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जब एक महाशक्ति काग़ज़ के महल की तरह ढह गई — सोवियत संघ का विघटन

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जब एक महाशक्ति काग़ज़ के महल की तरह ढह गई

सोवियत संघ का विघटन — इतिहास का सबसे चौंकाने वाला “बिना युद्ध के हारा गया युद्ध”

26 दिसंबर, 1991

26 दिसंबर, 1991 को सोवियत संघ (Union of Soviet Socialist Republics, USSR) विघटित होकर 15 देशों में टूट गया। संघ के टूटने के बाद बनने वाले नए देश ये थे:

बाल्टिक देश (Baltic States)
एस्तोनिया (Estonia) लातविया (Latvia) लिथुआनिया (Lithuania)
केंद्रीय एशिया (Central Asia)
कज़ाखस्तान (Kazakhstan) किर्गिज़्स्तान (Kyrgyzstan) ताजिकिस्तान (Tajikistan) तुर्कमेनिस्तान (Turkmenistan) उज़्बेकिस्तान (Uzbekistan)
पूर्वी यूरोप (Eastern Europe)
बेलारूस (Belarus) माल्दोवा (Moldova) यूक्रेन (Ukraine)
यूरेशिया (Eurasia)
रूस (Russia)
ट्रांसकॉकेशिया (Transcaucasia)
आर्मेनिया (Armenia) अज़रबैजान (Azerbaijan) जॉर्जिया (Georgia)
Post-Soviet States (Alphabetical Order)
1. Armenia    2. Azerbaijan    3. Belarus    4. Estonia    5. Georgia    6. Kazakhstan    7. Kyrgyzstan    8. Latvia    9. Lithuania    10. Moldova    11. Russia    12. Tajikistan    13. Turkmenistan    14. Ukraine    15. Uzbekistan

यह जानना रोचक है कि पहले भी सोवियत संघ विश्व का सबसे बड़ा देश था और इससे टूटने के बाद भी रूस अभी तक विश्व का सबसे बड़ा देश है।

ज़रा सोचिए — एक ऐसा देश जो पृथ्वी के कुल भूभाग का लगभग छठा हिस्सा था, जिसके पास दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु शस्त्रागार था, जिसने इंसान को पहली बार अंतरिक्ष में भेजा था — वो एक सुबह उठकर मानचित्र से ग़ायब हो गया। न कोई बम गिरा, न कोई विदेशी सेना आई। ये इतिहास का शायद सबसे चौंकाने वाला “बिना युद्ध के हारा गया युद्ध” था।

विंस्टन चर्चिल ने एक बार रूस के बारे में कहा था —

“यह एक पहेली है, जो एक रहस्य में लिपटी है, जो एक गूढ़ता के भीतर बन्द है।”

सोवियत संघ का पतन भी ऐसी ही पहेली है — जिसे समझने के लिए कई परतें खोलनी पड़ती हैं।

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पतन के प्रमुख कारण

सोवियत संघ के पतन के पीछे अनेक कारण थे। प्रमुख कारणों की सूची यह है:

  • रोनाल्ड रीगन के नेतृत्व में सं. रा. अमेरिका का पुनरुत्थान
  • कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से उत्पन्न आर्थिक परिस्थितियाँ
  • अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत संघ की पराजय
  • पूर्वी यूरोप में लोकतांत्रिक क्रांति का होना जिससे बर्लिन की दीवार गिरने पर पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी का एकीकरण हुआ
  • मिखाइल गोर्बाचोव के युवा व प्रगतिशील नेतृत्व में सोवियत नागरिकों पर प्रतिबंध व सेंसर का शिथिल होना — जिसके परिणामस्वरूप लोगों को अपने विचार प्रकट करने और विद्यमान सत्ता के विकल्प खोजने की स्वतंत्रता मिली

इन कारणों को ठीक से समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा — उस अमेरिका की ओर जो ख़ुद बिखर रहा था।

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अमेरिका का अँधेरा दौर — और रीगन का उदय

जब रीगन 1981 में सं. रा. अमेरिका के राष्ट्रपति बने तब USA सोवियत संघ से शीतयुद्ध में हार रहा था। 1960 और 70 के दशक में USA बहुत सारी आंतरिक राजनीतिक समस्याओं से जूझता रहा:

