Arya Magga


अपने गुरु चाणक्य के कुशल मार्गदर्शन में चन्द्रगुप्त मौर्य ने नंद वंश के अंतिम सम्राट घननंद को पराजित कर दिया और मगध का सम्राट बन गया. युद्ध में नंद राज्य के मंत्री और सेनापति या तो मारे गए या बंदी बना लिए गए परन्तु प्रधान अमात्य राक्षस उनके हाथ नहीं आया. अपने स्वामी घननंद के प्रति सेवकभाव रखते हुए वह किसी दूर प्रदेश में जाकर चन्द्रगुप्त मौर्य के विरुद्ध षडयंत्र करने लगा. राक्षस बहुत ही कुशल और योग्य प्रशासक था. उसी के बल पर मगध एक शक्तिशाली राज्य बन चुका था.

चाणक्य जब अपनी कूटनीति और सैनिकबल से राक्षस को पकड़ने में असफल हो गए तो उन्होंने राक्षस के परममित्र सेठ चंदनदास को मृत्युदंड देने की घोषणा कर दी. इस घोषणा को सुनकर राक्षस से रहा नहीं गया और वह उसके प्राण बचने के लिए वधस्थल पर जा पहुंचा और आत्मसमर्पण करके अपने मित्र चंदनदास को मुक्त करने की याचना की.

राक्षस के आने का समाचार सुनकर चन्द्रगुप्त और चाणक्य वहां पहुँच गए. राक्षस ने उनके सामने भी अपना अनुरोध दुहराया.

राक्षस का बुद्धिकौशल, उसकी नीतिकुशलता, प्रशासकीय योग्यता और कूटनीतिक चातुर्य का चाणक्य भी लोहा मानते थे. उन्होंने राक्षस से विनम्रतापूर्वक कहा – “अमात्य, हमारी दृष्टि में आपने मगध राज्य के विरुद्ध षडयंत्र किये हैं पर हम आप जैसे योग्य मंत्री को खोना नहीं चाहते. मगध राज्य की उन्नति के लिए जिस कर्मठता और सेवाभाव से आपने अनीतिक और क्रूर शासक घननंद के लिए कार्य किये हैं उसी प्रकार यदि आप सुयोग्य और नीतिपरक चन्द्रगुप्त के लिए प्रधान अमात्य का पद स्वीकार कर लें तो आपके मित्र के प्राण बच सकते हैं.

अपने मित्र के प्राण की रक्षा के लिए राक्षस के सम्मुख और कोई उपाय नहीं था. मगध राज्य के हित के लिए भी उसे चाणक्य का अनुरोध स्वीकार करना पड़ा. राक्षस द्वारा पद संभालने के बाद चन्द्रगुप्त मौर्य को अपने विराट साम्राज्य में कुशल प्रशासन की स्थापना में कोई कठिनाई नहीं आई.

(A story/anecdote about Chanakya – in Hindi)


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6 responses to “योग्य शत्रु का सम्मान”

  1. हां, यह ज्ञात था और इसके कारण राक्षस, कौटिल्य और चन्द्रगुप्त – तीनो के प्रति श्रद्धा उमड़ती है।

  2. बहुत सुन्दर बोध कथा। आभार।
    ——-

  3. अभी साल भर पहले ही मैंने चाणक्य सीरियल को पुन: देखा डीवीडी पे. इसको पढ़ के मुझे वो सीन याद आ गया. अमात्य राक्षस की भूमिका में सुरेन्द्र पाल (महाभारत के गुरु द्रोण) खूब जंचे हैं. आपका आभार.. इस कथा को प्रस्तुत करने के लिए.

    राक्षस के परममित्र सेठ चंदनदास ने उनके परिवार की रक्षा की थी, जब युद्घ में परास्त होने के बाद वो छिपे हुए थे. ख़ास बात ये भी है, कि उन्होंने अपने मित्र की रक्षा के लिए, अपनी जान और मगध के प्रति अपनी आस्था की परवाह किये बगैर वो उन्हें बचाने आ गए.

    ये सीन इस धारावाहिक का अंतिम सीन भी है.

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