एक बार परमेश्वर ने मनुष्य के सिवाय सभी प्राणियों को अपने पास बुलाया और उनसे कहा — “मैं मनुष्यों से कुछ छुपाना चाहता हूँ। मैं परमसत्य को मनुष्यों से छुपाना चाहता हूँ — लेकिन समझ नहीं पा रहा कि उसे कहाँ रखूँ!”

गरुड़ ने कहा — “वह मुझे दे दो। मैं उसे चाँद में छुपा दूँगा।”

परमेश्वर ने कहा — “नहीं। एक दिन वे वहाँ पहुँचकर उसे ढूँढ लेंगे।”

सालमन मछली ने कहा — “मैं उसे सागरतल में गाड़ दूँगी।”

“नहीं। एक दिन वे वहाँ भी पहुँच जाएंगे।”

भैंस ने कहा — “मैं उसे चारागाहों में छुपा दूँगी।”

परमेश्वर ने कहा — “एक दिन वे धरती की खाल को उधेड़ देंगे और उसे खोज लेंगे।”

सभी प्राणियों की दादी छछूंदर — धरती माँ की छाती से चिपकी रहती थी। परमेश्वर ने उसे भौतिक नेत्र नहीं बल्कि अलौकिक ज्योति प्रदान की थी। वह बोली —

“उसे उन्हीं के भीतर रख दो।”

परमेश्वर ने कहा — “बहुत अच्छा।”


वह जो सबसे नज़दीक है — सबसे देर में मिलता है

इस कहानी की सबसे गहरी विडंबना यह है —

परमसत्य को छुपाने के लिए सबसे सुरक्षित जगह वह थी जहाँ मनुष्य कभी नहीं देखता।

चाँद पर पहुँच गए। समुद्र की गहराइयाँ नाप लीं। धरती का सीना चीर डाला।

लेकिन भीतर झाँकना — यह सबसे कठिन यात्रा है।

और छछूंदर — जो अंधी है, जो ज़मीन के नीचे रहती है, जो किसी दरबार में नहीं जाती — उसे वह दिखा जो गरुड़ की तीखी आँखों को नहीं दिखा।

अलौकिक ज्योति वही देख सकती है जो बाहर की रोशनी से मुक्त हो।


उपनिषद् — “तत् त्वम् असि”

भारतीय दर्शन की सबसे पुरानी और सबसे गहरी घोषणा है —

“तत् त्वम् असि” — वह तुम हो।

छांदोग्य उपनिषद् में आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु को बार-बार यही सिखाते हैं — वह परम चेतना जिसे तुम बाहर खोज रहे हो, वह तुम स्वयं हो।

और “अहम् ब्रह्मास्मि” — मैं ब्रह्म हूँ। यह अहंकार नहीं — यह उस सत्य की स्वीकृति है जो छछूंदर ने परमेश्वर को बताया।

परमसत्य का पता हज़ारों साल पहले भी वही था — भीतर।


Ramana Maharshi — “तुम कौन हो?”

बीसवीं सदी के महान भारतीय संत रमण महर्षि की पूरी शिक्षा एक प्रश्न पर टिकी थी —

“मैं कौन हूँ?”

वे कहते थे — सारी साधना, सारे शास्त्र, सारी तीर्थयात्राएँ एक ही बिंदु पर आकर रुकती हैं। वह बिंदु है — स्वयं की खोज।

एक बार किसी ने उनसे पूछा — “ईश्वर कहाँ है?”

रमण ने कहा — “पहले यह बताओ — तुम कहाँ हो?”

जब तक “मैं” का पता नहीं, “परमेश्वर” का पता नहीं मिलता।


Joseph Campbell — Hero का खज़ाना हमेशा घर में होता है

अमेरिकी पौराणिक विद्वान Joseph Campbell ने दुनियाभर की कथाओं का अध्ययन करके एक सूत्र निकाला — “The Hero’s Journey।”

हर महान कहानी में नायक घर छोड़ता है। दूर-दूर तक भटकता है। असंख्य कठिनाइयाँ झेलता है। और अंत में जो खज़ाना मिलता है — वह वही होता है जो घर पर था।

Campbell ने लिखा था — “The cave you fear to enter holds the treasure you seek.”

