किसी ने अपनी प्रियतमा के द्वार को खटखटाया। भीतर से आवाज़ आई — “कौन है?”

उसने कहा — “यह मैं हूँ!”

द्वार के भीतर से आवाज़ आई — “इस घर में मैं और तुम एक साथ नहीं रह सकते।”

द्वार नहीं खुला।

प्रेमी बियाबान में ठोकर खाता रहा। वह अपनी सुध-बुध खोकर हर घड़ी इसी प्रार्थना में डूबा रहता कि द्वार किसी तरह खुल जाए।

साल भर बाद वह लौटा और उसने द्वार को फिर से खटखटाया।

द्वार के पीछे से किसी ने फिर से पूछा — “कौन है?”

प्रेमी ने कहा — “तुम।”

और द्वार खुल गया।


एक दरवाज़ा, दो शब्द, एक पूरा जीवनकाल

रूमी की यह कहानी केवल प्रेम की नहीं है।

यह अहंकार और समर्पण की कहानी है। यह “मैं” और “तुम” के बीच की उस दूरी की कहानी है जो बाहर से नहीं — भीतर से तय होती है।

पहली बार जब प्रेमी ने कहा — “यह मैं हूँ” — उसने सोचा यही सच्चाई है। यही ईमानदारी है। मैं कौन हूँ? मैं हूँ।

लेकिन उस “मैं” में सारा अहंकार भरा था। सारी अपेक्षाएँ। सारी शर्तें। सारी गणनाएँ।

और प्रेम के द्वार पर “मैं” के लिए कोई जगह नहीं होती।


बियाबान — जहाँ ‘मैं’ घुलता है

वह एक साल जो प्रेमी ने बियाबान में बिताया — वह दंड नहीं था।

वह रूपांतरण था।

रूमी की सूफी परम्परा में “फना” का विचार है — अर्थात् स्वयं का विलोपन। जब तक “मैं” है, तब तक प्रेमी और प्रिय दो हैं। जब “मैं” मिट जाता है — तब एकता होती है।

बियाबान की ठोकरें, भटकन, प्रतीक्षा — ये सब उस “मैं” को घिसती रहीं। जैसे पत्थर को नदी घिसती है। जब तक वह नुकीला था — नदी में समा नहीं सकता था। जब घिसकर गोल हो गया — नदी का हिस्सा बन गया।

बियाबान वह जगह है जहाँ अहंकार टूटता है — और प्रेम जन्म लेता है।


मीराबाई — जिन्होंने ‘मैं’ को जलाया

भारत की संत कवयित्री मीराबाई के एक पद में यही भाव है —

“मैं तो साँवरे के रंग राँची।”

मीरा ने यह नहीं कहा — “मैं कृष्ण से प्रेम करती हूँ।” उन्होंने कहा — “मैं तो उन्हीं के रंग में रँग गई।” यानी अब अलग कोई “मैं” नहीं — बस उनका रंग।

यही रूमी का “तुम” है।

जब प्रेमी ने “तुम” कहा — उसने खुद को मिटाकर प्रिय को ही अपना परिचय बना लिया। और तब द्वार खुल गया।


सूफी और वेदांत — एक ही सत्य, दो भाषाएँ

रूमी की इस कहानी में जो “प्रियतमा” है — वह केवल एक स्त्री नहीं है।

सूफी परम्परा में प्रियतमा ईश्वर का रूपक है। प्रेमी साधक है। और वह बंद द्वार अहंकार की दीवार है।

हिंदू वेदांत में इसे ही अहंकार कहते हैं — वह “मैं” जो आत्मा और परमात्मा के बीच खड़ा है। जब तक यह “मैं” है — द्वैत है। जब यह मिटता है — अद्वैत होता है।

“अहम् ब्रह्मास्मि” — मैं ब्रह्म हूँ। लेकिन यह उपनिषद का वाक्य तभी सच होता है जब वह “मैं” अहंकार का नहीं — चेतना का हो।

रूमी और शंकराचार्य — दोनों एक ही द्वार के बारे में बात कर रहे थे।


Khalil Gibran — प्रेम में “मैं” और “तुम”

लेबनानी कवि ख़लील जिब्रान ने अपनी पुस्तक “The Prophet” में प्रेम के बारे में लिखा —

“प्रेम में एक-दूसरे को पीने दो। लेकिन एक-दूसरे को पिंजरा मत बनाओ। साथ खड़े रहो — लेकिन बहुत पास नहीं। क्योंकि मंदिर के खम्बे अलग-अलग खड़े होते हैं।”

यह पहली नज़र में रूमी से उलट लगता है। लेकिन है नहीं।

जिब्रान कह रहे हैं — “मैं” को मिटाओ, लेकिन व्यक्तित्व को नहीं। रूमी कह रहे हैं — “मैं” को मिटाओ, तभी असली मिलन होगा।

दोनों का सार एक है — प्रेम में अहंकार की जगह नहीं।


मनोविज्ञान कहता है — “Ego Dissolution”

आधुनिक मनोविज्ञान में “Ego Dissolution” की अवधारणा है — वह अवस्था जब “self” और “other” के बीच की सीमा धुंधली हो जाती है।

शोध बताते हैं कि गहरे ध्यान, गहरे प्रेम, और गहरे रचनात्मक अनुभव में यही होता है — “मैं” पीछे हट जाता है, और एक विशाल उपस्थिति का अनुभव होता है।