1963
राष्ट्रपति जॉन एफ़ कैनेडी की हत्या हो गई थी
1960–70
राष्ट्रपति लिंडन बी जॉन्सन वियतनाम के दुर्भाग्यपूर्ण युद्ध में भारी जान-माल के नुकसान और विरोध आंदोलन से परेशान रहे
1974
राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को बदनाम होकर त्यागपत्र देना पड़ा (वॉटरगेट कांड); राष्ट्रपति जेराल्ड फ़ोर्ड बिना किसी चुनाव के ही पद पर आसीन रहे
1979
राष्ट्रपति जिमी कार्टर असहाय होकर ईरान में अमेरिकी दूतावास को बंधक बनता देखते रहे
1981
रोनाल्ड रीगन ने राष्ट्रपति पद सम्भाला — “It’s morning again in America”

1950 के दशक से ही किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति ने पद पर पूरे 8 वर्ष तक कार्य नहीं किया था। अमेरिका की असंतुष्ट बेबी बूमर्स (द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पले-बढ़े लोग) जनता और मिडल-ईस्ट में तेल संकट से शासन और आर्थिक नीतियों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ रहा था।

ये वो दौर था जब अमेरिकी जनता का अपने ही देश पर भरोसा उठ चुका था। गैस स्टेशनों पर लम्बी लाइनें लगती थीं, बेरोज़गारी बढ़ रही थी, और “American Dream” एक मज़ाक़ लगने लगा था।

ऐसे में रोनाल्ड रीगन — एक पूर्व हॉलीवुड अभिनेता जो कैलिफ़ोर्निया का गवर्नर रह चुका था — ने राष्ट्रपति पद सम्भाला। रीगन को कम्युनिकेशन का अद्भुत हुनर था। वो जटिल नीतियों को सरल शब्दों में समझा सकते थे, हास्य का इस्तेमाल करते थे, और अमेरिकी जनता को फिर से गर्व करना सिखाया।

उनका मशहूर नारा था — “It’s morning again in America” — अमेरिका में फिर सुबह हो रही है।

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आर्थिक मोर्चा — जहाँ असली लड़ाई लड़ी गई

रीगन के नेतृत्व में अमेरिका की आर्थिक स्थिति संभलने लगी। अमेरिकी फ़ेडरल रिज़र्व बैंक के चेयरमेन पॉल वोल्कर (Paul Volcker) द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने और तेल की कीमतों में कमी आने से मुद्रास्फ़ीति (inflation) में गिरावट आई। आर्थिक उदारीकरण से विश्व व्यापार में अमेरिका की भागीदारी तेज़ी से बढ़ने लगी। चीन, भारत और यूरोप के कई देश भी उन्नति की राह पर चल पड़े।

उछाल मारती अमेरिकी अर्थव्यवस्था ने इसके संसाधनों में बहुत वृद्धि की और अब इसके पास राजनीतिक शक्तिसम्पन्न राष्ट्रपति था जो सोवियत संघ को पूरी ताक़त से चुनौती देने में सक्षम था।

ये समझना ज़रूरी है कि शीतयुद्ध सिर्फ़ हथियारों की होड़ नहीं थी — यह अर्थव्यवस्थाओं की होड़ थी। जो देश ज़्यादा कमा सकता था, ज़्यादा ख़र्च कर सकता था — वो ज़्यादा हथियार बना सकता था, ज़्यादा गठबंधन बना सकता था, ज़्यादा प्रभाव रख सकता था। अमेरिका की अर्थव्यवस्था पूँजीवादी थी — उसमें लचीलापन था, नवाचार था, व्यक्तिगत प्रोत्साहन था। सोवियत अर्थव्यवस्था केंद्रीय नियोजन पर चलती थी — मॉस्को में बैठे अधिकारी तय करते थे कि साइबेरिया के किसी गाँव में कितने जूते बनेंगे और कितनी रोटियाँ पकेंगी। इसमें दक्षता की जगह नौकरशाही थी, और समय के साथ ये व्यवस्था भीतर से खोखली होती गई।

एक मशहूर रूसी चुटकुला उस दौर की हालत बयान करता है: “हम काम करने का नाटक करते हैं, और सरकार हमें तनख़्वाह देने का नाटक करती है।”

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अफ़ग़ानिस्तान — सोवियत संघ का वियतनाम

