Quora पर GJ Flannery ने यह लिखा था। मुझे अच्छा लगा और आपके लिए मैं इसे Hindizen पर अनुवाद करके प्रस्तुत कर रहा हूँ।
एक बार मैं एक बॉक्सिंग मैच में अपने पुलिस ऑफिसर दोस्त से लड़ रहा था। वह मुझसे बड़ा और ज़्यादा ताक़तवर था लेकिन मैं अधिक चुस्त था और पहले भी उससे बॉक्सिंग कर चुका था। मैंने उसे लगातार चार या पाँच पंच मारे। यह शानदार था। मैं जीत रहा था!
फिर एक पल के लिए मैंने अपना हेड गार्ड गिरा दिया। और उसने मुझे एक जबरदस्त पंच दिया। इसने मुझे नॉक आउट तो नहीं किया, मुझे कोई चोट नहीं लगी या तब इसका अहसास नहीं हुआ, मैं अपने पैरों पर ही खड़ा था, सुन्न-सुन्न-सा, और मेरी सारी फाइटिंग स्पिरिट हवा हो गई।
फाइट खत्म हो गई। फिर सुन्न होने का वह अहसास गायब हो गया। दर्द उभर आया।
इसके कुछ महीने बाद मेरी माँ गुज़र गईं। वो लम्बे समय से बीमार थीं लेकिन अचानक ही चली गईं। क्रिसमस के दिन हम डिनर करने गए थे। उसके एक हफ्ते बाद वो चल बसीं।
मुझे वह पल याद है जब मुझे उनके न रहने के बारे में पता चला। इसका अहसास भी उस पंच की तरह था। मुझे लगा कि ज़िंदगी जैसे मुझसे दूर बही जा रही थी, और ठीक उसी वक्त यह भी लग रहा था कि पूरी दुनिया में एक तरह का खालीपन आ गया था जिसे भरना नामुमकिन था। मैं दबे पाँव बाथरूम में गया, दरवाज़ा बंद किया, और आईने में खुद को देखता रहा। निपट खालीपन था।
इसके कुछ महीनों बाद मैंने किसी का दिल तोड़ दिया। मैं ऐसा नहीं करना चाहता था, लेकिन मैं बस 16 का ही था। मुझे पता नहीं था कि मैं किसी के लिए कितना ज़रूरी हो सकता था।
मैंने उसे अगले दिन मेरे एक दोस्त के दादाजी के अन्तिम संस्कार के समय देखा। वहाँ हर व्यक्ति दुखी था। मैं सारे रिवाज़ पूरे हो जाने के बाद उससे मिला। उसकी आँखें बिल्कुल खाली थीं। मुझे लगा जैसे मैं खुद को ही आईने में देख रहा था। जैसे मैं दुनिया के उस खालीपन में झाँक रहा था जिसमें मेरी माँ की आत्मा कभी रहती थी।
अन्त्येष्टि में आए किसी भी व्यक्ति का चेहरा वह बयाँ नहीं कर रहा था… हम दोनों के सिवा।
मैं घर गया और इस वाकये पर सोचता रहा। मैंने उसे चोट पहुँचाई जिससे मैं प्रेम करता था। मैं ही उसकी आँखों के सूनेपन की वजह था। मुझे माँ के चले जाने का अहसास और गहराई से होने लगा।
तभी सुन्न होने का वह अहसास चला गया और पीड़ा उभर आई।
अगले 6 महीने जैसे नर्क में बीते।
कुछ समय बाद मैंने यह पाया कि ज़ख्म भरने शुरू हो गए थे।
मुझे किसी तरह का ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ। कोई परमसत्य मेरे सामने प्रकट नहीं हुआ। समय ने अपने आप ही घाव का रिसना रोक दिया। साँस-दर-साँस जीवन मुझमें दोबारा लौट आया।
