इस ब्लॉग के नियमित पाठक और सम्माननीय टिप्पणीकार श्री जी. विश्वनाथ जी ने कुछ दिनों पूर्व एक ईमेल भेजा। उसे यहाँ अनूदित करके प्रस्तुत कर रहा हूँ। आपका हृदय से धन्यवाद, विश्वनाथ जी!

* * * * *

एक दिन एक पेंसिल ने इरेज़र से कहा — “मुझे माफ़ कर दो…”

इरेज़र बोला — “क्यों? क्या हुआ? तुमने तो कुछ भी गलत नहीं किया!”

पेंसिल बोली — “मुझे यह देखकर दुःख होता है कि तुम्हें मेरे कारण चोट पहुँचती है। जब कभी मैं कोई गलती करती हूँ, तब तुम उसे सुधारने के लिए आगे आ जाते हो। मेरी गलतियों के निशान मिटाते-मिटाते तुम खुद को ही खो बैठते हो। तुम छोटे, और छोटे होते-होते अपना अस्तित्व ही खो देते हो।”

इरेज़र ने कहा — “तुम सही कहती हो, लेकिन मुझे उसका कोई खेद नहीं है। मेरे होने का अर्थ ही यही है! मुझे इसीलिए बनाया गया कि जब कभी तुम कुछ गलत कर बैठो, तब मैं तुम्हारी सहायता करूँ। मुझे पता है कि मैं एक दिन चला जाऊँगा और तुम्हारे पास मेरे जैसा कोई और आ जाएगा। मैं अपने काम से बहुत खुश हूँ। मेरी चिंता मत करो। मैं तुम्हें उदास नहीं देख सकता।”

* * * * *

पेंसिल और इरेज़र के बीच घटा यह संवाद बहुत प्रेरक है। उन्हीं की भाँति माता-पिता इरेज़र हैं और बच्चे पेंसिल। माता-पिता अपने बच्चों की गलतियों को सुधारने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। इस प्रक्रिया में उन्हें कभी-कभी ज़ख्म भी मिलते हैं और वे छोटे — बूढ़े होते हुए एक दिन हमेशा के लिए चले जाते हैं। बच्चों को उनकी जगह कोई और मिल जाता है, लेकिन माता-पिता अपने बच्चों का हित देखकर हमेशा खुश ही होते हैं। वे अपने बच्चों पर कोई विपदा या चिंता मँडराते नहीं देख सकते।


वह प्रेम जो माँगता नहीं

दुनिया में अधिकतर रिश्ते किसी न किसी अपेक्षा पर टिके होते हैं — मित्रता में साहचर्य की, विवाह में साथ की, समाज में प्रतिष्ठा की।

लेकिन माता-पिता का प्रेम उस दुर्लभ श्रेणी में आता है जो बिना माँगे, बिना गिने, बिना थके — बस देता रहता है।

इरेज़र यही करता है। घिसता है। मिटाता है। और इस प्रक्रिया में खुद छोटा होता जाता है — बिना शिकायत के।

यह निःस्वार्थता कोई कमज़ोरी नहीं है। यह उस प्रेम की पहचान है जो स्वयं को उद्देश्य मान लेता है।


माँ — मुंशी प्रेमचंद की वह माँ

मुंशी प्रेमचंद की कहानी “माँ” में एक विधवा माँ है जो अपने बेटे के लिए सब कुछ बेच देती है — अपने गहने, अपना आराम, अपना स्वाभिमान तक।

बेटा बड़ा होता है। नौकरी लगती है। शादी होती है।

और एक दिन माँ — चुपचाप — किनारे हो जाती है।

प्रेमचंद ने लिखा था कि माँ का यह “किनारे हो जाना” भी उसी प्रेम का हिस्सा है — वह नहीं चाहती कि उसकी उपस्थिति बेटे के नए जीवन में बाधा बने।

इरेज़र भी यही करता है — जब काम पूरा हो जाता है, वह खुद को हटा लेता है।


Khalil Gibran का वह अमर वाक्य

लेबनानी कवि ख़लील जिब्रान (Khalil Gibran) ने अपनी कृति “द प्रोफेट” (The Prophet) में बच्चों के बारे में लिखा —

बच्चे आपके द्वारा आते हैं, आपसे नहीं। आप उनके धनुष हैं — वे उससे छूटे तीर हैं। तीर जहाँ जाए, धनुष को प्रसन्न होना चाहिए।

यह रूपक इरेज़र की कहानी का ही विस्तार है। माता-पिता वह धनुष हैं जो खिंचते हैं, झुकते हैं, तनाव सहते हैं — ताकि बच्चा दूर, और दूर, और ऊँचा जा सके।

और जब तीर उड़ जाता है — धनुष पीछे रह जाता है। लेकिन उसकी भूमिका पूरी हो चुकी होती है।


विज्ञान क्या कहता है — माता-पिता का मस्तिष्क बदल जाता है

न्यूरोसाइंस (neuroscience) के शोध बताते हैं कि बच्चे के जन्म के बाद माता-पिता — विशेषकर माँ — के मस्तिष्क में संरचनात्मक परिवर्तन होते हैं।

