्रों से मिल लूँगा”.

नसरुद्दीन ने अपने सबसे अच्छे कपड़े जलाल को दे दिए और वे दोनों निकल पड़े.

जिस पहले घर वे दोनों पहुंचे वहां नसरुद्दीन ने कहा, “मैं इनसे आपका परिचय करा दूं, ये हैं मेरे दोस्त जलाल. और जो कपड़े इन्होंने पहने हैं वे मेरे हैं”.

जलाल यह सुनकर बहुत हैरान हुआ. इस सच को कहने की कोई भी जरुरत न थी. बाहर निकलते ही जलाल ने कहा, “कैसी बात करते हो, नसरुद्दीन! कपड़ों की बात उठाने की क्या जरूरत थी? अब देखो, दूसरे घर में कपड़ों की कोई बात मत उठाना”.

वे दूसरे घर पहुंचे. नसरुद्दीन ने कहा, “इनसे परिचय करा दूं. ये हैं मेरे पुराने मित्र जलाल; रही कपड़ों की बात, सो इनके ही हैं, मेरे नहीं हैं”.

जलाल फिर हैरान हुआ. बाहर निकलकर उसने कहा, “तुम्हें हो क्या गया है? इस बात को उठाने की कोई क्या जरूरत थी कि कपड़े किसके हैं? और यह कहना भी कि इनके ही हैं, शक पैदा करता है, तुम ऐसा क्यों कर रहे हो?”

नसरुद्दीन ने कहा, “मैं मुश्किल में पड़ गया. वह पहली बात मेरे मन में गूंजती रह गई, उसकी प्रतिक्रिया हो गई. सोचा कि गलती हो गई. मैंने कहा, कपड़े मेरे हैं तो मैंने कहा, सुधार कर लूं, कह दूं कि कपड़े इन्हीं के हैं”. जलाल ने कहा, “अब ध्यान रखना कि इसकी बात ही न उठे. यह बात यहीं खत्म हो जानी चाहिए”.

वे तीसरे मित्र के घर पहुंचे. नसरुद्दीन ने कहा, “ये हैं मेरे दोस्त जलाल. रही कपड़ों की बात, सो उठाना उचित नहीं है”. नसरुद्दीन ने जलाल से पूछा, “ठीक है न, कपड़ों की बात उठाने की कोई ज़रुरत ही नहीं है. कपड़े किसी के भी हों, हमें क्या लेना देना, मेरे हों या इनके हों. कपड़ों की बात उठाने का कोई मतलब नहीं है”.

बाहर निकलकर जलाल ने कहा, “अब मैं तुम्हारे साथ और नहीं जा सकूंगा. मैं हैरान हूं, तुम्हें हो क्या रहा है?”

नसरुद्दीन बोला, “मैं अपने ही जाल में फंस गया हूं. मेरे भीतर, जो मैं कर बैठा, उसकी प्रतिक्रियाएं हुई चली जा रही हैं. मैंने सोचा कि ये दोनों बातें भूल से हो गयीं, कि मैंने अपना कहा और फिर तुम्हारा कहा. तो मैंने तय किया कि अब मुझे कुछ भी नहीं कहना चाहिए, यही सोचकर भीतर गया था. लेकिन बार-बार यह होने लगा कि यह कपड़ों की बात करना बिलकुल ठीक नहीं है. और उन दोनों की प्रतिक्रिया यह हुई कि मेरे मुंह से यह निकल गया और जब निकल गया तो समझाना जरूरी हो गया कि कपड़े किसी के भी हों, क्या लेना-देना”.

यह जो नसरुद्दीन जिस मुसीबत में फंस गया होगा बेचारा, पूरी मनुष्य जाति ऐसी मुसीबत में फंसी है. एक सिलसिला, एक गलत सिलसिला शुरू हो गया है. और उस गलत सिलसिले के हर कदम पर और गलती बढ़ती चली जाती है. जितना हम उसे सुधारने की कोशिश करते हैं, वह बात उतनी ही उलझती चली जाती है.

प्रस्तुति ः ओशो शैलेंद्र

About these ads

14 Comments

Filed under Mulla Nasruddin, Osho

14 responses to “मुसीबत

  1. निशांत जी, “मुसीबत” के लिए धन्यवाद। यदि आप कभी माह में एक बार यह सूचना दे सकें तो अनेक मित्रों के लिए उपयोगी होगी-
    हमारे युग के क्रांतिकारी सदगुरु ओशो द्वारा लिखी गई छोटी-छोटी अनूठी बोध कथाओं से प्रेरणा प्राप्त करने के लिए इस लिंक पर क्लिक कीजिए- http://www.thepressvarta.com/osho
    निवेदन है कि आस्था चैनल पर शाम 6.50-7.10 पर ओशोधारा-कार्यक्रम देखें। ध्यान की कला जीवन की सबसे बड़ी कला है। ध्यान सीखने हेतु सप्रेम आमंत्रण। सपरिवार पधारें। दिल्ली से 50 किलोमीटर दूर स्थित ओशो आश्रम, मुरथल में प्रत्येक माह के दूसरे एवं चौथे रविवार को सुबह 9 बजे से संध्या 6 बजे तक आध्यात्मिक पिकनिक का आयोजन होता है। विस्तृत जानकारी हेतु फोन करें- 09671400196. धन्यवाद !

  2. अपनी ओढ़ी मुसीबतें…बेहतर है कि कपड़े ही उतार दें…

  3. रोचक।
    इस कहानी से हमें मालूम पढता है कि मूर्खों की बातों और व्यवहार से भी हम कुछ सीख सकते हैं।

    जी विश्वनाथ

  4. हाँ – कपड़ों में ही तो उलझे हैं हम सब | मेरा, इसका, उसका …. किसका ?? आईनों पर धूल इतनी है की आइना दीखता ही नहीं |

  5. यह पोस्ट जो है, सो जलाल और नसीरुद्दीन की है। टिप्पणी मेरी है या नहीं, कह नहीं सकता। :)

  6. Bahut Badiya! Duniya aisi hi hai. Yadi kisi se kuchh bhi manga aur usane diya to vah dondi peet-peet kar sabko batayega. Balki kuchh to aise badmash hain ki koi sahayog na karne ke bad bhi logo se kahate phirate hain ki falan ki unnati me mera hath raha hai.

  7. सही सन्देश.

    महाशिवरात्रि की मंगलकामनाएँ .

  8. बेहतर प्रस्तुति ! सुन्दर

  9. संजय मिश्रा 'हबीब'

    अच्छी कथा….
    आभार.

  10. Abhishek

    With out ‘ I ‘ nothing can be created in the
    world, everyone has this type of ego but some one knows how to convert it into another form. Your article is good and this is begning.

  11. GUDDUCHAUHAN

    I LOVE THIS STORY

टिप्पणी देने के लिए समुचित विकल्प चुनें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s