अपने चारों तरफ हर जगह दुख, गरीबी और बुराइयाँ देखकर एक दिन एक आदमी अपना आपा खो बैठा। आसमान की ओर देखते हुए धरती पीट-पीटकर उसने भगवान से कहा —

“देखो तुमने कैसी दुनिया बनाई है! यहाँ दुख और दर्द के सिवा कुछ नहीं है! हर तरफ खून-खराबा और नफरत है! हे ईश्वर! ऐ मेरे भगवान, तुम कुछ करते क्यों नहीं!?”

भगवान ने उसकी दर्दभरी पुकार सुन ली, और कहा —

“मैंने किया है। मैंने तुम्हें वहाँ भेजा है।”


कुछ करिए। ज़िम्मेदारी उठाइए। आपका अनिश्चय और अनिर्णय आपको कहीं नहीं ले जाएगा।


दो शब्द — जो सारी शिकायत का जवाब हैं

उस आदमी की शिकायत में कोई झूठ नहीं था।

दुनिया में दुख है। गरीबी है। नफरत है। यह सच है।

लेकिन भगवान के उत्तर ने प्रश्न को ही पलट दिया।

“तुम कुछ करते क्यों नहीं?” — यह प्रश्न ऊपर नहीं, नीचे की ओर था। खुद की ओर।

जब तक हम दुनिया की समस्याओं के लिए किसी और को — ईश्वर को, सरकार को, समाज को, किस्मत को — ज़िम्मेदार ठहराते रहते हैं, तब तक हम उस आदमी की तरह हैं जो धरती पीटता है और आसमान देखता है।

जवाब आसमान में नहीं है। जवाब उस दर्पण में है जो सुबह सामने होता है।


गांधी — “वह बदलाव बनो”

महात्मा गांधी का वह प्रसिद्ध वाक्य इसी कहानी का विस्तार है —

“वह बदलाव बनो जो तुम दुनिया में देखना चाहते हो।”

गांधी ने यह नहीं कहा — “बदलाव की माँग करो।” उन्होंने कहा — “बदलाव बनो।”

यह एक छोटा-सा फर्क नहीं है। यह पूरी ज़िम्मेदारी का स्थानांतरण है — भगवान से, सरकार से, दूसरों से — खुद तक।

गांधी ने नमक बनाया। खद्दर बुना। उपवास किया। उन्होंने शिकायत नहीं, उत्तर बनाना चुना।


Viktor Frankl — जब बदलने के लिए कुछ नहीं बचा

Viktor Frankl एक यहूदी मनोचिकित्सक थे जो Nazi concentration camps में बंद रहे। उन्होंने वह सब देखा जो कोई नहीं देखना चाहता।

लेकिन उनकी पुस्तक “Man’s Search for Meaning” में वे लिखते हैं —

“जब हम किसी परिस्थिति को बदल नहीं सकते, तो हमें खुद को बदलना पड़ता है।”

और उन्होंने यह भी लिखा — “हर परिस्थिति में मनुष्य के पास एक स्वतंत्रता बचती है — अपनी प्रतिक्रिया चुनने की।”

वह आदमी जो भगवान से शिकायत कर रहा था — उसके पास भी यही स्वतंत्रता थी।

शिकायत करना एक चुनाव है। कुछ करना भी एक चुनाव है।


भगवद्गीता — “योद्धा बनकर खड़े हो”

भगवद्गीता में अर्जुन ने भी यही किया — धनुष रख दिया और पूछने लगे — “यह युद्ध क्यों? यह विनाश क्यों?”