रीगन ने अफ़ग़ानिस्तान में मुस्लिम लड़ाकों (मुजाहिदीन) को सोवियत संघ का मुकाबला करने के लिए हर सम्भव सहायता उपलब्ध कराई। जिस तरह से वियतनाम के युद्ध में सोवियत संघ के कारण अमेरिका की अपमानजनक विदाई हुई थी उसी तरह से सोवियत संघ को अफ़ग़ानिस्तान से पीछे हटना पड़ा। सोवियत संघ में शिथिल हो चुकी सेंसरशिप के कारण नागरिकों ने इन ख़बरों से यह जान लिया कि सोवियत संघ कमज़ोर हो रहा था।

अफ़ग़ानिस्तान का युद्ध सोवियत संघ के लिए वैसा ही साबित हुआ जैसा वियतनाम अमेरिका के लिए रहा — एक ऐसा दलदल जिसमें जितना ज़्यादा धँसो, उतना मुश्किल निकलना। दस साल (1979–1989) तक चली इस लड़ाई में लगभग 15,000 सोवियत सैनिक मारे गए और हज़ारों अपंग होकर लौटे। अफ़ग़ानिस्तान की पहाड़ी ज़मीन, गुरिल्ला युद्ध की रणनीति, और अमेरिकी Stinger मिसाइलों ने सोवियत सेना की कमर तोड़ दी। पहले सोवियत नागरिकों को पता ही नहीं चलता था कि उनके बेटे कहाँ मर रहे हैं — ताबूत बन्द हालत में आते थे और सवाल पूछने की इजाज़त नहीं थी। मगर गोर्बाचोव की ग्लास्नोस्त नीति ने ये राज़ खोल दिए।

जब ज़िंक के ताबूतों में लिपटे सैनिक गाँव-गाँव पहुँचने लगे और माँएँ सवाल पूछने लगीं कि मेरा बेटा किसलिए मरा — तो सत्ता की नींव हिलने लगी।

स्वेतलाना अलेक्सीविच — जिन्हें 2015 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला — ने अपनी किताब “Zinky Boys” में इन माँओं और सैनिकों की कहानियाँ दर्ज कीं।

वो लिखती हैं कि लड़के बीस-इक्कीस साल के थे, उन्हें बताया गया कि वो “भाईचारे की मदद” के लिए जा रहे हैं — मगर असल में वो एक ऐसे युद्ध में भेजे गए जिसका कोई मक़सद नहीं था।

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चेरनोबिल — जिस रात सोवियत “सिस्टम” का असली चेहरा दिखा

सोवियत संघ के पतन की कहानी बिना चेरनोबिल के अधूरी है। 26 अप्रैल 1986 की रात को यूक्रेन के प्रिप्यात शहर में चेरनोबिल परमाणु ऊर्जा संयंत्र का रिएक्टर नंबर 4 फट गया। ये इतिहास की सबसे भयानक परमाणु दुर्घटना थी।

मगर दुर्घटना से भी ज़्यादा भयानक था सोवियत सरकार का रवैया। पहले तो उन्होंने दुर्घटना छुपाई — प्रिप्यात के नागरिकों को 36 घंटे तक बताया ही नहीं गया कि उनके शहर से कुछ किलोमीटर दूर एक परमाणु भट्टी खुले आसमान के नीचे जल रही है। बच्चे स्कूल गए, लोगों ने शादियाँ कीं, किसान खेतों में गए। जब दुनिया को पता चला — स्वीडन में रेडिएशन डिटेक्टर बजने लगे — तब सोवियत सरकार ने स्वीकार किया कि “एक छोटी सी दुर्घटना” हुई है।

गोर्बाचोव ने बाद में स्वीकार किया कि चेरनोबिल ने सोवियत व्यवस्था की सड़ाँध को सबके सामने ला दिया। एक ऐसा तंत्र जो अपने ही नागरिकों की जान बचाने से ज़्यादा अपनी इज़्ज़त बचाने में लगा था — उस पर से भरोसा उठना स्वाभाविक था। चेरनोबिल सिर्फ़ एक दुर्घटना नहीं थी — ये सोवियत झूठ की व्यवस्था में पड़ी पहली बड़ी दरार थी।

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अनैतिक तरीक़े — शीतयुद्ध का स्याह पक्ष

रीगन ने साम्यवाद को कुचलने के लिए उन तरीक़ों का भी इस्तेमाल किया जो अनैतिक माने जाते हैं। उन्होंने ईरान को हथियार बेचे और निकारागुआ में कम्युनिस्ट-विरोधी आंदोलनकारियों को आर्थिक मदद दी।

