जब कोई दुख गहराता है तो हम अक्सर philosophical हो जाते हैं। “जीवन क्या है? हम यहाँ क्या करने के लिए आए हैं?”
क्या आप भी ऐसी ही बातें करते हैं?
कितना अच्छा होता यदि हम अपने रचयिता को एक call करके उससे पूछ सकते — “जीवन क्या है? इसका उद्देश्य क्या है?”
लेकिन इन प्रश्नों का उत्तर हमें खुद ही ढूँढना पड़ता है। एक अहम बात जो मैंने सीखी है वह यह है कि जीने का कोई सटीक सही या गलत तरीका नहीं है।
लेकिन कुछ ऐसे सार्वभौमिक सिद्धांत होते हैं जिनका हमें ज्ञान होना चाहिए। हमारी समस्या यह है कि हम घटनाओं और परिस्थितियों के लिए प्रतिक्रिया उस रूप में नहीं करते जैसी करनी चाहिए।
ऐसे में जब कुछ वर्ष पहले मैं एक निजी संकटकाल से गुज़र रहा था, तब मैंने खुद से पूछा: ऐसी कौन-सी चीज़ें हैं जिनके बारे में लोग बातें बहुत करते हैं लेकिन करते नहीं हैं?
मेरे मन में जो बिंदु सामने आए उन्हें मैं अपने 7 निजी सिद्धांत कहता हूँ। तब से ही मैं अपना जीवन इन 7 सिद्धांतों के अनुसार जी रहा हूँ।
1. दर्द से गुज़रे बिना हम grow नहीं करते
कभी-कभी हम बहुत crazy तरह के काम करने की बातें करते हैं। पहाड़ चढ़ना, marathon दौड़ना, sky-diving, startup बनाना, दुनिया घूमना, किताब लिखना, फिल्म बनाना — इसी तरह के बहुत-से काम हमारी list में शामिल होते हैं।
जिन कामों को हम अपनी ज़िंदगी में आगे कभी करने का सोचते हैं उनके लिए अंग्रेजी में एक expression इस्तेमाल किया जाता है जिसे ‘bucket list’ कहा जाता है। आपकी भी कोई bucket list होगी। उस पर एक निगाह डालिए और मेरे एक प्रश्न का उत्तर दीजिए — आपने वे सब काम अभी तक क्यों नहीं किए हैं?
इसका उत्तर लगभग हमेशा ही यह होता है: यह बहुत मुश्किल है।
लेकिन यहाँ मैं आपको यह बताना ज़रूरी समझता हूँ कि जीवन सरल होने के लिए बना ही नहीं है। यह मेरा सीखा सबसे अनमोल सबक है।
कठिन चीज़ों से मुँह मत फेरिए। इसके उलट स्वयं को ऐसा व्यक्ति बनाइए जो हर तरह की कठिनाइयों को झेल सके। शारीरिक भी और मानसिक भी।
यह कोई घिसी-पिटी किताबी बात नहीं है। यह 100% सत्य है कि टूटे बिना हम जुड़ नहीं सकते, गिरे बिना हम उठ नहीं सकते, कष्ट झेले बिना हम रोगमुक्त नहीं हो सकते।
यदि हम अपनी मांसपेशियों को उनकी सीमाओं तक इस्तेमाल नहीं करते हैं तो हमारे हाथ-पैर कमज़ोर हो जाते हैं। यदि हम अपने मस्तिष्क को झकझोरते नहीं हैं तो हमारी मानसिक शक्तियों का क्षय होने लगता है। यदि हम अपने चरित्र का परीक्षण नहीं करते हैं तो हम रीढ़-हीन हो जाते हैं।
2. नकारात्मकता को हर कीमत पर दूर रखिए
इस बात को हर व्यक्ति जानता है लेकिन शायद ही कोई इसे अपने जीवन में पूरी तरह लागू कर पाता है।
लोग अपने घर, office, परिवार और दोस्तों के साथ नकारात्मक वातावरण में रहते हैं।
इसमें कुछ भी अजीब नहीं है क्योंकि negativity जीवन के हर क्षेत्र में इतनी व्यापक हो गई है कि इसकी उपस्थिति सामान्य और स्वीकार्य हो गई है। यह एक स्थापित वैज्ञानिक तथ्य है कि लोग मूलतः नकारात्मक प्रवृत्ति के होते हैं और नकारात्मकता का प्रभाव और प्रसार अधिक प्रबलता से होता है।
यही कारण है कि दुनिया में लोग बहुत अधिक शिकायतें करते हैं, झूठ बोलते हैं, आरोप लगाते हैं, धोखा देते हैं, ईर्ष्या करते हैं।
यह सारी negativity हमें शारीरिक और मानसिक विकास से दूर रखती है। आप negativity को अपने करीब क्यों आने देते हैं?
आप ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि मनुष्य होने के नाते आप व्यक्तियों से भलाई की उम्मीद करते हैं —
“उसकी नीयत साफ है।” “वह आइंदा ऐसा नहीं करेगी।” “आगे सब ठीक हो जाएगा।”
आपको पता है कि आप लोगों को नहीं बदल सकते। तो फिर आप इसके लिए प्रयास क्यों करते हैं? लोग तभी बदलेंगे जब वे बदलना चाहेंगे।
Negativity को दूर रखिए। हर कीमत पर।
3. आप जितना लेते हैं उससे अधिक दूसरों को दीजिए
जब आप छोटे बच्चे थे तब आपका पूरा ध्यान रखा जाता था। आपके माता-पिता आपके भोजन और सुरक्षा का प्रबंध करते थे। यदि आपका बचपन खुशहाल नहीं भी था तो भी उन्होंने आपको शिक्षा दिलाई, बीमार होने पर इलाज करवाया।
तभी से वस्तुओं को लेने की प्रवृत्ति हमारे मन में घर कर गई जो हमारी युवावस्था तक चली आई है। हमें लगता है कि हम जितना चाहें उतना ले सकते हैं।
कौन कहता है कि आपको वह job मिलनी ही चाहिए जिसके लिए आपने apply किया? या वह promotion जिसके लिए आप लालायित थे? या बेजोड़ सफलता?
