1896 में स्विट्जरलैंड के लौसान शहर में दोपहर के वक्त विल्फ्रेड फेडेरिको दमासाओ पेरेटो (Vilfredo Federico Damaso Pareto) अपने सुंदर बगीचे में टहल रहे थे।

पेरेटो लौसान यूनिवर्सिटी में Political Economy पढ़ाते थे — लेकिन दिल से वे एक इंजीनियर थे और बगीचे में सब्ज़ियाँ उगाने में उन्हें आनंद आता था। उस दिन मटर की फलियाँ तैयार दिख रही थीं। उन्होंने कुछ फलियाँ बतौर नमूना तोड़ लीं।

किचन की टेबल पर गिनती शुरू हुई। 15 फलियों से 45 दाने निकले। लेकिन रुकिए — पहली 3 फलियों से 36 दाने निकले थे। बाकी 12 फलियों में केवल 9।

लगभग 20% फलियों में 80% दाने थे।

पेरेटो ने पन्ने पलटे। पिछले हफ्ते के नतीजे भी ऐसे ही थे। फिर उन्हें कल का अखबार याद आया — जो रद्दी में जा चुका था। खोज निकाला। हेडलाइन थी — “धनी और अधिक धनी होते जा रहे हैं।”

इटली की 80% निजी भूमि — केवल 20% अभिजात्य वर्ग के पास।

मटर की फलियाँ। इटली की ज़मीन। एक ही अनुपात।

पेरेटो ने कोट पहना और घर से निकल गए। कुछ दिनों बाद अकादमिक हल्कों में एक शोध पत्र छपा — जिसे आज दुनिया 80/20 नियम या पेरेटो सिद्धांत के नाम से जानती है।


111 वर्ष बाद — न्यूयॉर्क के Crown Publishers ने टिम फेरिस (Tim Ferriss) की किताब “द 4-आवर वर्कवीक” (The 4-Hour Workweek) छापी। वह किताब धमाका बन गई। टिम ने उसमें पेरेटो के सिद्धांत का भरपूर समर्थन किया — और यह तर्क दिया कि सबसे ज़रूरी 20% काम पर 80% ध्यान लगाने से जीवन बदल सकता है।

लेकिन यहाँ एक पेंच है।

एक बड़ा पेंच।


वह विरोधाभास जो टिम खुद हैं

टिम फेरिस को उनकी सफलता — उनके अपने “minimum effective dose” के सिद्धांत से नहीं मिली।

उन्हें सफलता मिली क्योंकि उन्होंने पागलों की तरह काम किया।

वे वर्षों तक रोज़ लिखते रहे। Podcast के सैकड़ों एपिसोड रिकॉर्ड किए। दुनिया के सबसे मेहनती लोगों का interview किया। हर विषय में गहरे उतरे।

यदि टिम ने केवल 20% मेहनत की होती — तो आज उनका नाम कोई नहीं जानता।

जो सिद्धांत वे किताब में पढ़ा रहे थे — उसे वे खुद अपने जीवन में नहीं जी रहे थे।

यह विडंबना नहीं है। यह एक गहरा सत्य है।


हर महीने एक लाख बार खोजा जाता है यह जुगाड़

हर महीने लोग Google पर Pareto Principle को एक लाख से अधिक बार search करते हैं।

क्यों?

क्योंकि हम सब कम मेहनत में अधिक परिणाम चाहते हैं। यह मानवीय प्रवृत्ति है — और इसमें कोई शर्म नहीं।

लेकिन समस्या तब होती है जब हम इस सिद्धांत को बहाने की तरह इस्तेमाल करने लगते हैं।

“मैंने 20% काम किया — अब 80% परिणाम आना चाहिए।”

ऐसा सोचना उसी तरह है जैसे कोई कहे — “मैंने दवा की 20% खुराक ली, मुझे 80% ठीक होना चाहिए।”


पेरेटो का सिद्धांत गलत नहीं है — हम उसे गलत तरीके से पढ़ते हैं

असल में पेरेटो के सिद्धांत में कुछ भी गलत नहीं है।

यह शुरुआत के लिए एक शानदार उपकरण है।

यह बताता है — किन 20% चीज़ों पर पहले ध्यान दो। कहाँ से शुरू करो। कौन से दरवाज़े खोलने पर सबसे पहले रोशनी आएगी।

आपकी पहली ब्लॉग पोस्ट को सुंदर formatting की ज़रूरत नहीं है। पहले कुछ YouTube वीडियो में HD recording न हो तो भी चलेगा। यह Pareto का काम है — शुरुआत को आसान बनाना, perfectionism के डर को हटाना।

