एक बार दो यात्री मरुस्थल में खो गए। भूख और प्यास के मारे उनकी जान निकली जा रही थी। एक स्थान पर उनको एक ऊँची दीवार दिखी। दीवार के पीछे उन्हें पानी के बहने और चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई दे रही थी। दीवार के ऊपर पेड़ों की डालियाँ झूल रही थीं। डालियों पर पके मीठे फल लगे थे।
उनमें से एक किसी तरह दीवार के ऊपर चढ़ गया और दूसरी तरफ़ कूदकर गायब हो गया।
दूसरा यात्री मरुस्थल की ओर लौट चला — ताकि दूसरे भटके हुए यात्रियों को उस जगह तक ला सके।
दो रास्ते — दोनों सही, दोनों अलग
यह कहानी किसी को दोषी नहीं ठहराती। पहला यात्री गलत नहीं था — उसने मुक्ति पाई, जो उसका अधिकार था। दूसरा यात्री भी गलत नहीं था — उसने करुणा चुनी, जो उसका स्वभाव था।
लेकिन कहानी यह ज़रूर पूछती है — जब तुम्हें मुक्ति मिले, तो तुम क्या करते हो?
बौद्ध दर्शन में इस प्रश्न का उत्तर दो अलग-अलग आदर्शों में मिलता है — “अर्हत” और “बोधिसत्व।”
अर्हत वह है जो अपनी मुक्ति पा लेता है और निर्वाण में लीन हो जाता है।
बोधिसत्व वह है जो निर्वाण के द्वार पर खड़ा होकर वापस लौट आता है — क्योंकि जब तक एक भी प्राणी दुख में है, उसे चैन नहीं।
दूसरा यात्री बोधिसत्व था।
बोधिसत्व की करुणा — दीवार के दरवाज़े पर वापसी
बौद्ध परम्परा में अवलोकितेश्वर (जापान में “कन्नन”, चीन में “गुआनयिन”) वह देवता हैं जो ज्ञान की पराकाष्ठा पर पहुँचकर भी संसार में रहते हैं — क्योंकि उन्होंने प्रतिज्ञा की है कि जब तक सब प्राणी मुक्त नहीं होते, वे मुक्त नहीं होंगे।
“अवलोकितेश्वर” का अर्थ ही है — “वह जो संसार की पुकार सुनता है।”
दूसरे यात्री ने भूख और प्यास से तड़पते हुए भी यही किया — उसने संसार की पुकार सुनी।
प्रोमेथियस — जिसने आग चुराई इंसानों के लिए
ग्रीक पुराणों में प्रोमेथियस की कहानी है — जो देवताओं के लोक से आग चुराकर मनुष्यों को दे आया। इसके लिए उसे अनन्तकाल तक एक चट्टान से बाँधकर यातना दी गई।
प्रोमेथियस के पास दो रास्ते थे — देवलोक में सुखी रहे, या मनुष्यों के लिए कष्ट उठाए।
उसने दूसरा चुना।
यही दूसरे यात्री का चुनाव था — मरुस्थल की तपती रेत में वापस जाना, जबकि दीवार के पार ठंडा पानी और मीठे फल उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे।
श्रेयस और प्रेयस — उपनिषद का सबसे बड़ा प्रश्न
कठोपनिषद में यमराज नचिकेता को दो रास्ते दिखाते हैं —
प्रेयस — जो अच्छा लगता है, जो सुखद है, जो तुरन्त राहत देता है।
श्रेयस — जो कल्याणकारी है, जो कठिन है, जो दूसरों के लिए है।
यमराज कहते हैं — “बुद्धिमान श्रेयस चुनते हैं। मूर्ख प्रेयस।”
पहले यात्री ने प्रेयस चुना। दूसरे ने श्रेयस।
नेल्सन मंडेला — 27 साल बाद भी वापसी
नेल्सन मंडेला 27 साल जेल में रहे। जब 1990 में रिहा हुए तो वे चाहते तो अपने परिवार के पास जाते, आराम करते, अपनी बची हुई ज़िंदगी शान्ति से जीते।
लेकिन वे मरुस्थल में वापस गए।
उन्होंने रंगभेद के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा, दक्षिण अफ्रीका के पहले लोकतान्त्रिक राष्ट्रपति बने, और अपने जीवन के अन्तिम दिन तक दूसरों के लिए लड़ते रहे।
उनका प्रसिद्ध वाक्य था — “अगर तुम्हारे पास कोई विज़न नहीं है, तो तुम एक दिन और जीते हो। अगर विज़न है, तो तुम एक कारण के लिए जीते हो।”
दूसरे यात्री का विज़न था — उन लोगों तक वापस जाना जो अभी भी भटक रहे हैं।
फिल्म “Schindler’s List” — एक आदमी की वापसी
Steven Spielberg की महान फिल्म “Schindler’s List” (1993) में Oskar Schindler एक जर्मन व्यापारी है जो Holocaust के दौरान अपने यहूदी कामगारों को बचाने के लिए अपनी पूरी सम्पत्ति लगा देता है।
फिल्म के अन्त में, जब युद्ध खत्म होता है और वह सुरक्षित है, वह रोते हुए कहता है — “मैं और बचा सकता था। यह कार — यह कार दस लोगों की जान थी। यह बैज — एक और जान।”
दीवार के पार जाने के बाद भी वह मरुस्थल को नहीं भूल सका। यही उसकी महानता थी।
माँ तेरेसा — जीवनभर मरुस्थल में
माँ तेरेसा के पास दुनिया की कोई भी सुख-सुविधा हो सकती थी। लेकिन उन्होंने कलकत्ता की सबसे गन्दी गलियाँ चुनीं — मरते हुए लोगों की सेवा के लिए।
उन्होंने कहा था — “मैं कुछ बड़ा नहीं करती। छोटे-छोटे काम बड़े प्यार से करती हूँ।”
वे जीवनभर मरुस्थल में रहीं — ताकि दूसरे उस दीवार तक पहुँच सकें।
मरुस्थल में लौटना — सबसे कठिन और सबसे बड़ा काम
यह कहानी हमें एक असुविधाजनक सत्य के सामने खड़ा करती है —
जब हम सफल होते हैं, जब हमें कुछ मिलता है, जब हम किसी मुश्किल से निकलते हैं — तब हमारे सामने दो रास्ते होते हैं।
पहला — दीवार के पार आराम से बैठ जाएँ।
दूसरा — वापस जाएँ और किसी और का हाथ थामें।
पहला रास्ता आसान है। दूसरा रास्ता मानवीय है।
और इतिहास में जो लोग अमर हुए — वे सब दूसरे रास्ते पर चले।
तुम कौन से यात्री हो?





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