ये शीतयुद्ध की एक कड़वी सच्चाई थी — दोनों महाशक्तियाँ दुनिया भर में अपनी-अपनी बिसात बिछा रही थीं और मोहरे बन रहे थे छोटे देश और उनके नागरिक। लैटिन अमेरिका, अफ़्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया — हर जगह ये दो महाशक्तियाँ अपने-अपने कठपुतली शासन स्थापित कर रही थीं। ईरान-कॉन्ट्रा स्कैंडल (Iran-Contra affair) इसी का उदाहरण था — अमेरिका ने चोरी-छिपे ईरान को हथियार बेचे और उस पैसे से निकारागुआ में विद्रोहियों की फ़ंडिंग की। जब ये बात सामने आई तो अमेरिका में भी बड़ा राजनीतिक तूफ़ान आया।

इतिहास न पूरी तरह काला होता है, न सफ़ेद — बल्कि स्लेटी रंग के अनगिनत शेड्स में रंगा होता है।

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बर्लिन की दीवार — जब एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस ने इतिहास बदल दिया

पोलेंड में रीगन ने लेख वालेसा (Lech Wałęsa) के नेतृत्व में सॉलिडेरिटी (Solidarity) नामक लेबर यूनियन आंदोलन का समर्थन किया। इसने यूरोप में सरकारों को कमज़ोर किया और जर्मनी में 1989 की क्रांति के दौरान बर्लिन की दीवार टूट गई। यह दीवार पश्चिमी बर्लिन और जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य के बीच एक अवरोध थी जिसने 28 साल तक बर्लिन शहर को पूर्वी और पश्चिमी टुकड़ों में विभाजित करके रखा था। इसका निर्माण 1961 में शुरू हुआ था और 9 नवम्बर, 1989 के बाद के कुछ सप्ताहों में इसे तोड़ दिया गया।

बर्लिन की दीवार गिरने की कहानी इतिहास की सबसे अविश्वसनीय कहानियों में से एक है — और शुरू हुई एक ग़लतफ़हमी से। 9 नवम्बर 1989 को पूर्वी जर्मनी की सरकार ने यात्रा प्रतिबंधों में कुछ ढील देने का फ़ैसला किया। सरकारी प्रवक्ता गुंटर शाबोव्स्की को प्रेस कॉन्फ़्रेंस में इसकी घोषणा करनी थी। मगर उन्हें पूरी जानकारी नहीं दी गई थी। जब एक पत्रकार ने पूछा कि ये नियम कब से लागू होंगे, तो शाबोव्स्की ने अपने काग़ज़ पलटे, कुछ नहीं मिला, और कहा —

“तुरन्त… बिना किसी देरी के।”

बस। ये शब्द टेलीविज़न पर प्रसारित हुए। हज़ारों पूर्वी बर्लिन वासी दीवार की ओर दौड़ पड़े। सीमा रक्षकों को कोई आदेश नहीं मिला। भीड़ इतनी बड़ी थी कि गोली चलाना नामुमकिन था। आख़िरकार गेट खोल दिए गए। लोग दीवार पर चढ़ गए, एक-दूसरे को गले लगाने लगे, हथौड़ों से दीवार तोड़ने लगे। 28 साल में पहली बार परिवार मिले — भाई-बहन, माँ-बेटे, दोस्त जो दशकों से नहीं मिल पाए थे। जो दीवार दुनिया की सबसे मज़बूत विभाजन रेखा थी, वो एक शाम में लोगों की इच्छाशक्ति के आगे ढह गई।

लेख वालेसा — जो एक इलेक्ट्रीशियन और शिपयार्ड मज़दूर थे — ने पोलेंड में सॉलिडेरिटी आंदोलन खड़ा किया था। उन्हें गिरफ़्तार किया गया, प्रताड़ित किया गया, मगर वो नहीं रुके।

1983 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार मिला, और 1990 में वो पोलेंड के पहले लोकतांत्रिक रूप से चुने गए राष्ट्रपति बने। एक मज़दूर ने महाशक्ति को हिला दिया — ये कहानी अपने आप में असाधारण है।

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तेल — महाशक्ति की नस

तेल की कीमतों में हो रही गिरावट से सोवियत संघ को कठिनाई हो रही थी क्योंकि यह बहुत बड़ा तेल उत्पादक था।