वह गुफा — जिसमें जाने से डर लगता है — वह तुम्हारा अपना भीतर है।

छछूंदर वही गुफा जानती थी।


T.S. Eliot — जहाँ से चले थे, वहीं लौटे

अंग्रेज़ी के महान कवि T.S. Eliot ने अपनी कविता “Little Gidding” में लिखा —

“हम खोजते रहेंगे, और खोज का अंत यह होगा कि हम वहीं पहुँचेंगे जहाँ से चले थे — और उस जगह को पहली बार जानेंगे।”

यह वही कहानी है — दूसरी भाषा में।

मनुष्य चाँद पर गया। समुद्र में उतरा। पहाड़ खोदे। और एक दिन जब सच में थककर भीतर झाँका — तो वहाँ वह था जो हमेशा से था।


Carl Jung — “Shadow” और भीतर का अनदेखा संसार

स्विस मनोवैज्ञानिक Carl Jung ने कहा था —

“जो व्यक्ति बाहर देखता है — वह सपना देखता है। जो भीतर देखता है — वह जागता है।”

Jung का पूरा मनोविश्लेषण इसी पर टिका था — कि मनुष्य के भीतर एक विशाल अचेतन संसार है जिसे वह जानता नहीं। उसी अचेतन में उसके सबसे बड़े डर हैं — और उसकी सबसे बड़ी शक्तियाँ भी।

परमसत्य उस अचेतन की गहराई में है। जहाँ जाने के लिए न रॉकेट चाहिए, न गोताखोरी का सामान — बस निर्भीकता चाहिए।


फिल्म “Good Will Hunting” — खज़ाना जो दिख नहीं रहा था

“Good Will Hunting” (1997) में Will एक अदभुत प्रतिभाशाली युवक है — लेकिन उसकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह खुद को नहीं देख पाता।

वह दुनिया की हर किताब पढ़ चुका है। हर problem solve कर लेता है। लेकिन खुद के भीतर झाँकने से डरता है।

और therapist Sean (Robin Williams) उससे बार-बार एक ही बात कहता है — “यह तुम्हारी गलती नहीं थी।”

जब Will वह स्वीकार कर लेता है — जब वह भीतर देखता है — तभी वह मुक्त होता है।

परमसत्य Will के भीतर था। बस उसे देखने का साहस नहीं था।


छछूंदर की अलौकिक ज्योति

इस पूरी कहानी का सबसे सुन्दर प्रतीक है — छछूंदर।

जिसे दुनिया छोटा, अंधा, ज़मीन के नीचे रहने वाला प्राणी समझती है — उसे वह ज्योति मिली जो गरुड़ को नहीं मिली।

क्योंकि गरुड़ बाहर देखता है — ऊँचाइयों से, दूरियों से। छछूंदर भीतर रहती है — ज़मीन की गोद में, अँधेरे में।

जो बाहर की रोशनी से मुक्त है — वही भीतर की ज्योति देख सकता है।

और वही परमसत्य का पता जानता है।



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6 responses to “परमसत्य का पता — तुम्हारे भीतर”

  1. ये तो सच बात है, परमेश्वर ने सत्य मनुष्य के भीतर ही छुपाया है|

  2. ये तो सच बात है, परमेश्वर ने सत्य मनुष्य के भीतर ही छुपाया है|

  3. Yeh to samajh main aya ki ishwar ne satay ko insaan ke andar hi chhupaya magar iski jarrorat kyon mahsoos ke
    ishwar ne agar ispar kuch material aap ke haath ayen to
    post karna kyonki is post ne deemag main kucch sawal
    uthadiye hain intzar raheyega aap ki aisi post ka

  4. बहुत अच्छा लिखा है साब . मेरा मानना है खुदा और मोत ही सच हैं बाकि सपना .कबीर दास जी का दोहा याद आरहा है

    तेरा साईं तुझ में है ज्यों पहुपन में बास
    कस्तूरी के मृग क्यों फिरर फिर सूंघे घांस
    किस की हिम्मत है जों इस महान कलाम के आगे लिख सके कम से कम मेरे पास तो शब्द नहीं है.

  5. बहुत अच्छा लिखा है साब . मेरा मानना है खुदा और मोत ही सच हैं बाकि सपना .कबीर दास जी का दोहा याद आरहा है

    तेरा साईं तुझ में है ज्यों पहुपन में बास
    कस्तूरी के मृग क्यों फिरर फिर सूंघे घांस
    किस की हिम्मत है जों इस महान कलाम के आगे लिख सके कम से कम मेरे पास तो शब्द नहीं है.

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