मैंने किसी तरह दर्द का सामना करना सीख लिया। कुछ लोगों ने भी मदद की। कुछ ने नहीं भी की। कुछ चीज़ें सही थीं पर कुछ गैरकानूनी भी थीं। मैं चोरी-छिपे ऐसी जगहों में गया जहाँ मुझे नहीं जाना चाहिए था, और इससे मुझे मदद मिली। मैं सुबह 4 बजे तक जागकर रोज़ लिखता रहा और क्लास में पूरे वक्त सोता रहा। मैंने घर के पिछवाड़े में मिले बिल्ली के बच्चों की देखभाल की। माँ के बगीचे में लगे पेड़-पौधों को मैंने खराब होने से बचा लिया और उन्हें बढ़ता देखता रहा। ये कुछ सबसे अच्छे उपाय थे।
चोट का निशान कभी नहीं गया। ये अपने हाथ को गँवाने जैसा था। मेरा एक हिस्सा बिखर गया था। लेकिन मेरा बाकी बचा भाग बेहतर हो रहा था।
माँ को गुज़रे लगभग 10 साल हो गए हैं। साल के पहले दिन उनकी दसवीं डेथ एनिवर्सरी होगी… कुछ ही घंटों के बाद।
आपको किसी चीज़ की अहमियत का अहसास तब तक नहीं होता जब तक वह आपको छोड़कर चली जाती है।
लेकिन जब आप ठीक मौके पर जाग जाते हैं तो आपको दूसरा मौका मिल जाता है। आपका दिन कितना ही बुरा क्यों न बीता हो, आपकी ज़िंदगी कितनी ही दुख भरी क्यों न हो, आपको दोबारा मौका ज़रूर मिलेगा। ताकि आप इसे पहले से अलग बना सकें, बेहतर बना सकें, जी सकें।
हम पंच झेलते हैं। हम टूटते हैं। हम दूसरों को तोड़ते हैं। हम दूसरों को खोते हैं।
लेकिन हम अपनी चोटों से उबरते हैं। हम बीज बोते हैं। हम कल, परसों और उसके भी अगले दिन कोशिश करते रहते हैं।
और जब हम गुज़र जाते हैं तब हम अपने प्रियजनों को उस बगीचे की देखरेख करने की प्रेरणा दे जाते हैं जिसे हमने कभी लगाया था।
माँ, ईश्वर तुम्हारी आत्मा को शांति दे।
सुन्न होना — दर्द से पहले की दया
मनोविज्ञान में इसे “Emotional Numbing” कहते हैं। जब कोई आघात बहुत अचानक और बहुत बड़ा होता है, तो मस्तिष्क एक सुरक्षा-कवच बना लेता है — वह दर्द को तुरंत अंदर नहीं आने देता।
यह कमज़ोरी नहीं है। यह शरीर की बुद्धिमत्ता है।
GJ Flannery ने बॉक्सिंग के उस पंच और माँ की मृत्यु — दोनों में एक ही अनुभव को पहचाना। पहले सुन्नपन। फिर दर्द। यह क्रम प्रकृति की देन है — ताकि हम एकदम से टूटें नहीं।
शोक की पाँच अवस्थाएँ — Kübler-Ross का मानचित्र
1969 में स्विस-अमेरिकी मनोचिकित्सक Elisabeth Kübler-Ross ने अपनी पुस्तक “On Death and Dying” में शोक की पाँच अवस्थाएँ बताईं —
इनकार (Denial) — “यह सच नहीं हो सकता।” क्रोध (Anger) — “यह क्यों हुआ? क्यों मेरे साथ?” मोलभाव (Bargaining) — “काश मैंने… काश वे…” अवसाद (Depression) — वह 6 महीने जो नर्क में बीते। स्वीकृति (Acceptance) — ज़ख्म भरने लगते हैं।
GJ Flannery ने इस मानचित्र को बिना जाने जिया। उन्होंने कोई किताब नहीं पढ़ी — वे बस जीते रहे। और यही सबसे बड़ा साहस है।
मिर्ज़ा ग़ालिब — दर्द जो भाषा बन गया
मिर्ज़ा ग़ालिब ने अपने जीवन में असह्य पीड़ाएँ झेलीं — सात बच्चों की मृत्यु, क़र्ज़, उपेक्षा, 1857 के ग़दर के बाद दिल्ली का विनाश।
लेकिन उन्होंने लिखा —
“हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमाँ, लेकिन फिर भी कम निकले।”
