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विदाई का पोस्टकार्ड — मृत्यु से न डरने की कला

तन्ज़ेन नामक ज़ेन गुरु ने अपने जीवन के अन्तिम दिन 60 पोस्टकार्ड लिखे और अपने एक शिष्य को उन्हें डाक में डालने को कहा। इसके कुछ क्षणों के भीतर उन्होंने शरीर त्याग दिया।

कार्ड में लिखा था —

मैं इस संसार से विदा ले रहा हूँ। यह मेरी अन्तिम घोषणा है।

तन्ज़ेन, 27 जुलाई 1892


तीन पंक्तियाँ — और एक पूरा जीवन

इन तीन पंक्तियों में कोई शोक नहीं है। कोई भय नहीं। कोई नाटक नहीं।

बस एक सूचना — जैसे कोई यात्रा पर निकलने से पहले अपने मित्रों को लिख दे कि “मैं जा रहा हूँ।”

तन्ज़ेन जानते थे कि वे जा रहे हैं। उन्होंने 60 लोगों को याद किया — एक-एक को, हाथ से लिखकर — और फिर शान्ति से चले गए।

यह जीवन की सबसे दुर्लभ उपलब्धि है — मृत्यु को उतनी ही सहजता से स्वीकार करना जितनी सहजता से सुबह की चाय पी जाती है।


जिसेई — ज़ेन गुरुओं की मृत्यु-कविता

जापान में एक पुरानी परम्परा रही है — “जिसेई” (辞世) — यानी मृत्यु से पहले लिखी गई अन्तिम कविता। सदियों से ज़ेन गुरु, समुराई और कवि मृत्यु के क्षण में एक हाइकू या कविता लिखकर संसार से विदा लेते थे।

ये कविताएँ रोने-धोने की नहीं होतीं — बल्कि अक्सर इनमें एक शान्त हास्य, एक हल्कापन होता है। जैसे —

18वीं सदी के ज़ेन गुरु सेंगाई की अन्तिम कविता थी:

“मैं नहीं जाना चाहता, मैं नहीं जाना चाहता — और फिर भी मैं जा रहा हूँ।”

और एक अन्य गुरु ने लिखा:

“जीवनभर मैंने कागज़ पर स्याही बेची। अब मैं खुद स्याही बन जाऊँगा।”

तन्ज़ेन का पोस्टकार्ड इसी परम्परा का हिस्सा था — बस उन्होंने कविता की जगह एक सरल घोषणा चुनी। और वह घोषणा किसी भी कविता से गहरी है।


सुकरात — हँसते हुए ज़हर पीने वाला दार्शनिक

ईसा से 399 साल पहले, एथेंस की अदालत ने सुकरात को मृत्युदण्ड सुनाया। उनके मित्र रो रहे थे, भाग जाने की विनती कर रहे थे।

सुकरात ने हँसते हुए हेमलॉक का प्याला उठाया और पी लिया।

उनके अन्तिम शब्द थे — “हम एस्क्लेपियस (यूनानी देवता) को एक मुर्गा देते हैं” — यानी, बीमारी (जीवन) से मुक्ति मिली, इसका धन्यवाद करो।

मृत्यु के सामने सुकरात का यह हल्कापन — यही तन्ज़ेन के पोस्टकार्ड की भावना है।


कबीर की विदाई — एक और महान मृत्यु

हिंदी साहित्य में कबीर की मृत्यु की कहानी अद्भुत है। कहते हैं कि जब उनका अन्त निकट आया, वे काशी छोड़कर मगहर चले गए — जो उस समय “अशुभ” स्थान माना जाता था।

लोग कहते थे कि काशी में मरने से मोक्ष मिलता है, मगहर में मरने से नहीं।

कबीर ने कहा — “जो काशी तन तजे, कबीरा रामे कौन निहोरा।” यानी — अगर काशी में मरने से ही मोक्ष मिलता है तो राम का क्या काम?