ऑक्सीटोसिन (oxytocin) — जिसे “love hormone” कहते हैं — का स्तर स्थायी रूप से बढ़ जाता है।

मस्तिष्क का वह हिस्सा जो खतरे को भाँपता है, वह बच्चे के संदर्भ में हमेशा सक्रिय रहता है।

सरल शब्दों में — माता-पिता शाब्दिक अर्थ में अपने बच्चों के लिए जैविक रूप से “rewired” हो जाते हैं।

इरेज़र का घिसना कोई भावनात्मक कविता नहीं — यह विज्ञान है।


फिल्म “बागबान” — जब इरेज़र टूट जाता है

“बागबान” (Baghban) में राज मल्होत्रा (अमिताभ बच्चन) और उनकी पत्नी पूजा (हेमा मालिनी) अपनी पूरी ज़िंदगी बच्चों के लिए समर्पित कर देते हैं।

और जब बुढ़ापे में उन्हें सहारे की ज़रूरत होती है — चारों बेटे मुँह फेर लेते हैं।

यह फिल्म उस इरेज़र की कहानी है जो घिस-घिसकर खत्म हो गया — और जब उसने थोड़ा सहारा माँगा, तो पेंसिल ने कहा — “अब तुम्हारी ज़रूरत नहीं।”

बागबान इसीलिए दर्शकों को रुलाती है — क्योंकि यह झूठ नहीं बोलती।


वह प्रश्न जो हर बच्चे को पूछना चाहिए

इरेज़र की कहानी पढ़कर एक पल के लिए रुकिए।

अपने माता-पिता के बारे में सोचिए — वे कितने घिस चुके हैं? उनके बाल कब सफेद हुए? उनकी पीठ कब झुकी?

और उस घिसने में से कितना हिस्सा आपकी गलतियों को मिटाने में गया?

यह प्रश्न अपराधबोध जगाने के लिए नहीं है — यह कृतज्ञता जगाने के लिए है।

माता-पिता का इरेज़र एक दिन पूरी तरह खत्म हो जाएगा। उससे पहले — एक बार उनसे मिलिए। बस मिलिए।



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15 responses to “पेंसिल और इरेज़र — माता-पिता के प्रेम की सबसे सुंदर कहानी”

  1. चीजों की तरह लोग भी अपनी भूमिका से इस तरह अभिन्‍न मान लिए जाते हैं कि उन पर इस तरह से सोचा ही नहीं जाता, जिस तरह के उदाहरण से यहां स्‍पष्‍ट किया गया है.

  2. वह तो अच्छा है, जब लोग पेन से लिखना प्रारम्भ करते हैं तब इरेज़र भी हार मान लेता है।

    1. उनके लिए अब करेक्शन-टेप आ गया है.

  3. आभार!

    एक स्प्ष्टीकरण:
    मूल विचार मेरे नहीं हैं।
    मुझे किसीने ईमेल फ़ोर्वर्ड किया था और पढकर अच्छा लगा।
    आपकी याद आ गई सो आपको फ़ोर्वर्ड किया था।

    आजकल बहुत वयस्त हूँ और आपके और अन्य मित्रों के ब्लॉग पर टिप्पणी करने के लिए समय नहीं मिल रहा है।
    बस थोडा समय चुराकर ब्लॉग को पढता हूँ।
    कल कुछ दिनों के लिए हैदरबाद जा रहा हूँ और शाय्द इंटर्नेट से दूर रहूँगा।
    सोमवार वापस आ जाऊंगा और इस बीच यदि हम सम्पर्क में नहीं रहते तो कृपया अन्तथा न लें।

    शुभकामनाएं
    जी विश्वनाथ

  4. शायद हम सब के होने का यही कारण है। पेंसिल के होने का भी कारण वही है जो रबर का। पेंसिल भी लिखते लिखते अपना वज़ूद खो बैठती है।

  5. बहुत प्रेरणा दायक कहानी कहानी के भितर बहुत बङा संदेश बहोत अच्छा लगा

  6. thanks apka bahut bahut dhanyavad jo ap nayi nayi kahaniyan yahan post karte hain jinko padkar hamein achchha lagata hai apki posting hamako badi shiksha milti hai

  7. निशांत जी इस प्रेरक प्रसंग से दीपक के प्रकाश देकर अंधकार नष्ट करते हुए फ़ना होने का ध्यान आया .विश्वनाथ जी की ईमानदारी को साधुवाद .

  8. यही जीवन है मित्र – पेंसिल अंतत तय कर लेती है इरेजर में मॉर्फ होना। और जीवन चक्र चलता रहता है।

  9. उन्मुक्त जी की बात सही लगती है–हमें कहीं न कहीं एक-दूसरे के लिये कुछ न कुछ तो करते रहना पड़ता है……

  10. Sundar… waaah .. Ati sundar. मेरे होने का अर्थ ही यही है!

  11. क्या बात है.. !! हमारे आस पास ऐसी कई चीज़े हरदम मौजूद रहती है.. पर शायद नज़र उठाकर देखने की फुर्सत नहीं बस

  12. बड़ी सुंदर मन को छूती बात ……

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