यह आपका कल था। और आज भी यही होगा।
सुबह के 6 बज रहे हैं।
आपने रात को यह तय किया था कि आप 5 बजे उठोगे लेकिन सोते-सोते आपने अलार्म 5 के बजाय 6 बजे के लिए सेट कर दिया क्योंकि आपको अपने आप पर भरोसा नहीं था। खैर…
अलार्म बजने लगता है और आप इसे नींद में ही स्नूज़ कर देते हैं।
दस मिनट बाद यह फिर बजने लगता है और आप इसे दोबारा स्नूज़ कर देते हैं। आप इसे लगभग 3-4 बार स्नूज़ करते हैं और लगभग 7 बजे अनमने-से बिस्तर से उठ जाते हैं।
ब्रश करने के बाद आप अपने फ़ोन के notifications चेक करते हैं और घड़ी 7.30 बजा देती है। आप झटपट नहाने के बाद जल्दबाज़ी में अपना breakfast करते हैं।
ऑफिस जल्दी पहुँचने के लिए आपने कई red lights जंप कर दीं। आप रोज़ की तरह ऑफिस लेट ही पहुँचे। वहाँ पहुँचते ही आपने काम इस तरह से करना शुरू किया जैसे कि आप ही सबसे ज़्यादा busy व्यक्ति हैं।
काम करते-करते 30 मिनट हो जाने के बाद आपको लगने लगता है कि यह दिन भी हर दिन की तरह है और आप फ़ोन निकालकर Facebook खोलते हैं। आप ऊपर-नीचे scroll करते जाते हैं और बीच-बीच में अपना काम भी देखते जाते हैं।
इस सबमें कब lunch break हो जाता है पता ही नहीं चलता। आप अपना lunch जल्दी finish कर देते हैं क्योंकि आपको किसी client से और अपने superior से मिलना है।
आपको लगता है कि आप किसी एक से ही मिल पाएंगे। ऐसे में आप client को फ़ोन करके कह देते हैं कि आप busy हैं और आज उससे नहीं मिल सकते। आपने उसे यह कहा कि आप वह काम कर रहे हैं जो आप असल में 3 दिन बाद करेंगे।
इस बीच आप अपने manager से मिले। वह भी आपकी तरह ही लेट आया।
चूँकि आप अपना time waste नहीं करना चाहते इसलिए आप अपने WhatsApp में लग गए।
कुछ काम, कुछ social media, कुछ web browsing — यही सब करते-करते शाम के 7 बज जाते हैं। अब घर जाने का वक्त है और आप अपनी bike या car start करके निकल पड़ते हैं।
Traffic में आधा-एक घंटा खपने के बाद घर पहुँचते हैं। TV देखते वक्त खाना खाते हैं। देर रात तक TV देखते हैं।
सोने जाते हैं लेकिन फ़ोन पर कुछ-न-कुछ चेक करते रहते हैं। ठीक से सो नहीं पाते। आधी रात फिर फ़ोन देखने लगते हैं। रात-बेरात kitchen में पहुँचकर कुछ खा लेते हैं। फिर सोकर सुबह उनींदे उठते हैं।
यह चक्र रोज़ चलता है।
यह 10 में से 8 लोगों की ज़िंदगी का सच है। यह हर average व्यक्ति की ज़िंदगी है।
तो क्या बाकी के 2 लोग उनसे बेहतर ज़िंदगी जी रहे हैं? क्या वे किसी कंपनी के CEO या MD हैं? क्या वे दूसरों से ज़्यादा काम करते हैं?
वे 2 व्यक्ति भी हमारी तरह ही हैं। लेकिन वे कुछ और भी करते हैं। और जो कुछ भी वे हमसे अलग करते हैं उससे वे above average नहीं बनते बल्कि smart या genius बन जाते हैं।
अलार्म बजने से पहले जाग जाइए। कुछ yoga-shoga कीजिए। यदि official काम में excellence लाने और Instagram में photos चेक करने के बीच चुनाव करना हो तो वह चुनिए जो आपकी जगह कोई genius व्यक्ति चुनेगा।
जो कुछ भी करना आपके लिए ज़रूरी है उसे आपको करने देने से रोकने वाली कोई महीन tendency, कोई छोटा-सा लालच आपको average ज़िंदगी जीने पर मजबूर कर रहा है।
जीनियस आपके भीतर का वह fighter है जो आपको average नहीं होने देता।
तो, average नहीं बनने के लिए आपको क्या करना होगा?