ग़ालिब ने दर्द को दफ़न नहीं किया — उन्होंने उसे शब्द दिए। GJ Flannery ने भी यही किया — सुबह 4 बजे तक लिखते रहे। लिखना शोक का सबसे पुराना उपचार है।
C.S. Lewis — “A Grief Observed”
ब्रिटिश लेखक C.S. Lewis — जो Narnia की दुनिया बनाने वाले — जब उनकी पत्नी Joy की कैंसर से मृत्यु हुई, तो उन्होंने अपना शोक एक डायरी में लिखा। वह डायरी बाद में “A Grief Observed” के नाम से प्रकाशित हुई।
उन्होंने लिखा — “शोक एक भावना नहीं है — यह एक प्रक्रिया है। और हर बार जब आपको लगता है कि आप बाहर निकल आए, तो एक मोड़ पर वह फिर खड़ा मिलता है।”
लेकिन उन्होंने यह भी लिखा — “वह चली गई। लेकिन वह थी। और यह होना — कभी न होने से असीम बेहतर है।”
माँ का बगीचा — सबसे गहरा रूपक
इस पूरे लेख में सबसे सुन्दर पंक्ति वह है जो अन्त में है —
“हम अपने प्रियजनों को उस बगीचे की देखरेख करने की प्रेरणा दे जाते हैं जिसे हमने कभी लगाया था।”
माँ का बगीचा — जिसे GJ Flannery ने खराब होने से बचाया — वह केवल पेड़-पौधों का बगीचा नहीं था। वह माँ की उपस्थिति का एकमात्र शेष रूप था। उसे सींचना माँ को याद करना था।
दुनियाभर की संस्कृतियों में यही परम्परा है — किसी प्रियजन के जाने के बाद उनके नाम पर पेड़ लगाना, बगीचा बनाना। भारत में भी पीपल और तुलसी — जो पूर्वजों की स्मृति से जुड़े हैं — यही काम करते हैं।
जो चले जाते हैं, वे मिट्टी में मिलकर नई जड़ें बन जाते हैं।
रूमी — टूटने में छुपी रोशनी
रूमी ने लिखा था —
“ज़ख्म वह जगह है जहाँ से रोशनी अंदर आती है।”
GJ Flannery का वह बाथरूम का आईना — वह टूटन — वही रोशनी का दरवाज़ा था। उस अँधेरे में जाने के बाद ही वे उससे बाहर निकल सके। और वे जो बाहर निकले — वे पहले से अलग थे। गहरे। अधिक मानवीय।
दर्द ने उन्हें तोड़ा नहीं — दर्द ने उन्हें बनाया।
हिंदी फिल्म “Kapoor & Sons” — अधूरी विदाई का दर्द
“Kapoor & Sons” (2016) में Rishi Kapoor का किरदार — एक बुज़ुर्ग दादा — मृत्यु के कगार पर है। पूरी फिल्म उन अनकहे शब्दों के बारे में है जो परिवार के सदस्य एक-दूसरे से कभी नहीं कह पाते।
GJ Flannery की माँ भी अचानक चली गईं — क्रिसमस डिनर के एक हफ्ते बाद। शायद बहुत कुछ अनकहा रह गया। शायद वह आखिरी डिनर ही वह विदाई थी जो किसी को पता नहीं थी।
हम कभी नहीं जानते कि आखिरी बार कब होगी। इसीलिए हर बार को पूरा जीना ज़रूरी है।
साँस-दर-साँस — सबसे सरल और सबसे सच्चा उपाय
GJ Flannery ने कोई बड़ा रहस्य नहीं खोजा। कोई formula नहीं मिला। बस —
बिल्ली के बच्चों की देखभाल की। पेड़-पौधों को पानी दिया। रात को लिखते रहे। साँस लेते रहे।
यही है। इतना ही है।
शोक का कोई shortcut नहीं है। कोई app नहीं है। कोई five-step process नहीं है। बस एक साँस के बाद दूसरी साँस — और एक दिन के बाद दूसरा दिन।
और एक दिन आप पाते हैं कि ज़ख्म रिस नहीं रहा। निशान है — लेकिन दर्द कम है।











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