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हम सपनों से बने हैं — और हमारी छोटी-सी ज़िंदगी एक नींद से घिरी है

“We are such stuff as dreams are made on, and our little life is rounded with a sleep.” — विलियम शेक्सपियर (William Shakespeare), The Tempest

यह पोस्ट पढ़ने का सबसे अच्छा वक्त रात का है।

जब घर में सब सो गए हों। जब बाहर की आवाज़ें कम हो गई हों। जब आपकी आँखें थोड़ी भारी होने लगी हों।

क्योंकि यह पोस्ट नींद के बारे में है।


तो यह तयशुदा है कि सपने देखने की तहकीकात करने के लिए हमें नींद की बात करनी होगी। नींद है तभी तो सपने हैं! जागती आँखों के सपने उम्मीदें हैं, भय हैं, पछतावे हैं, या महज़ ख़याली पुलाव हैं। सच के सपने देखने के लिए नींद की गहराइयों में उतरना ही होगा।

आपने कभी सोचा कि हम सोते क्यों हैं?

नींद में कोई तो खास बात होती होगी — तभी हमारे जीवन का लगभग एक तिहाई हिस्सा इस चीज़ में खप जाता है। नींद हमारे लिए इतनी ज़रूरी है कि यदि हम एक सप्ताह नहीं सोएँगे तो हमारी मृत्यु भी हो सकती है — जबकि भोजन के बिना लोग इससे भी कहीं अधिक दिनों तक जीवित रह जाते हैं। कुछ भी खाए-पिए बिना ज़िंदा रहने का Guinness record एक ऐसे कैदी के नाम है जिसे पुलिसवाले कालकोठरी में बंद करके भूल गए। अठारह दिन बाद किसी ने कोठरी खोलकर देखी तो वह उतना ही ज़िंदा था जितना कोई मरने के ठीक पहले होता है।

इस तरह कुछ भी खाए-पिए बिना ज़िंदा रहने का world record अठारह दिन का है — लेकिन जागते रहने का record महज़ दस दिनों का ही है।

नींद को लेकर एक ग़लतफहमी यह है कि जब हम सोते हैं तो हमारा brain काम करना बंद कर देता है। सच तो यह है कि उस समय brain और भी अधिक perfection से काम करने लगता है। जागते रहने के पिछले 18 घंटों के दौरान brain ने जो भी information create या collect की थीं — उन्हें brain systematically अलग-अलग तरह से छाँटता और बाँटता है, फिर उन्हें अपने अलग-अलग हिस्सों में store करता है। Brain यह काम इत्मीनान से करना चाहता है इसलिए वह हमें 6 से 8 घंटों के लिए नीमबेहोशी में भेज देता है। कुल मिलाकर नींद इसीलिए आती है।

नींद को लेकर लोगों में यही ग़लतफहमी होती है कि हम अपने शरीर की थकान मिटाने और energy को recharge करने के लिए सोते हैं। सो लेने पर हमारी थकान यकीनन थोड़ी तो मिटती ही है — लेकिन यह नींद का असल कारण नहीं है। नींद इसलिए ज़रूरी है ताकि हमारा brain maintenance-mode में चला जाए। यही कारण है कि students को पर्याप्त नींद लेना बहुत ज़रूरी होता है। किसी भी महत्वपूर्ण परीक्षा से पहले पूरी रात जागने का परिणाम आमतौर पर अच्छा नहीं होता।

नींद के बारे में एक और रोचक बात — हम सभी अपने अनुभवों से जानते हैं कि किसी चिड़िया के चहचहाने या बारिश की आवाज़ की बनिस्बत बच्चे के रोने या alarm की आवाज़ से हमारी नींद जल्दी खुलती है। इसका मतलब यह है कि हमारे सोने के दौरान भी brain सारे sensory inputs को receive करता रहता है — लेकिन वह जानता है कि इनमें से कौन सी बात ज़रूरी या गैर-ज़रूरी है। यदि brain को यह लगता है कि आपकी नींद पूरी नहीं हो रही है तो वह alarm की आवाज़ को नज़रअंदाज़ कर देता है। यदि आपको अलसुबह किसी बहुत ज़रूरी यात्रा पर निकलना है तो वह आपको पिछला sleep-cycle पूरा होने के बाद alarm बजने के पहले ही उठा देता है।

असल में हमारी नींद 90 मिनट के 5 parts में बँटी होती है। ये हमारे sleep-cycles हैं और हमें लगभग 5 cycles हर दिन पूरा करना ज़रूरी होता है।

सपने हमें हर sleep-cycle की समाप्ति के आसपास आते हैं। यदि आपको लगता है कि आपको सपने कभी-कभार आते हैं तो — यह भी आपकी ग़लतफहमी है। आप पूरी रात में कई बार सपने देखते हैं लेकिन होता यह है कि आपको सिर्फ अपना पिछला सपना ही याद रह पाता है। यह सपना वह होता है जो आपके पिछले sleep-cycle के खत्म होते-होते आया था। यदि आपकी नींद ठीक उसी वक्त खुलती है तो आप इसे कुछ-कुछ याद कर पाते हो।

लेकिन सपने होते क्या हैं? वे क्यों आते हैं?

