“लोग अक्सर ही सत्य को भूल क्यों जाते हैं”, यात्री ने गुरु से पूछा.
“कैसा सत्य?”, गुरु ने पूछा.
“मैं जीवन में कई बार सत्य के मार्ग से भटक गया”, यात्री ने कहा, “और हर बार मैं किसी भांति मार्ग पर लौट आया”.
गुरु ने कहा, “सत्य तो यह है कि हम सभी हर घड़ी परिवर्तित हो रहे हैं. आज तुम जिसे सत्य कह रहे हो वह बीत चुके कल और आने वाले कल के सत्य सरीखा नहीं होगा. वास्तविक सत्य तो परिवर्तन के परे है. तुम उसे जकड़े या थामे नहीं रह सकते. वह तुम्हारे मार्ग से भटकने या उसपर वापस आ जाने से संबंधित नहीं है.”
“मुझे यह सत्य कैसे मिलेगा?”, यात्री ने पूछा.
“तुम ऐसा सत्य न तो खोज सकते हो और न ही उसे खो सकते हो. तुम उसे भुला भी नहीं सकते. यह सम्पूर्ण और शून्य दोनों को ही समाहित रखता है. यही परम सत्य है”.






Leave a Reply to Sandeep BhallaCancel reply