अपने भीतर के fighter को जगाइए। Fighter बनिए। Genius बनिए।
यहाँ एक पल रुकिए
अभी — जब आप यह पढ़ रहे हैं — आपके फ़ोन में कितने unread notifications हैं?
उन्हें चेक मत कीजिए। बस उनके होने का एहसास करिए।
वे वहाँ हैं — और आप जानते हैं कि वे आपका इंतज़ार कर रहे हैं।
यही वह “महीन लालच” है।
उनका खिंचाव इतना धीमा और इतना लगातार है कि आप उसे gravity की तरह भूल जाते हैं। लेकिन gravity भी एक बल है — और वह हर पल आपको नीचे खींचती रहती है।
वह 40% जहाँ असली ज़िंदगी है
डेविड गॉगिन्स (David Goggins) — अमेरिकी Navy SEAL, ultra-marathon runner और लेखक। बचपन में गरीबी, घरेलू हिंसा। 24 साल की उम्र में 130 किलो वज़न, तिलचट्टे मारने की नौकरी।
एक दिन आईने में खुद को देखा। कुछ कहा नहीं। बस देखा।
फिर दौड़ना शुरू किया। हर सुबह। तब जब पूरा शहर सो रहा होता था।
उनकी किताब “कैन्ट हर्ट मी” (Can’t Hurt Me) में वे लिखते हैं — “ज़्यादातर लोग अपनी 40% क्षमता पर जीते हैं। बाकी 60% वह जगह है जहाँ असली ज़िंदगी होती है।”
वह average day जो ऊपर लिखी है — वह 40% की ज़िंदगी है। बाकी 60% आपके भीतर बंद पड़ी है — हर सुबह के स्नूज़ के पीछे, हर scroll के नीचे।
करणम मल्लेश्वरी — 4 बजे की वह नींद जो नहीं ली
करणम मल्लेश्वरी (Karnam Malleswari) आंध्रप्रदेश के एक छोटे से गाँव की लड़की थीं। Weightlifting के लिए न infrastructure था, न बड़ी coaching, न सुविधाएँ।
वे हर सुबह 4 बजे उठकर practice करती थीं — तब जब गाँव में बिजली भी ठीक से नहीं आती थी।
Sydney Olympics 2000 में उन्होंने bronze medal जीता। भारत की पहली महिला Olympic medalist बनीं।
उनकी सुबह 4 बजे की उस नींद ने — जो उन्होंने नहीं ली — वह medal गढ़ा था।
Average आदमी उस नींद को “ज़रूरी आराम” कहता। मल्लेश्वरी ने उसे “चुनाव” कहा।
चक दे! इंडिया — विरोधी टीम अभी सो रही है
“चक दे! इंडिया” (Chak De! India) में कोच कबीर खान (शाहरुख खान) लड़कियों को सुबह 5 बजे मैदान में बुलाता है।
कोई नहीं आना चाहता। सब थकी हुई हैं। “क्यों?” का सवाल हवा में है।
कबीर खान का जवाब है — “क्योंकि विरोधी टीम अभी सो रही है।”
यह motivational poster की बात नहीं है। यह arithmetic है।
जब बाकी सब scroll कर रहे हों, snooze कर रहे हों, traffic में अटके हों — तब जो एक घंटा आप अपने काम को देते हैं, वह compound होता रहता है। हर दिन। हर हफ्ते। हर साल।
भीतर का fighter
जीनियस कोई अलग प्रजाति नहीं है।
जीनियस वह है जो उस महीन लालच को — रोज़ — एक बार नकार देता है। सिर्फ एक बार। हर दिन।
ये बड़े काम नहीं हैं। ये बड़ी जीत नहीं हैं।
लेकिन ये आपकी हैं।
और इन्हीं छोटी जीतों से वह fighter बनता है — जो आपको average नहीं होने देता।
कल सुबह अलार्म बजे — उससे एक मिनट पहले जागिए।
बस एक मिनट पहले।
देखिए क्या होता है।





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