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जीवन चखकर देखा जाता है — समझाया नहीं जाता

विद्यारम्भ से पहले एक शिष्य अपने गुरु से सभागार में वार्तालाप करने के लिए आया। वह हर बात के बारे में आश्वस्त हो लेना चाहता था।

शिष्य ने पूछा — “क्या आप मुझे बता सकते हैं कि मानव जीवन का उद्देश्य क्या है?”

“नहीं” — गुरु ने उत्तर दिया।

“आप कम-से-कम जीवन का अर्थ तो बता ही सकते हैं!?”

“नहीं।”

“अच्छा। तो यह बताएँ कि मृत्यु क्या है और जीवन के बाद कौन-सा जीवन है।”

“मैं यह सब नहीं बता सकता।”

वह शिष्य चिढ़कर विद्यालय छोड़कर चला गया। बाकी शिष्यों को लगा कि उनके गुरु का अपमान हो गया। कुछ को यह भी लगने लगा कि उनके गुरु ज्ञानी नहीं हैं।

गुरु अपने शिष्यों के मन में चल रहे द्वंद्व को भाँप गए। वे बोले —

“उस जीवन की प्रकृति और उसके अर्थों व उद्देश्यों को जानकर क्या करोगे — जब तुमने जीवन जीना प्रारम्भ ही न किया हो! सामने रखे भोजन के विषय में अटकलें लगाने से बेहतर होगा कि उसे चखकर देख लिया जाए।”


जीवन विचार से नहीं बल्कि अनुभव से मिलता है। — Anthony de Mello


“नहीं” — जो सबसे बड़ा उत्तर था

गुरु ने तीन बार “नहीं” कहा।

और तीनों बार — वह “नहीं” एक गहरा उत्तर था।

जीवन का उद्देश्य किसी से पूछकर नहीं मिलता। जीवन का अर्थ किसी किताब में नहीं लिखा। मृत्यु के पार क्या है — यह जानने का कोई shortcut नहीं।

ये प्रश्न इसलिए नहीं हैं कि इनके उत्तर मिलें। ये इसलिए हैं कि इन्हें जीते हुए एक दिन उत्तर स्वयं उगे।

वह शिष्य उत्तर लेकर जीवन जीना चाहता था। गुरु जानते थे — जीवन जीकर ही उत्तर मिलता है।


Wittgenstein — जो कहा नहीं जा सकता

20वीं सदी के महान दार्शनिक Ludwig Wittgenstein ने अपनी पुस्तक “Tractatus Logico-Philosophicus” का अंतिम वाक्य लिखा —

“जिसके बारे में बोला नहीं जा सकता — उसके बारे में चुप रहना चाहिए।”

जीवन का उद्देश्य, मृत्यु का सत्य, अस्तित्व का अर्थ — ये सब उसी श्रेणी में हैं।

गुरु Wittgenstein के इस सिद्धांत को जी रहे थे — बिना उसका नाम लिए।

कुछ प्रश्नों का उत्तर देना — उन्हें छोटा करना है।


Albert Camus — अर्थहीनता को गले लगाओ

फ्रांसीसी लेखक Albert Camus ने कहा था कि जीवन का कोई inherent अर्थ नहीं है — और यही “The Absurd” है।

लेकिन Camus निराशावादी नहीं थे। उनका कहना था — इस absurdity के बावजूद जीओ। पूरी तरह। उत्साह से।

उनकी पुस्तक “The Myth of Sisyphus” में Sisyphus — जो पत्थर को पहाड़ पर चढ़ाता है और वह बार-बार लुढ़कता है — उसे Camus खुश देखते हैं।

क्यों? क्योंकि वह अर्थ की तलाश में नहीं, जीवन में है।

वह शिष्य Sisyphus को देखकर पूछता — “इसका क्या अर्थ है?” Camus कहते — “चढ़ो।”


Anthony de Mello — जो जागते हैं, वे नहीं पूछते

इस कहानी के अंत में जिन Anthony de Mello का उद्धरण है — वे एक Jesuit पादरी और आध्यात्मिक गुरु थे जिन्होंने पूर्वी और पश्चिमी दर्शन को असाधारण रूप से मिलाया।

उनकी पुस्तक “Awareness” में वे कहते हैं —

“अधिकांश लोग जीते नहीं। वे बस अपने जीवन के बारे में सोचते रहते हैं।”