लेकिन 100वीं पोस्ट को बेजोड़ होना चाहिए। 50वें वीडियो तक पहुँचते-पहुँचते quality में निखार साफ़ झलकना चाहिए।

उस मुकाम पर Pareto काम नहीं आता। वहाँ जाने के लिए 100% चाहिए।


सत्यजित राय — वे जो 20% से कभी नहीं रुके

सत्यजित राय (Satyajit Ray) की फिल्म “पथेर पांचाली” (Pather Panchali) बनाने में चार साल लगे।

वे बीच-बीच में पैसे खत्म होने पर रुकते थे — लेकिन छोड़ते नहीं थे। उन्होंने अपनी पत्नी के गहने बेचे। बीमा पॉलिसियाँ तुड़वाईं।

क्या वे Pareto सिद्धांत पर चलते? क्या वे कहते — “80% तो हो गया, बाकी 20% बाद में देखेंगे?”

नहीं।

राय perfectionist थे — इस हद तक कि एक दृश्य को दर्जनों बार shoot करते थे। एक frame में रोशनी का कोण एक डिग्री भी गलत हो — तो दोबारा।

उसी जुनून ने पथेर पांचाली को Cannes में पुरस्कार दिलाया। उसी जुनून ने उन्हें Oscar दिलाया।

जुगाड़ से मास्टरपीस नहीं बनती।


आयर्टन सेना — वह रेसर जो 98% काफ़ी नहीं मानता था

ब्राज़ीलियाई Formula 1 रेसर आयर्टन सेना (Ayrton Senna) के बारे में एक किस्सा है।

1984 में Monaco Grand Prix की qualifying में उन्होंने इतना तेज़ lap किया कि वे खुद इस trance में आ गए — जैसे कोई बाहरी शक्ति गाड़ी चला रही हो। वे डर गए और pit में आ गए।

उनके engineer ने पूछा — “क्यों रुके? Lap तो record-breaking था।”

सेना ने कहा — “मुझे डर लगा कि मैं अपनी सीमा से बाहर जा रहा हूँ।”

लेकिन वे रुके नहीं। वे हर race में उस सीमा को तोड़ते रहे।

Pareto ने उन्हें qualifying में 20% बेहतर cars की पहचान करना सिखाया होगा। लेकिन Monaco की उस गीली सड़क पर जो हुआ — वह 100% था। 120% था।

महानता की कोई shortcut नहीं होती।


फिल्म “ब्लैक” — वह 100% जो दिखती नहीं, महसूस होती है

2005 की फिल्म “ब्लैक” (Black) में अमिताभ बच्चन का किरदार — एक teacher जो एक अंधी-बहरी बच्ची को पढ़ाता है।

वह किरदार 80/20 पर नहीं चलता। वह हर दिन, हर पल, हर शब्द पर 100% लगाता है।

और उस बच्ची — रानी मुखर्जी का किरदार — जब पहली बार “W-A-T-E-R” को समझती है — वह क्षण इसलिए इतना शक्तिशाली है क्योंकि उसके पीछे कोई shortcut नहीं थी।

कुछ चीज़ें केवल पूरे दिल से होती हैं — आधे दिल से नहीं।


तो Pareto का करें क्या?

पेरेटो के सिद्धांत का उपयोग उन दरवाज़ों के ताले खोलने के लिए करिए — जिनके पीछे जाना शुरुआत में कठिन लगता है।

प्राथमिकताएँ तय करने के लिए इस्तेमाल करिए। शुरुआत को सरल बनाने के लिए।

लेकिन पेरेटो की भाँति ज़िंदगी मत बिताइए।

मोज़ार्ट (Mozart), एडिसन (Edison), फोर्ड (Ford) — ये लोग 20% मेहनत पर नहीं जिए।

और पेरेटो खुद भी नहीं जिए। वे बगीचे में मटर की फलियाँ गिनने के बाद कोट पहनकर निकल गए — और एक ऐसा सिद्धांत दिया जिसे 111 साल बाद भी दुनिया याद करती है।

वह काम — उन्होंने 100% किया था।



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2 responses to “पेरेटो का बगीचा — और वह झूठ जो हम खुद से बोलते हैं”

  1. पेरेटो सिद्धांत को पढ़ना पड़ेगा इस पोस्ट का सार समझने के लिए।

  2. Excellent posr

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