सर्दियों का पूरा मौसम नसरुद्दीन ने अपने बगीचे की देखरेख में बिताया. वसंत आते ही हर तरफ मनमोहक फूलों ने अपनी छटा बिखेरी. बेहतरीन गुलाबों और दूसरे शानदार फूलों के बीच नसरुद्दीन को कुछ जंगली फूल भी झांकते दिख गए.

नसरुद्दीन ने उन फूलों को उखाड़कर फेंक दिया. कुछ दिनों के भीतर वे जंगली फूल और खरपतवार फिर से उग आये.

नसरुद्दीन ने सोचा क्यों न उन्हें खरपतवार दूर करनेवाली दवा का छिडकाव करके नष्ट कर दिया जाए. लेकिन किसी जानकार ने नसरुद्दीन को बताया कि ऐसी दवाएं अच्छे फूलों को भी कुछ हद तक नुकसान पहुंचाएंगी. निराश होकर नसरुद्दीन ने किसी अनुभवी माली की सलाह लेने का तय किया.

“ये जंगली फूल, ये खरपतवार…”, माली ने कहा, “यह तो शादीशुदा होने की तरह है, जहाँ बहुत सी बातें अच्छीं होतीं हैं तो कुछ अनचाही दिक्कतें और तकलीफें भी पैदा हो जातीं हैं”.

“अब मैं क्या करूं?”, नसरुद्दीन ने पूछा.

“तुम अगर उन्हें प्यार नहीं कर सकते हो तो बस नज़रंदाज़ करना सीखो. इन चीज़ों की तुमने कोई ख्वाहिश तो नहीं की थी लेकिन अब वे तुम्हारे बगीचे का हिस्सा बन गयीं हैं.” (image credit)


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12 responses to “जंगली फूल”

  1. इतना बड़ा ज्ञान इतनी सरलता से दे गये आप..

  2. Every thing is not good in life.We must bear odds also

  3. अपने हिस्से का सब कुछ हमें स्वीकारना चाहिए – असल बात यही है !
    अब मेरे प्रिय ’मुल्ला’ हों यहाँ, तो ज्ञान मिलेगा ही ।
    आभार ।

  4. behtari ke liye kuchh baton ko ignore karna hai jaruri hota hai

  5. श्री राम जन्म की बधाईयाँ 🙂 शुभकामनाएं |

  6. very-very well written, the moral of the story has been highlighted gracafully indeed and is beneficial for all of us at the of the day.

  7. सही है जिन्हें भूल नहीं सकते उनके बारे में सोचना भी नहीं चाहिए

  8. तौसीम अंसारी अवतार
    तौसीम अंसारी

    मुल्ला चच्चा जिंदाबाद जिंदाबाद |||||||

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