26 अप्रैल, 2009। San Francisco में एक कार्यक्रम।
परमपावन दलाई लामा स्वयं आगंतुकों को भोजन परोस रहे थे।
एक सज्जन ने भोजन की थाली लेते हुए उनसे कहा —
“परमपूज्य, मुझ पर कृपा करें। मैं बेघर हूँ।”
दलाई लामा ने कहा —
“मैं भी।”
दो शब्द — जिनमें पचास साल का दर्द था
1959 में, जब दलाई लामा की उम्र केवल 23 वर्ष थी — वे तिब्बत से निकलने पर मजबूर हुए।
रात के अँधेरे में। भेष बदलकर। हिमालय पार करके।
तब से — 60 से अधिक वर्षों तक — वे Dharamshala में रहे हैं। भारत की मेहमाननवाज़ी में। लेकिन अपने घर से दूर।
उस San Francisco में जब उन्होंने कहा — “मैं भी” — यह केवल सहानुभूति नहीं थी।
यह सच था। शाब्दिक सच।
और इसीलिए वह वाक्य इतना गहरा उतरता है — क्योंकि वह झूठ नहीं था।
निर्वासन — जो आत्मा को तोड़ता है, या निखारता है
फिलिस्तीनी-अमेरिकी विद्वान Edward Said — जो खुद जीवनभर निर्वासन में रहे — ने लिखा था —
“निर्वासन एक अजीब विशेषाधिकार है। यह तुम्हें दुनिया को उन लोगों की तरह देखने देता है जो बाहर से आते हैं — और इसीलिए वे वह देख पाते हैं जो अंदर वाले नहीं देख सकते।”
दलाई लामा ने निर्वासन को विशेषाधिकार में बदल दिया।
वे तिब्बत में होते तो शायद केवल तिब्बत के होते। निर्वासन ने उन्हें सारी दुनिया का बना दिया।
घर खोने से कभी-कभी एक बड़ा घर मिलता है।
Ovid — जिसने निर्वासन में सबसे अमर कविता लिखी
रोमन कवि Ovid को सम्राट Augustus ने 8 AD में Black Sea के किनारे एक सुदूर नगर में निर्वासित कर दिया।
वे रोम से — अपनी भाषा, अपने मित्रों, अपनी सभ्यता से — कट गए।
वहीं उन्होंने लिखा — “Tristia” — दुखों की कविताएँ। और “Epistulae ex Ponto” — समुद्र के पार से चिट्ठियाँ।
वे कभी वापस नहीं लौटे। लेकिन उनकी कविताएँ 2000 साल बाद भी पढ़ी जाती हैं।
Ovid का शरीर निर्वासित था — उनकी आत्मा कभी नहीं।
Jiddu Krishnamurti — जिन्होंने घर की परिभाषा ही बदल दी
भारतीय दार्शनिक Jiddu Krishnamurti ने अपना पूरा जीवन यात्रा में बिताया — Ojai, London, Madras, Brockwood Park। कहीं स्थायी घर नहीं।
किसी ने एक बार उनसे पूछा — “आपका घर कहाँ है?”
उन्होंने कहा — “जहाँ मैं हूँ — वहाँ।”
यही दलाई लामा का उत्तर था उस बेघर सज्जन को — अलग शब्दों में।
“मैं भी बेघर हूँ — और फिर भी, जहाँ हूँ, वहीं घर है।”
Hannah Arendt — बेघर होना एक राजनीतिक सच्चाई है
जर्मन-यहूदी दार्शनिक Hannah Arendt स्वयं Nazi Germany से भागी थीं। वे जानती थीं कि बेघर होना केवल व्यक्तिगत दुर्भाग्य नहीं — यह एक राजनीतिक स्थिति है।
उन्होंने लिखा था — “जब कोई अपना देश खो देता है, तो वह केवल एक जगह नहीं खोता — वह एक पूरी दुनिया खो देता है।”
दलाई लामा ने वह दुनिया खोई। लेकिन उन्होंने जो पाया — करुणा, उपस्थिति, वह “मैं भी” कह पाने की क्षमता — वह शायद तभी संभव हुआ।
फिल्म “The Terminal” — जब हवाई अड्डा ही घर बन गया
“The Terminal” (2004) में Tom Hanks का किरदार Viktor Navorski — एक ऐसा इंसान जो न किसी देश का है, न किसी का नहीं।
वह JFK airport में महीनों रहता है। वहीं खाता है, सोता है, दोस्त बनाता है।
और धीरे-धीरे — वह हवाई अड्डा उसका घर बन जाता है।
फिल्म का सबसे सुंदर क्षण वह है जब Viktor किसी से कहता है — “मैं यहाँ से हूँ।” — और वह सच होता है।
घर वह नहीं जहाँ तुम पैदा हुए। घर वह है जहाँ तुम उपस्थित हो।
करुणा का व्याकरण — “मैं भी”
“मुझ पर दया करें” — यह दूरी बनाता है। “मैं तुम्हारे लिए दुखी हूँ” — यह भी दूरी है। “मैं भी” — यह दूरी मिटाता है।
दलाई लामा ने उस क्षण में सबसे बड़ा काम किया — उन्होंने उस बेघर सज्जन को अकेला नहीं रहने दिया।
सहानुभूति (Sympathy) कहती है — “तुम्हारे लिए बुरा लग रहा है।” समानुभूति (Empathy) कहती है — “मैं समझता हूँ।” लेकिन “मैं भी” — यह न sympathy है, न empathy।
यह साझेदारी है।
आज उनका जन्मदिन है
परमपावन दलाई लामा आज भी Dharamshala में हैं।
तिब्बत अभी भी दूर है।
लेकिन वे जहाँ भी जाते हैं — भोजन परोसते हैं, हँसते हैं, किसी बेघर से कहते हैं — “मैं भी।”
शायद यही घर है — वह जगह जहाँ से तुम किसी को “मैं भी” कह सको।
जन्मदिन मुबारक हो, परमपावन।




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