किसी गाँव में दो पिता-पुत्र रहते थे। पिता किसानी करता था और लड़का दिन भर यहाँ-वहाँ निठल्ला घूमता-फिरता था।
एक बार किसान ने लड़के से कहा कि वह धान बोने में उसकी कुछ मदद कर दे। बहुत टाल-मटोल करते-करते लड़का पिता के साथ खेतों में काम करने लगा।
लड़के को धीरे-धीरे खेतीबाड़ी का महत्व समझ में आने लगा। अब वह चाहता था कि उसकी धान की फसल जल्दी से लहलहाने लगे। धान के पौधे अपनी गति से बढ़ रहे थे। वह उन्हें देखने के लिए रोज़ खेत में जाता, लेकिन उसे पौधे पिछले दिन जितने बड़े ही दिखते।
एक दिन उसने पौधों को जल्दी बड़ा करने का एक तरीका सोच लिया। उसने खेत के सारे पौधों को ऊपर खींचकर थोड़ा-थोड़ा बढ़ा दिया।
इतनी मेहनत करने पर वह बहुत थक गया — लेकिन अपनी उपलब्धि पर बहुत खुश था। घर पहुँचते ही उसने पिता को सारी बात बता दी।
यह सुनते ही पिता सरपट खेत की ओर भागा। दुर्भाग्यवश, तब तक बहुत देर हो चुकी थी — और सारे पौधे नष्ट हो गए थे।
सब्र करें। धीरज धरें। कभी-कभी चीज़ें वाकई अपने हिसाब से ही होती हैं। बिना किसी कारण के जल्दबाज़ी करने से घटनाओं के घटने का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो जाता है।
जड़ें दिखती नहीं — पर वही असली काम करती हैं
उस लड़के की गलती यह नहीं थी कि वह चाहता था पौधे बड़े हों।
गलती यह थी कि उसे दिख नहीं रहा था — ज़मीन के नीचे क्या हो रहा था।
जब धान का पौधा ऊपर से स्थिर दिखता है — तब ज़मीन के भीतर उसकी जड़ें फैल रही होती हैं। मिट्टी से पोषण सोख रही होती हैं। अपनी नींव मज़बूत कर रही होती हैं।
वह “कुछ नहीं होने” का समय — असल में सबसे ज़रूरी समय था।
लड़के ने जब पौधे खींचे — उसने जड़ों को तोड़ा। और जड़ों के बिना कोई पौधा नहीं जीता।
जो दिखता नहीं — वही अक्सर सबसे ज़रूरी होता है।
ताओ-ते-चिंग — प्रकृति की अपनी गति है
लाओ-त्ज़ु ने लिखा था —
“प्रकृति कोई जल्दी नहीं करती — फिर भी सब कुछ हो जाता है।”
यह वाक्य उस लड़के के लिए था। और हम सबके लिए है।
पेड़ रात में नहीं उगता। नदी एक दिन में समुद्र नहीं बनती। बच्चा नौ महीने से कम में नहीं जन्मता।
प्रकृति की एक अपनी timing है। और वह timing किसी की बेसब्री से नहीं बदलती।
जो उसे बदलने की कोशिश करता है — वह उस लड़के जैसा है जो थका हुआ खुश लौटा — और सुबह जिसके खेत में कुछ नहीं बचा था।
कबीर — धीरज का वह दोहा
कबीर ने कहा था —
“धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय। माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय।।”
माली चाहे सौ घड़े पानी डाले — फल तभी आएगा जब ऋतु आएगी। न एक दिन पहले, न एक दिन बाद।
कबीर किसान थे। वे यह जानते थे। और इसीलिए उन्होंने यह दोहा लिखा।
उस लड़के ने माली की भूमिका तो निभाई — लेकिन ऋतु का इंतज़ार नहीं किया।
बाँस का पेड़ — पाँच साल ज़मीन के नीचे
Chinese Bamboo के बारे में एक प्रसिद्ध तथ्य है।
आप बीज बोते हैं। पानी देते हैं। खाद देते हैं। एक साल — कुछ नहीं दिखता। दो साल — कुछ नहीं। तीन साल — कुछ नहीं। चार साल — कुछ नहीं।
पाँचवें साल में — बाँस ज़मीन से निकलता है। और छह हफ्तों में 90 फुट ऊँचा हो जाता है।
क्या वह पाँच साल कुछ नहीं हो रहा था? हो रहा था — ज़मीन के नीचे। जड़ें बन रही थीं। इतनी गहरी, इतनी मज़बूत कि जब निकला तो रोकना असम्भव था।
जो दिखता नहीं, वह रुका नहीं होता। वह तैयार हो रहा होता है।
Steve Jobs — जो dots बाद में जुड़ते हैं
Steve Jobs ने 2005 में Stanford commencement speech में कहा था —
“आगे देखकर dots को नहीं जोड़ा जा सकता। उन्हें पीछे मुड़कर ही जोड़ा जाता है।”
Jobs ने calligraphy सीखी — बिना किसी उद्देश्य के। दस साल बाद वही calligraphy Macintosh के fonts बनी।
उस वक्त जब वह calligraphy सीख रहे थे — क्या कोई देख सकता था कि यह किस काम आएगी? नहीं।
लेकिन वह “बेकार” समय — वह तैयारी थी।
हर धीमा पल एक dot है। जोड़ने की बारी बाद में आती है।
फिल्म “Lagaan” — फसल और धैर्य
“Lagaan” (2001) में Aamir Khan का किरदार Bhuvan एक किसान है जो एक असम्भव चुनौती स्वीकार करता है।
पूरी फिल्म धीरज की कहानी है। Cricket सीखना — धीरे-धीरे। टीम बनाना — धीरे-धीरे। विश्वास जीतना — धीरे-धीरे।
एक भी जगह Bhuvan ने जल्दबाज़ी नहीं की। और जब समय आया — वह तैयार था।
उस लड़के के उलट — जिसने जल्दी में सब नष्ट कर दिया।
आपकी कौन-सी फसल खींची जा रही है?
हम सब वह लड़का हैं — कभी न कभी।
जब relationship धीरे-धीरे बढ़ रहा हो और हम उसे तुरंत “define” करना चाहें। जब career अपनी गति से बन रहा हो और हम shortcut ढूँढें। जब बच्चा अपनी pace से सीख रहा हो और हम उसे आगे धकेलें। जब खुद का healing process चल रहा हो और हम तुरंत “ठीक” हो जाना चाहें।
हर बार — हम पौधे खींच रहे होते हैं।
सब्र कीजिए। सींचते रहिए। ऋतु आएगी।





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