मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने,
मैं कब कहता हूँ जीवन-मरू नंदन-कानन का फूल बने?
काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है,
मैं कब कहता हूँ वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने?
मैं कब कहता हूँ मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले?
मैं कब कहता हूँ प्यार करूँ तो मुझे प्राप्ति की ओट मिले?
मैं कब कहता हूँ विजय करूँ मेरा ऊँचा प्रासाद बने?
या पात्र जगत की श्रद्धा की मेरी धुंधली-सी याद बने?
पथ मेरा रहे प्रशस्त सदा क्यों विकल करे यह चाह मुझे?
नेतृत्व न मेरा छिन जावे क्यों इसकी हो परवाह मुझे?
मैं प्रस्तुत हूँ चाहे मेरी मिट्टी जनपद की धूल बने –
फिर उस धूली का कण-कण भी मेरा गति-रोधक शूल बने!
अपने जीवन का रस देकर जिसको यत्नों से पाला है –
क्या वह केवल अवसाद-मलिन झरते आँसू की माला है?
वे रोगी होंगे प्रेम जिन्हें अनुभव-रस का कटु प्याला है –
वे मुर्दे होंगे प्रेम जिन्हें सम्मोहन कारी हाला है
मैंने विदग्ध हो जान लिया, अन्तिम रहस्य पहचान लिया –
मैंने आहुति बन कर देखा यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है!
मैं कहता हूँ, मैं बढ़ता हूँ, मैं नभ की चोटी चढ़ता हूँ
कुचला जाकर भी धूली-सा आंधी सा और उमड़ता हूँ
मेरा जीवन ललकार बने, असफलता ही असि-धार बने
इस निर्मम रण में पग-पग का रुकना ही मेरा वार बने!
भव सारा तुझपर है स्वाहा सब कुछ तप कर अंगार बने –
तेरी पुकार सा दुर्निवार मेरा यह नीरव प्यार बने.
— सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ (Sachchidananda Hirananda Vatsyayan ‘Agyeya’)
वह प्रश्न जो उत्तर है
हिंदी के आधुनिक काव्य के शिखर-पुरुष अज्ञेय ने यह कविता लिखी — और इसमें एक भी माँग नहीं है।
न सुख की। न सफलता की। न प्रेम की प्राप्ति की। न यश की।
यह कविता “मैं कब कहता हूँ” से शुरू होती है — और हर बंद में यही दोहराती है।
यह माँग का नकार नहीं — यह एक नई चेतना है।
वह चेतना जो कहती है — जीवन से कुछ माँगना मेरा काम नहीं। जीवन को वह बनाना मेरा काम नहीं जो मुझे सुविधाजनक लगे। मेरा काम बस — बढ़ते रहना है।
“कुचला जाकर भी धूली-सा आँधी-सा और उमड़ता हूँ।”
यह पंक्ति पढ़कर साँस रुक जाती है।
मीराबाई — वह प्रेम जो यज्ञ था
अज्ञेय ने लिखा — “मैंने आहुति बन कर देखा यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है।”
और यह पंक्ति पढ़ते ही मीराबाई याद आती हैं।
मीरा ने राजमहल छोड़ा। परिवार का विरोध झेला। विष का प्याला पिया। मंदिरों में नाची — लोक-लाज की परवाह किए बिना।
क्या उन्होंने कभी कहा — “मेरे प्रेम के बदले में मुझे सुख दो?”
नहीं।
उनका प्रेम माँग नहीं था — आहुति थी। खुद को जलाकर जो रोशनी बनती है, वही उनकी भक्ति थी।
अज्ञेय की यह कविता और मीरा की भक्ति — दोनों एक ही आत्मा के दो रूप हैं। प्रेम जब माँगना छोड़ देता है — तभी वह सबसे बड़ा हो जाता है।
रेनर मारिया रिल्के का वह पत्र
ऑस्ट्रियाई कवि रेनर मारिया रिल्के (Rainer Maria Rilke) ने एक युवा कवि को पत्र में लिखा था —
“मैं चाहता हूँ कि तुम अपने भीतर के उन सभी अनसुलझे प्रश्नों से प्रेम करना सीखो — उनके उत्तर खोजने की जल्दी मत करो। अभी उन प्रश्नों के साथ जियो। शायद एक दिन, बहुत धीरे-धीरे — बिना जाने — तुम उत्तर में जीने लगोगे।”
अज्ञेय की यह कविता उसी जीवन-दर्शन से उपजी है।
जो व्यक्ति “मैं कब कहता हूँ” कह सकता है — वह उन प्रश्नों के साथ जीना सीख गया है। वह उत्तर की माँग नहीं करता।
वह बस — यज्ञ में अपनी आहुति देता रहता है।
फिल्म “मसान” — वह धूल जो आँधी बन जाती है
2015 की फिल्म “मसान” (Masaan) के अंत में दीपक (विक्की कौशल) — जो प्रेम में टूट चुका है, जो सब कुछ खो चुका है — गंगा के किनारे खड़ा है।
वह रोता नहीं। वह माँगता नहीं। वह बस — आगे बढ़ता है।
“कुचला जाकर भी धूली-सा आँधी-सा और उमड़ता हूँ।”
अज्ञेय की इस पंक्ति का कोई visual हो सकता है — तो वह “मसान” का वह अंतिम दृश्य है।
प्रेम में हार। जीवन में हार। और फिर भी — उमड़ना।
असफलता ही असि-धार है
“मेरा जीवन ललकार बने, असफलता ही असि-धार बने।”
यह पंक्ति उस सारे प्रेरणा-साहित्य को एक झटके में पीछे छोड़ देती है जो कहता है — “असफलता से सीखो और जीत हासिल करो।”
अज्ञेय कुछ और कह रहे हैं।
वे नहीं कह रहे कि असफलता के बाद जीत आएगी। वे कह रहे हैं — असफलता खुद ही तलवार है। असफलता खुद ही वार है।
जो व्यक्ति असफल होता है और फिर भी बढ़ता है — वह अपनी असफलता को हथियार बना लेता है। वह उससे लड़ता नहीं — उसे अपना अस्त्र बना लेता है।
यह वह स्थान है जहाँ दर्शन और काव्य एकाकार हो जाते हैं।
नीरव प्यार — जो पुकार से भी तेज़ है
कविता का अंतिम बंद सबसे गहरा है —
“तेरी पुकार-सा दुर्निवार मेरा यह नीरव प्यार बने।”
नीरव। मौन। चुप।
लेकिन दुर्निवार — जिसे रोका न जा सके।
जो प्रेम शोर करता है, वह अक्सर खुद को साबित करने की कोशिश होती है। जो प्रेम मौन रहता है — वह इतना गहरा होता है कि शब्दों की ज़रूरत नहीं रहती।
अज्ञेय का यह “नीरव प्यार” — जो आहुति बन जाता है, जो धूल बनकर भी आँधी बन जाता है — यही इस कविता की आत्मा है।
यह माँगता नहीं। यह टूटता नहीं। यह जलता है — और उसी जलन में जीता है।





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