सोवियत अर्थव्यवस्था का एक बहुत बड़ा हिस्सा तेल और गैस के निर्यात पर निर्भर था। 1980 के दशक के मध्य में सऊदी अरब ने तेल उत्पादन बढ़ा दिया — कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ये अमेरिकी दबाव में हुआ। कीमतें 1985–86 में लगभग आधी हो गईं। सोवियत संघ के लिए ये ऐसा था जैसे किसी के सबसे बड़े आय स्रोत पर ताला लग जाए। देश की विदेशी मुद्रा भंडार सूखने लगी, और जो व्यवस्था पहले से ही भीतर से जर्जर थी, वो आर्थिक रूप से भी टूटने लगी।

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बुश और रीगन — दो खिलाड़ी, एक रणनीति

(सीनियर) जॉर्ज बुश (George H.W. Bush) रीगन के उपराष्ट्रपति थे और CIA के भूतपूर्व निदेशक रह चुके थे। दोनों ने साथ काम करके यूरोप में सोवियत संघ की शक्तियों को बहुत सीमित कर दिया।

1989 की क्रांति की लहरें आगे बढ़ते-बढ़ते अपना प्रभाव दिखाती रहीं और पूर्वी यूरोप की अनेक अधिनायकवादी निरंकुश सरकारों को सत्ता छोड़नी पड़ी।

1989 एक ऐसा साल था जो पूर्वी यूरोप में डॉमिनोज़ गिरने जैसा रहा। पोलेंड में सॉलिडेरिटी ने चुनाव जीते, हंगरी ने अपनी सीमाएँ खोलीं, चेकोस्लोवाकिया में “Velvet Revolution” हुई जहाँ बिना एक बूँद ख़ून बहाए सत्ता बदल गई, और रोमानिया में तानाशाह चाउशेस्कू को गिराकर उसका परीक्षण और मृत्युदंड दे दिया गया।

हर हफ़्ते एक नई सरकार गिर रही थी — और मॉस्को चुपचाप देख रहा था, क्योंकि अब उसके पास न ताक़त बची थी न इच्छाशक्ति।

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गोर्बाचोव — जिसने खिड़की खोली और तूफ़ान आ गया

इसी के समानांतर, सोवियत नेता गोर्बाचोव अपने पहले के सोवियत नेताओं की तुलना में बहुत उदारवादी थे। वे साम्यवाद के विरुद्ध बह रही हवा का सामना कठोरता से नहीं कर सके। उनकी उदारवादी आर्थिक नीतियों और सेंसरशिप (ग्लास्नोस्त और पेरेस्त्रोइका, Glasnost and Perestroika) में ढील देने से सोवियत सत्ता और भी कमज़ोर होती गई। अधिकारवादी सत्ता जब कमज़ोर पड़ने लगी तो बोरिस येल्त्सिन (Boris Yeltsin) जैसे स्थानीय क्षत्रपों का प्रभाव बढ़ता गया।

गोर्बाचोव इतिहास की सबसे विरोधाभासी शख़्सियतों में से एक हैं। उन्होंने दो बड़े सुधार किए — ग्लास्नोस्त (खुलापन — मीडिया और बोलने की स्वतंत्रता) और पेरेस्त्रोइका (पुनर्गठन — आर्थिक सुधार)। उनका इरादा सोवियत संघ को बचाना था, उसे आधुनिक बनाना था। मगर हुआ उल्टा — जब लोगों को बोलने की आज़ादी मिली तो उन्होंने वो सब कहा जो दशकों से दबा हुआ था। और जब आर्थिक सुधार शुरू हुए तो पुरानी व्यवस्था टूटी लेकिन नई बन नहीं पाई।

ये वैसा ही था जैसे किसी पुरानी इमारत की एक दीवार सुधारने के लिए तोड़ो और पूरी इमारत ही गिर जाए — क्योंकि हर दीवार दूसरी को सहारा दे रही थी।

54 साल की उम्र में सत्ता में आए गोर्बाचोव अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में नाटकीय रूप से अलग थे। उनसे पहले के तीन सोवियत नेता — ब्रेझनेव, आंद्रोपोव, और चेर्नेंको — सब बूढ़े और बीमार थे, और तीनों की सत्ता में रहते हुए ही मृत्यु हो गई। एक मज़ाक़ उस दौर में प्रचलित था: “अगली सोवियत नेता की शवयात्रा के टिकट कहाँ मिलेंगे?”