वे मगहर में मरे। हँसते हुए। अपनी शर्तों पर।

तन्ज़ेन और कबीर — दोनों ने मृत्यु को अपनी मुट्ठी में लिया।


भगत सिंह का अन्तिम पत्र

23 मार्च 1931 की रात, फाँसी से कुछ घंटे पहले, भगत सिंह पढ़ रहे थे। जब जेलर आया तो उन्होंने किताब से नज़रें उठाईं और कहा — “रुको, एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है।” किताब का वह पृष्ठ वैसे ही खुला रह गया।

उन्होंने फाँसी के दिन अपने साथियों को पत्र लिखा — न घबराहट, न पश्चाताप। केवल विचार और विदाई।

यह वही भावना है जो तन्ज़ेन के पोस्टकार्ड में है — मृत्यु के सामने भी अपना स्वभाव न खोना।


मार्कस औरेलियस — रोम का दार्शनिक सम्राट

रोम के महान सम्राट और दार्शनिक मार्कस औरेलियस ने अपनी डायरी “Meditations” में लिखा था —

“मृत्यु से मत डरो। इससे डरो कि तुमने कभी जीया ही नहीं।”“मृत्यु से मत डरो। इससे डरो कि तुमने कभी जीया ही नहीं।”

और एक और जगह —

“तुम हज़ार साल जियो या एक दिन — खोना तो उतना ही होगा जितना अभी है।”“तुम हज़ार साल जियो या एक दिन — खोना तो उतना ही होगा जितना अभी है।”

तन्ज़ेन ने जब 60 पोस्टकार्ड लिखे, तो वे यही कह रहे थे — मैंने जीया। मैंने 60 लोगों को याद किया। अब जाता हूँ।


“Ikigai” और एक पूर्ण जीवन की विदाई

जापान में “इकिगाई” (生き甲斐) की अवधारणा है — जीवन का वह कारण जो हर सुबह उठाता है। जिस व्यक्ति को अपना इकिगाई मिल जाता है, वह न जीवन से भागता है, न मृत्यु से।

तन्ज़ेन का इकिगाई था — अपने शिष्यों को ज़ेन सिखाना, लोगों से जुड़ना। और अन्त में उन्होंने यही किया — 60 लोगों को पत्र लिखकर, उनसे जुड़कर, विदा ली।

यह अकेले नहीं गए। 60 लोगों का हाथ थामकर गए।


मृत्यु — जीवन का दर्पण

तन्ज़ेन की इस कहानी में मृत्यु की तैयारी नहीं है — जीवन की परिपूर्णता है। जो व्यक्ति मृत्यु को इतनी शान्ति से स्वीकार कर सकता है, उसने निश्चित ही जीवन को बहुत गहरे से जिया होगा।

हम अक्सर मृत्यु के बारे में सोचने से कतराते हैं — जैसे सोचने से वह जल्दी आ जाएगी। लेकिन स्टोइक दार्शनिक इसे “Memento Mori” कहते थे — याद रखो कि तुम्हें मरना है। यह उदासी नहीं — यह जागरूकता है। जो जानता है कि जाना है, वही पूरी तरह यहाँ रहता है।

तन्ज़ेन के पोस्टकार्ड में यही लिखा था — शब्दों में नहीं, उस शान्ति में जिसके साथ उन्होंने वे तीन पंक्तियाँ लिखीं।


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3 responses to “विदाई का पोस्टकार्ड — मृत्यु से न डरने की कला”

  1. Amrendra Nath Tripathi अवतार

    जीवन के हर काम की घोषणा करते रहे होंगे।

  2. Isha Narayan Mishra अवतार
    Isha Narayan Mishra

    बात कुछ हजम नहीं हुई

  3. Dilip Dubey अवतार
    Dilip Dubey

    पहली घोषणा होती है मैंने जन्म ले लिया है, मै कुछ नहीं लाया हूँ, अंतिम घोषणा है, जिस शरीर में मै आया था वह भी छोड़े जा रहा हूँ, अर्थात जैसे आया था वैसे ही जा रहा हूँ, कुछ था नहीं संसार में जो लेकर जा सकूँ।

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