कृष्ण ने उसे ब्रह्मांड का दर्शन नहीं दिया। उन्होंने कहा — “उठो। अपना कर्म करो।”

“कर्म करो, फल की चिंता मत करो।” — यह निष्क्रियता का निमंत्रण नहीं है। यह सबसे सक्रिय जीवन-दर्शन है।

भगवान का वह जवाब — “मैंने तुम्हें वहाँ भेजा है” — गीता का ही दूसरा रूप है।


Elie Wiesel — “तटस्थता सबसे बड़ा पाप है”

Holocaust survivor और Nobel Prize विजेता Elie Wiesel ने कहा था —

“तटस्थता — अन्याय के सामने चुप रह जाना — पीड़ित का नहीं, अपराधी का साथ देना है।”

जो आदमी केवल शिकायत करता है, कुछ करता नहीं — वह तटस्थ है।

और Wiesel के अनुसार तटस्थता कोई मध्यमार्ग नहीं — वह भी एक चुनाव है। गलत चुनाव।

जब हम कहते हैं “मैं क्या कर सकता हूँ?” — तो हम उत्तर की तलाश नहीं कर रहे। हम ज़िम्मेदारी से बच रहे हैं।


Mother Teresa — एक-एक करके

किसी ने एक बार Mother Teresa से पूछा — “दुनिया में इतनी गरीबी है, आप एक-एक व्यक्ति की मदद करके क्या बदल सकती हैं?”

उन्होंने कहा — “मैं दुनिया नहीं बदल सकती। लेकिन जो मेरे सामने है, उसे बदल सकती हूँ।”

और उन्होंने यही किया। एक-एक व्यक्ति। एक-एक दिन।

भगवान ने उस आदमी को “दुनिया” नहीं बदलने भेजा था। उसके सामने जो था — उसे बदलने भेजा था।


फिल्म “Rang De Basanti” — जब शिकायत काफी नहीं रहती

“Rang De Basanti” (2006) में कुछ युवा हैं जो पहले केवल व्यवस्था की आलोचना करते हैं। “यह देश बेकार है। यहाँ कुछ नहीं होता।”

और फिर एक दिन — एक घटना — और वे तय करते हैं कि शिकायत काफी नहीं।

फिल्म का वह संवाद आज भी गूँजता है — “कोई भी देश परफेक्ट नहीं होता। उसे परफेक्ट बनाना पड़ता है।”

वही भगवान का जवाब है — “मैंने तुम्हें वहाँ भेजा है।”


आज — एक काम

शिकायत की सूची लंबी है। हमेशा रहेगी।

लेकिन आज — एक काम।

किसी की मदद। एक सच बोलना जो कहना मुश्किल हो। एक छोटी ज़िम्मेदारी जो उठाना असुविधाजनक हो।

बस एक।

भगवान ने तुम्हें यहाँ भेजा है — देखने के लिए नहीं, करने के लिए।



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8 responses to “मैंने तुम्हें वहाँ भेजा है”

  1. इस शानदार और प्रेरक रचना के लिए आभार।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

  2. मैंने तुम्‍हें वहां भेजा है। वाह । इस बिंदु को बहुत से युवा समझ नहीं पाते। कई बार मैं भी झल्‍ला उठता हूं। बाद में सोचता हूं तो यही पाता हूं।

  3. सुंदर. बहुत सुंदर.

  4. Hum to karne ke liye tyar hai lelkin humari madad ke liye kada ho ek se to is zhuti bhari duniya mai khuch nahi hone wala .

  5. app likhte kiske liye hai?

    1. अंचल जी, मैं लिखता नहीं हूँ. केवल संकलित/संपादित एवं अनूदित करता हूँ. इस ब्लॉग में छपी समस्त सामग्री यत्र-तत्र से ली गई है. इसे पोस्ट करने के पीछे भी कोई महत उद्देश्य नहीं है. यह केवल इस माध्यम और विषय के प्रति मेरी रुचि का परिचायक है. इससे मुझे कुछ विशेष की प्राप्ति नहीं होती, केवल अपने समय के कुछ सदुपयोग से संतोष मिलता है.

  6. Jivan ka ek kathor satya hai ki humhe Ishwar ne in sab buraiyo ko rokne ke liye hi banaya parantu manushya hi in muskil halat ko pida kerta hai or ulajhne ke baad usi Ishwar se prarthna kerta hai ki hey Ishwar..
    “देखो तुमने कैसी दुनिया बनाई है! यहाँ दुःख और दर्द के सिवा कुछ नहीं है! हर तरफ खूनखराबा और नफरत है! हे ईश्वर! ऐ मेरे भगवान तुम कुछ करते क्यों नहीं!?”
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