संगीतकार जब किसी राग में डूब जाते हैं — वे भूल जाते हैं कि कौन बजा रहा है। कवि जब किसी कविता में खो जाते हैं — वे कहते हैं — “यह मैंने नहीं लिखा, यह अपने आप उतरी।”

रूमी का बियाबान आधुनिक मनोविज्ञान का “Ego Dissolution” है। और वह “तुम” — उस dissolution के बाद की अवस्था।


फिल्म “Rockstar” — जब ‘मैं’ टूटा तब संगीत जन्मा

“Rockstar” (2011) में Ranbir Kapoor का किरदार Jordan — एक युवक जो संगीतकार बनना चाहता है।

एक बुज़ुर्ग संगीतकार उससे कहता है — “जब तक तुम्हारा दिल नहीं टूटेगा, तुममें से असली संगीत नहीं निकलेगा।”

Jordan को प्रेम मिला। खोया। टूटा। बियाबान में भटका।

और तभी वह संगीत आया जो पहले नहीं था।

रूमी का प्रेमी और Jordan — दोनों को बियाबान ने ही जन्म दिया।


वह “तुम” — जो सबसे कठिन शब्द है

“मैं” कहना आसान है।

“मैं” में हमारी पहचान है, हमारा इतिहास है, हमारी शर्तें हैं, हमारी अपेक्षाएँ हैं।

“तुम” कहना — पूरे अर्थ में — सबसे कठिन काम है।

इसका अर्थ है — मैं यहाँ नहीं हूँ। मेरी कोई माँग नहीं। मेरी कोई शर्त नहीं। मैं केवल तुम्हारे लिए यहाँ हूँ।

यह प्रेम में होता है। यह साधना में होता है। यह उस पल में होता है जब कोई माँ अपने बच्चे को देखती है।

और हर बार — जब भी कोई सच्चे अर्थों में “तुम” कह पाया — द्वार खुल गया।



Discover more from हिंदीज़ेन : HindiZen

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

13 responses to ““तुम” — रूमी का वह द्वार जो ‘मैं’ से नहीं खुलता”

  1. मेरे ख़याल से अगर यहाँ आखिर में “तुम” की जगह “हम” होता तो ज्यादा अच्छा था, आपका क्या ख़याल है निशांत जी ?

    1. वैभव जी, रूमी की यह बोध कथा में रूहानियत का अंदाज़ है जहाँ ‘मैं’ खो जाता है और सिर्फ ‘तू’ रह जाता है.

  2. अहा!! अह्म का कोई स्थान नहीं..समर्पण का स्वागत है!!

  3. प्रेम में अस्तित्वों के एकाकार होने की अनोखी कथा है यह । रूमी की यह कथा प्रेम की उस विराटता का पता देती है, जहाँ समस्त सांसारिक बोध खो जाता है ।

    प्रेमी बियाबान में ठोकर खाता रहा और सोचता रहा उसके ’मै’ का रूपांतरण कैसे हो- वस्तुतः रूमी की यह कथा पहले तो मैं की उस दुष्कर खोज को रेखांकित करती है, जिसका पता ही नहीं लग पाता इस सांसारिक जीवन में । प्रेम की पवित्र सरणी में स्नान करने के पूर्व यह आवश्यक भी था कि पहले ’मैं’ ढूढ़ लिया जाता ।

    कितना अच्छा होता यदि यह कथा एक कदम और आगे बढ़ती और प्रेमी एक दफा और दुत्कारा जाता अपनी प्रेमिका से – कि यहाँ ’मैं” ही नहीं ’तुम” का भी प्रवेश वर्जित है; क्योंकि यदि ’तुम’ भी शेष रह गया तो कहीं न कहीं ’मैं’ रह ही जायेगा । तो एक कदम आगे वर्षों की गूढ़तम खोज के बाद प्रेमी दुबारा वापस लौटता और दरवाजा खटखटाता । यह पूछने पर कि कौन ? जवाब देता – ’प्रेम ही’, और कौन । और द्वार खुल जाता ।

    जहाँ मैं और तुम दोनॊं ही विलयित होकर प्रेम की साकार परिणिति में बदल गये हों वहाँ ही न रह पायेगी प्रेम की जीवन्त अभिव्यक्ति और चेतना अक्षुण्ण ।

  4. मुझे यह कहानी ठीक नहीं लगती। कहा जाता है कि Intimacy breeds contempt. मालुम नहीं क्यों जो प्यार में अपना व्यक्तित्व खो देता है वह भी खो जाता है, उसका महत्व चला जाता है, उसे जीवन में दुख ही मिलते हैं। ऐसा मेरा जीवन का अनुभव है। हो सकता है कि मैं गलत हूं।

  5. प्रेम मे अहँ कहीँ होता नहीँ।

  6. ठीक है पर इस कहानी मे गहराई नहीँ है

  7. गहराई के साथ लिखोBEST OE LICK

    1. जी, कमेंट के लिए धन्यवाद.
      मैं गहराई के साथ लिखने की कोशिश ज़रूर करूंगा.
      आपको भी BEST OE LICK

  8. Jisse koi isq krta hai to apne aapko bhul jata hai sirf masooq yaad rahta hai apni sudh-budh kho jati hai mai koun hu a bhul jata hai.Yahi sachcha isq hai.Yhi isq ki inteha hai.Yahi par aasiq aur mashuk me frk khatam ho jata hai. 09044136272

Leave a Reply to MobeenCancel reply

Trending

Discover more from हिंदीज़ेन : HindiZen

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading

Discover more from हिंदीज़ेन : HindiZen

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading