पति की आँखों में नींद नहीं है और वह बेचैनी से करवटें बदल रहा है। इस कारण से पत्नी को भी सोते नहीं बन रहा।
वह पति से पूछती है कि क्या प्रॉब्लम है।
पति कहता है — “मैंने पड़ोसी से पैसे उधार लिए थे। यह उधार कल सुबह चुकाना है लेकिन मेरे पास पैसे नहीं हैं।”
पत्नी पास ही रखा फोन उठाकर पड़ोसी को call करती है और कहती है — “इतनी देर रात आपको फोन करने के लिए माफी चाहती हूँ, लेकिन मेरे पति कल आपका उधार नहीं चुका पाएंगे।” फिर वह receiver नीचे रख देती है।
पति की ओर मुड़कर वह कहती है — “फिलहाल तो मैंने इस समस्या का समाधान कर दिया है। अब आप चैन से सोइए और पड़ोसी को रात भर परेशानी में करवटें बदलने दीजिए।”
इस कहानी का moral यह है कि आपको आग का सामना करने के लिए आग चाहिए — अपनी feelings को दबाकर मत रखिए।
ऐसा करने पर या तो आपको positive जवाब मिलेगा और आपका जीना आसान हो जाएगा — या फिर आपको साफ-साफ “नहीं” सुनने को मिलेगा और आप खुद को उबारकर नए सिरे से कुछ शुरू कर पाओगे।
याद रखिए — पीड़ा अवश्यंभावी है, यातना वैकल्पिक है।
(सरल भाषा में: दर्द तो होगा ही, लेकिन उसे यातना न समझना आप पर निर्भर करता है।)
वह पत्नी जानती थी एक बात जो अधिकांश लोग नहीं जानते —
जो बोझ आप रात भर अकेले उठाते रहते हैं, वह किसी और के साथ बाँटने से आधा हो जाता है। और कभी-कभी पूरा ही ट्रांसफर हो जाता है।
छुपाने की कीमत बहुत महँगी होती है। हम सोचते हैं कि अपनी तकलीफ अपने तक रखना “मज़बूती” है। असल में वह एक slow poison है जो रात-दर-रात, करवट-दर-करवट, हमें खोखला करता रहता है।
अमेरिकी researcher ब्रेनी ब्राउन (Brené Brown) ने 20 साल तक लोगों के interviews किए — यह समझने के लिए कि कुछ लोग दूसरों से ज़्यादा connected और खुश क्यों रहते हैं।
उनका निष्कर्ष चौंकाने वाला था।
जो लोग सबसे ज़्यादा खुश थे — वे सबसे ज़्यादा vulnerable थे। वे अपनी परेशानियाँ, अपनी ज़रूरतें, अपना डर — सामने रख देते थे। छुपाते नहीं थे।
Brown ने इसे “the power of vulnerability” कहा।
उस पत्नी ने यही किया। उसने vulnerability को weapon बनाया। रात 11 बजे phone उठाया और कहा — “हम नहीं चुका पाएंगे।”
यह कमज़ोरी नहीं थी। यह सबसे बड़ी ताकत थी।
उर्दू की महान कहानीकार इस्मत चुगताई (Ismat Chughtai) की कहानियों में हमेशा कोई-न-कोई औरत होती थी जो वह बात कह देती थी जो “कहनी नहीं चाहिए थी।”
उनके समय में उन पर अश्लीलता के मुकदमे चले — इसीलिए कि उन्होंने वह लिखा जो सब सोचते थे लेकिन कोई नहीं कहता था।
इस्मत ने एक बार कहा था — “जो बात मन में हो उसे कागज़ पर नहीं उतारोगी तो वह तुम्हारे अंदर सड़ती रहेगी।”
वह सड़न — यही है जो उस पति की नींद उड़ा रही थी। और वह पत्नी — इस्मत की किसी कहानी की नायिका की तरह — जानती थी कि सड़न का इलाज सड़न को बाहर निकालना है।
2020 की हिंदी फिल्म “थप्पड़” (Thappad) में तापसी पन्नू का किरदार अमृता एक थप्पड़ के बाद वह सब कह देती है जो वर्षों से दबा था।
पूरी फिल्म में सबसे बड़ा drama यही है — कि उसने बोल दिया।
परिवार चाहता था वह चुप रहे। समाज चाहता था वह “adjust” करे। लेकिन उसने phone उठाया — metaphorically — और कहा: “यह नहीं चलेगा।”
उसके बाद जो हुआ वह दर्दनाक था। लेकिन वह नींद से जाग गई थी।
असली नींद तो चुप रहने में थी।
तो अगली बार जब रात को नींद न आए —
किसी बात को लेकर। किसी रिश्ते को लेकर। किसी काम को लेकर। किसी उधार को लेकर।
फोन उठाइए।
कहिए।
पड़ोसी को रात भर करवटें बदलने दीजिए।





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