जीवन में सफलता, समृद्धि, संतुष्टि और शांति स्थापित करने के मंत्र और ज्ञान-विज्ञान की जानकारी

सत्य का धरातल

एक बार किसी आदमी को यह लगने लगा कि सामान्य जीवन में परिपूर्णता नहीं है और उसे सत्य की प्राप्ति करनी चाहिए. उसने ज्ञानी गुरु की खोज करना शुरू कर दिया. उसने बहुत से ग्रन्थ पढ़े, कई मठों में प्रवेश लिया, एक गुरु से दूसरे गुरु तक वह ज्ञान के शब्द सुनने के लिए भटकता रहा. उसने साधना और उपासना की वे पद्धतियाँ ही चुनीं जो उसे आकर्षक और सरल जान पडीं.

उसे कुछ आध्यांत्मिक अनुभव हुआ जिसने उसे भ्रमित कर दिया. अब वह जानना चाहता था कि वह आत्मज्ञान के मार्ग पर कितनी दूर आ गया है और उसकी साधना कब पूरी होगी.

अपने मन में ये विचार उमड़ते-घुमड़ते लिए हुए वह एक दिन परमज्ञानी माने जाने वाले गुरु के आश्रम तक चला आया. आश्रम के उद्यान में उसका सामना हज़रत खिद्र से हो गया. (हज़रत खिद्र लोगों को सत्य के मार्ग पर अग्रसर करनेवाले रहस्यमय गुरु हैं).

खिद्र उस आदमी को एक जगह ले गए जहाँ बहुत से लोग दुःख और पीड़ा में थे. खिद्र ने उन व्यक्तियों से पूछा कि वे कौन हैं. उन्होंने जवाब दिया – “हम वे साधक हैं जिन्होंने वास्तविक शिक्षाओं को ग्रहण नहीं किया. हम वे हैं जिन्होंने मिथ्या गुरु-ज्ञानियों पर आस्था लुटाई.”

फिर खिद्र आदमी को उस जगह पर ले गए जहाँ सभी प्रसन्नचित्त और सुखी प्रतीत हो रहे थे. उनसे भी खिद्र ने वही सवाल किया. वे बोले – “हम वे साधक हैं जिन्होंने सत्य के मार्ग को दर्शानेवाले चिह्नों का अनुसरण नहीं किया.”

“यदि तुम लोगों ने सत्य की ओर ले जाने वाले मार्गदर्शक चिह्नों का अनुसरण नहीं किया तो तुम आनंदमय क्यों कर हो?” – खिद्र ने उनसे पूछा.

“क्योंकि हमने सत्य के स्थान पर प्रसन्नता का चुनाव किया” – वे व्यक्ति बोले – “जिस प्रकार मिथ्या गुरु-ज्ञानियों में आस्था रखनेवालों ने दुःख का चुनाव किया था.”

“तो क्या सुख का आदर्श मनुष्य के लिए त्याज्य है?” – आदमी ने पूछा.

उन्होंने कहा – “मनुष्य का उद्देश्य सत्य की प्राप्ति है. सत्य के सामने सुख का मूल्य कुछ भी नहीं है. जिस व्यक्ति को सत्य मिल गया हो उसके लिए किसी मनोदशा का कोई महत्व नहीं है. हम सबने सत्य को ही सुख और सुख को ही सत्य मान लिया था और सभी ने हमपर विश्वास किया जिस प्रकार तुम भी अब तक यही मानते आये हो कि सत्य की अनुभूति परमसुख और आनंद की प्राप्ति से होती होगी. लेकिन सुख हो या दुःख, आनंद हो या पीड़ा, ये सभी अनुभूतियाँ ही हैं और तुम्हें बाँधकर ही रखतीं हैं.”

सहसा उस आदमी ने स्वयं को उद्यान में खिद्र के साथ खड़ा पाया.

खिद्र ने उससे कहा – “मैं तुम्हारी एक इच्छा पूरी कर सकता हूँ. मांगो, क्या मांगते हो.”

“मैं यह जानना चाहता हूँ कि मैं पथभ्रष्ट क्यों हो गया और मुझे सफलता कब मिलगी” – आदमी ने कहा.

खिद्र बोले – “तुमने अपना पूरा जीवन व्यर्थ कर दिया क्योंकि तुम झूठा जीवन जीते आये हो. सत्य को खोजने के स्थान पर तुम केवल अपनी इच्छाओं को ही इस झूठ के जरिये पूरा करते आये हो.”

“फिर भी मैं उस अवस्था तक पहुँच गया कि आप मुझे मिल गए” – आदमी ने कहा – “ऐसा तो शायद ही किसी और के साथ हुआ होगा!?”

“हाँ, तुम मुझे मिल गए क्योंकि तुम्हारे भीतर केवल सत्य के लिए ही सत्य को पाने की चाह थी, भले ही वह कभी एक क्षण के लिए ही रही हो. उस लेश मात्र ईमानदारी के कारण ही मैं तुम्हें दर्शन देने को बाध्य हो गया.” – खिद्र ने कहा.

इतना कुछ देख लेने के बाद अब आदमी के भीतर खुद को खो देने की कीमत पर भी सत्य को पाने की उत्कंठा तीव्र हो गयी.

खिद्र अपनी राह चल पड़े थे लेकिन आदमी भी उनके पीछे चल दिया.

“मेरे पीछे मत आओ” – खिद्र ने कहा – “क्योंकि मैं सामान्य जगत में प्रवेश करने जा रहा हूँ जो असत्य का राज्य है. मुझे वहीं होना चाहिए क्योंकि मुझे अभी बहुत काम करना बाकी है”

उस क्षण जब आदमी ने अपने चारों ओर देखा तो यह पाया कि वह खिद्र के साथ उद्यान में नहीं वरन सत्य के धरातल पर खड़ा था.

(इदरीस शाह की कहानी) (image credit)


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5 responses to “सत्य का धरातल”

  1. कमल वलेर अवतार
    कमल वलेर

    इंतजार के हर मोड़ पर हम चलते रहे,
    ना कभी रुके, बस यूं ही हम चलते रहे |
    जहां से छोड़ा था तुमने हमको, उसी
    डगर से हम तुम्हें ढूंढने यूंही चलते
    रहे |
    आह भी दिल से निकली तो सहते रहे,
    तुम ही हो जिनके लिएं हम चलते रहे |
    सत्य के माँग पर अकेले हि सहि पर अकेले हि हम चलते रहे

  2. Ashish अवतार

    Kya baat hai!!
    Ek hi imaandaar koshish.

  3. सुज्ञ अवतार

    सत्य और सुख प्रलोभन एक दूसरे के विपरित है।

  4. Ranjana अवतार

    शिक्षाप्रद, बहुत बहुत सुन्दर..

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