यह समझना थोड़ा कठिन है। इसे बेहतर तरीके से समझने के लिए सपनों के बारे में इस तरह से सोचिए — किसी यात्रा से देर रात वापस आने पर आप देखते हैं कि आपके घर के किसी कमरे की लाइट चालू रह गई थी। इसे explain करने के लिए आप एक कहानी बुनने लगते हैं। इस कहानी की शुरुआत इन वाक्यों से होती है — drawing room या kitchen या garage की लाइट क्यों जल रही है?

सपने भी इसी तरह की चीज़ें हैं। वे उसी spot पर बुने जाने वाली कहानियाँ हैं जो हमें यह बताती हैं कि हमारे जाग जाने पर brain के कुछ हिस्सों की लाइट जल रही थी। आप जब सो रहे थे तब brain आपकी अब तक की ज़िंदगी की अनगिनत ज़रूरी और गैर-ज़रूरी बातों को और यादों को अपनी अलमारियों के अलग-अलग खानों में re-arrange कर रहा था। Sleep-cycle के अंत में जब ये चीज़ें arrange की जा रही थीं तब आपकी नींद खुल गई — और आप किसी-किसी बात को याद रखने में कामयाब रहे, लेकिन जागते ही चेतना ने आपको पूरी तरह से घेर लिया और फौरन ही या कुछ देर में आप अपना सपना भूल गए।

सपने आने के बारे में यह explanation देने के साथ ही neuroscience यह भी कहता है कि सपनों का कोई छुपा हुआ या रहस्यमय अर्थ नहीं होता। वह केवल हमारी चेतना है जो जाग जाने के बाद भी हमारे मस्तिष्क के कुछ हिस्सों के maintenance-mode में फँसे होने को random तरीके से समझने की कोशिश करती है। हमारा अवचेतन मन हमारे पुराने अनुभवों की अथाह समाधि है — असीम, और जिस पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है।


यहाँ neuroscience रुक जाता है।

लेकिन मनुष्य नहीं रुकता।

क्योंकि सपने देखना केवल brain की maintenance activity नहीं है। यह उससे कहीं अधिक पुरानी और गहरी बात है।

योग निद्रा (Yoga Nidra) — भारतीय परंपरा में नींद और जागरण के बीच की वह अवस्था जिसे “conscious sleep” कहते हैं — इसका उल्लेख Mandukya Upanishad में मिलता है। उपनिषद ने चेतना की चार अवस्थाएँ बताई हैं — जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय।

तुरीय — वह चौथी अवस्था जो तीनों से परे है।

उपनिषद कहता है — सपना केवल brain का काम नहीं है। सपना उस गहरी चेतना की झलक है जो हमारे भीतर है लेकिन जागते हुए दिखती नहीं। जब हम सोते हैं — तब वह चेतना ज़रा सी खुलती है।

Neuroscience जहाँ खत्म होता है — Upanishad वहाँ से शुरू होता है।

Jorge Luis Borges (होर्हे लुईस बोर्हेस) — अर्जेंटीना के वे महान लेखक जिनकी हर कहानी एक ऐसे dream की तरह है जिसका अंत नहीं होता — उन्होंने एक बार लिखा था: “Time forks perpetually toward innumerable futures. In one of them, I am your enemy.”

उनकी सबसे प्रसिद्ध कहानियों में से एक है “The Circular Ruins” — जिसमें एक आदमी एक इंसान को सपने में इतनी गहराई से रचता है कि वह वास्तविकता में प्रकट हो जाता है। अंत में उसे पता चलता है — वह खुद भी किसी और के सपने का पात्र है।

Neuroscience कहता है — सपने random हैं। Borges कहते हैं — शायद सपने ही असल हैं।

दोनों के बीच का रहस्य वही है जो Shakespeare ने The Tempest में कहा था।

हम सपनों से बने हैं।

2014 की हिंदी फिल्म “Queen” में एक दृश्य है — रानी (Kangana Ranaut) पहली बार अकेली Paris में है। रात को hotel के कमरे में वह खिड़की से बाहर देखती है। शहर जगमगाता है। और वह अचानक महसूस करती है — यह real है।

वह दृश्य उस अनुभव की तरह है जब नींद और जागना एक पल के लिए घुल जाते हैं। जब आप एक सपने में इतने गहरे हों कि वह सच लगे। या जब सच इतना अप्रत्याशित हो कि सपना लगे।

रानी का वह पल — वह brain का maintenance नहीं था। वह कुछ और था।


तो अब आप यह पोस्ट पढ़ते-पढ़ते थोड़ा और थक गए हैं।

आँखें और भारी हुई हैं।

जल्द ही आप सो जाएँगे। और आपका brain — जो यह सब पढ़ रहा था — इसे अपनी अलमारियों में कहीं रख देगा। शायद किसी पुरानी memory के पास। शायद किसी अधूरे सपने के पास।

और रात को — जब कोई sleep-cycle खत्म होगा और brain की कोई “लाइट” जलती रहेगी —

शायद आप Shakespeare को याद करेंगे।

शायद Borges को।

शायद किसी को नहीं।

बस एक सपना देखेंगे — जिसका अर्थ होगा या नहीं होगा। लेकिन जो होगा — वह आपका होगा।

शुभ रात्रि।



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