और फिर —

“जागना यह नहीं है कि तुम्हारे पास सभी उत्तर हों। जागना यह है कि तुम अब प्रश्न नहीं पूछते — क्योंकि तुम जी रहे हो।”

वह शिष्य सोने से पहले नींद की definition माँग रहा था।


Simone de Beauvoir — जीवन अर्जित किया जाता है

फ्रांसीसी दार्शनिक Simone de Beauvoir ने लिखा था —

“जीवन में अर्थ नहीं होता — अर्थ बनाना पड़ता है।”

यह निष्क्रियता का निमंत्रण नहीं — यह सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी का आह्वान है।

किसी गुरु से, किसी किताब से, किसी धर्म से जीवन का अर्थ माँगना — एक तरह की बच्चों वाली माँग है। जैसे कोई पूछे — “मुझे खुशी दे दो।”

खुशी दी नहीं जाती। बनाई जाती है। और अर्थ भी।


Richard Feynman — “I don’t know” सबसे ईमानदार उत्तर है

Nobel Prize विजेता भौतिकशास्त्री Richard Feynman से एक बार पूछा गया — “क्या आप magnetic force को explain कर सकते हैं?”

Feynman ने कहा — “मैं explain कर सकता हूँ कि यह कैसे काम करती है। लेकिन ‘क्यों’ का उत्तर नहीं दे सकता। और यही विज्ञान की ईमानदारी है।”

गुरु ने वही किया — उन्होंने ईमानदारी चुनी।

“मुझे नहीं पता” — यह कमज़ोरी नहीं, बौद्धिक साहस है।


Osho — अनुभव का धर्म

ओशो ने एक बार कहा था —

“तुम्हारे सभी प्रश्न उधार लिए हुए हैं। तुमने उन्हें जीकर नहीं पाया — किताबों में पढ़कर उठाए हैं।”

वह शिष्य ठीक यही कर रहा था। विद्यारम्भ से पहले — अर्थात् अनुभव से पहले — वह उत्तर चाहता था।

ओशो कहते — “पानी में उतरो। तैरना सिखाया नहीं जाता — किया जाता है।”


फिल्म “Dead Poets Society” — “Carpe Diem”

“Dead Poets Society” (1989) में Robin Williams का किरदार John Keating अपने छात्रों को एक काम करवाता है।

वह उन्हें पुरानी school की तस्वीरें दिखाता है — दशकों पहले के छात्र।

और कहता है — “वे सब तुम्हारी तरह अजेय महसूस करते थे। वे सब चले गए। तुम भी जाओगे। तो अभी — Carpe Diem — इस पल को जियो।”

वह शिष्य Keating से पूछता — “जीवन का अर्थ क्या है?”

Keating शायद कहते — “बाहर जाओ। कविता पढ़ो। किसी से प्रेम करो। गलती करो। यही अर्थ है।”


वह भोजन — जो सामने रखा है

गुरु का वाक्य इस पूरी कहानी का हृदय है —

“सामने रखे भोजन के विषय में अटकलें लगाने से बेहतर होगा कि उसे चखकर देख लिया जाए।”

जीवन सामने रखा है।

हर सुबह। हर रिश्ता। हर असफलता। हर खुशी। हर अजनबी। हर चुनाव।

यह सब उत्तर हैं — लेकिन केवल उनके लिए जो जीते हैं।

जो बैठकर पूछते रहते हैं — उनके लिए भोजन ठंडा होता जाता है।

चखिए। अभी।



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7 responses to “जीवन चखकर देखा जाता है — समझाया नहीं जाता”

  1. om arya अवतार

    bahut hi badhiya post …bahut hi sundar

  2. Gyan Dutt Pandey अवतार

    सामने रखे भोजन के विषय में अटकलें लगाने से बेहतर होगा कि उसे चखकर देख लिया जाए
    ————
    यह बढ़िया है। पहले जी कर तो देखें; फलसफा ठेलने के पूर्व!

  3. ममता अवतार

    बहुत अच्‍छा लगा पढ़कर ।
    मेरी इच्‍छा हो रही है कि अपने चार महीने के बेटे को ये कथाएं अभी से पढ़कर सुनाऊं ।

  4. rinku अवतार
    rinku

    पढ. कर अच्‍छा लगा,जीवन की इतनी सटीक परिभाषा
    सुन्‍दर है अति सुन्‍दर है

  5. rinku अवतार
    rinku

    पढ. कर अच्‍छा लगा,जीवन की इतनी सटीक परिभाषा
    सुन्‍दर है अति सुन्‍दर है

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