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अगस्त 1991 का तख़्तापलट — आख़िरी हिचकी

सोवियत संघ के पतन का सबसे नाटकीय क्षण अगस्त 1991 में आया, जब कट्टरपंथी कम्युनिस्ट नेताओं ने गोर्बाचोव को उनके क्रीमिया स्थित अवकाश गृह में नज़रबन्द कर दिया और तख़्तापलट की कोशिश की। टैंक मॉस्को की सड़कों पर उतर आए।

मगर इस बार कुछ अलग हुआ। बोरिस येल्त्सिन — रूसी गणराज्य के राष्ट्रपति — एक टैंक के ऊपर चढ़ गए और भीड़ को सम्बोधित किया। उन्होंने तख़्तापलट को ग़ैरक़ानूनी घोषित किया। हज़ारों नागरिक रूसी संसद भवन (व्हाइट हाउस) की रक्षा के लिए इकट्ठा हो गए। सेना ने आम नागरिकों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया। तीन दिनों में तख़्तापलट असफल हो गया।

ये वो क्षण था जब सबको स्पष्ट हो गया — सोवियत संघ ख़त्म हो चुका है। जो तंत्र अपने ही नागरिकों को नहीं दबा सकता, वो राज्यों को क्या रोकेगा?

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अन्तिम अंक — एक झंडा उतरा, एक युग समाप्त हुआ

सोवियत संघ के बहुत कमज़ोर और दीवालिया हो जाने पर उसके वे राज्य उससे अलग हो गए जिन पर सोवियत संघ ने ज़बरन क़ब्ज़ा किया हुआ था या जिनका सामाजिक-सांस्कृतिक स्वरूप सोवियत संघ से भिन्न था।

बाल्टिक देश — एस्तोनिया, लातविया, लिथुआनिया — सबसे पहले अलग हुए। इन देशों ने अपनी स्वतंत्रता की माँग एक अनोखे तरीक़े से रखी — गाकर। 1989 में लगभग बीस लाख लोगों ने तीनों देशों में हाथ पकड़कर 675 किलोमीटर लम्बी मानव शृंखला बनाई — जिसे “बाल्टिक चेन” या “बाल्टिक वे” कहा जाता है।

कोई हथियार नहीं, कोई हिंसा नहीं — बस लोग, हाथ में हाथ, गीत गाते हुए। ये इतिहास के सबसे शक्तिशाली अहिंसक प्रदर्शनों में से एक था।

25 दिसम्बर 1991 की शाम को गोर्बाचोव ने टेलीविज़न पर राष्ट्र को सम्बोधित किया और अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया। उस रात क्रेमलिन से सोवियत संघ का लाल झंडा — हथौड़ा और दरांती वाला — आख़िरी बार उतारा गया, और उसकी जगह रूस का तिरंगा फहराया गया। कोई धूमधाम नहीं थी, कोई जश्न नहीं। बस ख़ामोशी थी — जैसे कोई बहुत पुराना, बहुत बड़ा पेड़ आख़िरकार ज़मीन पर आ गिरा हो।

अगले दिन — 26 दिसम्बर 1991 को — सोवियत संघ आधिकारिक रूप से अस्तित्व में नहीं रहा।

सोवियत संघ से बने 15 देश

1.आर्मेनिया (Armenia)
2.अज़रबैजान (Azerbaijan)
3.बेलारूस (Belarus)
4.एस्तोनिया (Estonia)
5.जॉर्जिया (Georgia)
6.कज़ाखस्तान (Kazakhstan)
7.किर्गिज़्स्तान (Kyrgyzstan)
8.लातविया (Latvia)
9.लिथुआनिया (Lithuania)
10.माल्दोवा (Moldova)
11.रूस (Russia)
12.ताजिकिस्तान (Tajikistan)
13.तुर्कमेनिस्तान (Turkmenistan)
14.यूक्रेन (Ukraine)
15.उज़्बेकिस्तान (Uzbekistan)
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इतिहास क्या सिखाता है?

सोवियत संघ का पतन हमें कई बातें सिखाता है।

सत्य दबाया नहीं जा सकता

कोई भी व्यवस्था जो सत्य को दबाती है, अंततः सत्य के बोझ तले दब जाती है। चेरनोबिल हो या अफ़ग़ानिस्तान के ताबूत — जब तक सच छुपाया गया, व्यवस्था चलती रही। जैसे ही सच बाहर आया, व्यवस्था बिखर गई।

ताक़त वहाँ नहीं जहाँ दिखती है

सोवियत संघ के पास दुनिया की सबसे बड़ी सेना, हज़ारों परमाणु हथियार, अंतरिक्ष कार्यक्रम था — मगर भीतर से वो खोखला था। बाहरी दिखावा भीतरी सच को ज़्यादा दिनों तक छुपा नहीं सकता।

बदलाव कहाँ से भी आ सकता है

एक इलेक्ट्रीशियन (वालेसा) ने महाशक्ति को हिलाया। बीस लाख लोगों ने हाथ पकड़कर तीन देशों को आज़ाद कराया। एक प्रवक्ता की ग़लती ने दीवार गिरा दी। इतिहास हमेशा राजाओं और सेनापतियों से नहीं बनता।

अलेक्सान्द्र सोल्ज़ेनित्सिन — जिन्होंने सोवियत लेबर कैम्पों पर “The Gulag Archipelago” लिखी — ने कहा था:

“झूठ पर खड़ी व्यवस्था को बनाए रखने के लिए हिंसा चाहिए, और हिंसा को बनाए रखने के लिए झूठ चाहिए।” ये चक्र एक दिन टूटता ही है।

जॉर्ज ऑरवेल ने 1949 में अपने उपन्यास “1984” में एक ऐसी सर्वसत्तावादी दुनिया की कल्पना की थी जहाँ सरकार हर नागरिक की हर साँस पर नज़र रखती है, जहाँ इतिहास को रोज़ बदला जाता है, और जहाँ “Big Brother is watching you” — बड़ा भाई तुम्हें देख रहा है। सोवियत संघ उस कल्पना के सबसे क़रीब था।

मगर ऑरवेल शायद एक बात भूल गए — बड़ा भाई कितना भी ताक़तवर हो, अगर भाई ख़ुद भूखा है, तो निगरानी ज़्यादा दिन नहीं चलती।

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FAQ

प्र. शीतयुद्ध (Cold War) को “शीत” क्यों कहते हैं?

क्योंकि अमेरिका और सोवियत संघ ने कभी सीधे एक-दूसरे से युद्ध नहीं किया। ये टकराव राजनीतिक, आर्थिक, वैचारिक और छद्म युद्धों (proxy wars) के ज़रिए लड़ा गया — वियतनाम, कोरिया, अफ़ग़ानिस्तान जैसे देशों में। “गर्म” गोलियाँ चलीं, मगर दो महाशक्तियों के बीच सीधी लड़ाई कभी नहीं हुई — इसीलिए इसे “शीत” यानी ठंडा युद्ध कहा गया।

प्र. क्या सोवियत संघ में सब कुछ बुरा था?

नहीं। सोवियत संघ ने शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, और विज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम किया। यूरी गागारिन को अंतरिक्ष में भेजना, पोलियो वैक्सीन का व्यापक वितरण, और लगभग शत-प्रतिशत साक्षरता दर — ये उपलब्धियाँ कम नहीं थीं। समस्या व्यक्तिगत स्वतंत्रता, राजनीतिक दमन, और आर्थिक अक्षमता में थी। इतिहास को “अच्छा बनाम बुरा” के सरल खाँचे में फ़िट करना ठीक नहीं — हक़ीक़त हमेशा ज़्यादा जटिल होती है।

प्र. सोवियत संघ के टूटने का भारत पर क्या प्रभाव पड़ा?

गहरा प्रभाव पड़ा। भारत और सोवियत संघ के बहुत क़रीबी सम्बन्ध थे — रक्षा उपकरण, व्यापार, और राजनीतिक समर्थन का एक बड़ा हिस्सा सोवियत संघ से आता था। 1991 में सोवियत संघ के पतन के साथ ही भारत भी आर्थिक संकट से गुज़रा, और इसी दबाव ने प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव और वित्तमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत कराई — जिसने आधुनिक भारत की आर्थिक कहानी को हमेशा के लिए बदल दिया।

इतिहास न पूरी तरह काला होता है,
न सफ़ेद —

बल्कि स्लेटी रंग के अनगिनत शेड्स में रंगा होता है।
और कभी-कभी ये आम लोगों की छोटी-छोटी हिम्मत से बनता है।

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