बजाए यह सोचने के कि आप दुनिया से कितना ज़्यादा ले सकते हो — यह सोचना शुरू करो कि आपके पास देने के लिए क्या है।
ज़िंदगी सब कुछ प्राप्त कर लेने का नाम नहीं है। इसके विपरीत करके देखिए — लोगों की मदद कीजिए, उन्हें वह दीजिए जिसकी वे आपसे अपेक्षा करते हैं — और आप पाएंगे कि आपको और अधिक मिलता है।
दूसरों की सहायता करना, उनका मार्गदर्शन करना, उनके भविष्य को सुधारने का काम ही एकमात्र वह काम हो सकता है जिसके लिए लोग आपको हमेशा याद रखेंगे।
4. समय सबसे अधिक मूल्यवान है
विश्व के सभी संसाधनों में से केवल समय ही वह संसाधन है जो हमारे लिए सबसे अधिक सीमित और सबसे अधिक मूल्यवान है।
यह बात आप जानते हैं। पूरे जीवनकाल में हमारे समय का एक-तिहाई भाग सोने में बीत जाता है और शेष भाग में ही हम कुछ सार्थक कर सकते हैं।
लेकिन लोग अपना समय इस प्रकार बिताते हैं जैसे उनके पास इसकी असीम मात्रा हो।
यदि हम मनुष्य की औसत आयु 80 वर्ष मान लें तो हमारे पास कितना समय बचा है? जितना भी शेष हो, उसे व्यर्थ बिताने में कोई सार नहीं है।
आपको अपने समय को लेकर बहुत selective होना चाहिए। यदि आप अपनी सेहत या धन गँवा दें तो उसकी भरपाई की जा सकती है — लेकिन अवसरों को हाथ से निकल जाने की भरपाई नहीं की जा सकती। बीत चुका समय कभी वापस नहीं आता।
जो समय बीत जाता है वह हमेशा के लिए अनुपलब्ध हो जाता है। उसका 100% loss हो जाता है।
5. अपने मार्ग का निर्माण स्वयं कीजिए
हम सफल व्यक्तियों को अनुकरणीय उदाहरण मानकर उनकी ओर देखते हैं। हम अपने पिता, माता, भाई, बहन, दोस्त, boss, शिक्षक, mentor से प्रभावित होते हैं और उनके जैसा बनना चाहते हैं।
दूसरों से सीखना जीवन में उन्नति करने का सबसे अच्छा उपाय है। लेकिन इसमें एक समस्या है — आप वे सभी व्यक्ति नहीं हैं। वे अलग हैं और आप अलग हो। उनका जीवन और उनकी सफलता उनकी अपनी है।
ऐसे में आपके पास बस एक ही चीज़ बचती है: आप अपनी राह स्वयं बनाओ।
दूसरों की बनाई राह पर चलना बहुत आसान होता है। आपको पता होता है कि उन्होंने किन अवरोधों का सामना किया। लेकिन यह आपको परिपूर्णता की अनुभूति नहीं कराता।
इसीलिए मैं नवयुवकों से हमेशा यह कहता हूँ कि उन्हें अनजान राहों पर चलने और उन कामों को करने से परहेज़ नहीं करना चाहिए जिन्हें कोई भी करने के लिए तैयार नहीं होता।
आपको इस बात का पता कैसे चलता है कि आप किसी अनजान राह पर चल रहे हो? जब दुनिया भर के लोग आपको समझ नहीं पा रहे हों और आपको कुछ और करने के लिए कह रहे हों — यह इस बात का प्रमाण है कि आप जो कर रहे हैं वह सही है।
6. अपने जीवन और परिस्थितियों का विरोध नहीं करें
जीवन बहुत ही random चीज़ है। आपका जन्म किसी और घर में क्यों नहीं हुआ? आप इस देश में ही क्यों जन्मे? क्यों, क्यों, क्यों?
मुझे पता है आपके पास इन प्रश्नों के कोई उत्तर नहीं हैं। क्योंकि यह सब chance की बात है।
यह सोचने की बजाए कि ऐसा होता तो अच्छा होता — अपने जीवन की परिस्थितियों को स्वीकार कर लीजिए। परिस्थितियाँ कितनी ही बुरी क्यों न हों, आप उनसे लड़ने में शक्ति व्यर्थ नहीं कर सकते।
जीवन में बहुत-सी चीज़ों पर हमारा नियंत्रण नहीं होता। इसे इस तरह से देखिए कि आज आप जीवन के जिस मोड़ पर हैं उसके पीछे कुछ कारण हैं।
किसी मोड़ पर जब जीवन आपसे कोई निर्णय लेने की अपेक्षा करे — उठिए और कर्म कीजिए। जीवन से मुँह मत मोड़िए। किसी और को अपने जीवन के फैसले मत लेने दीजिए।
7. जीवन एक ही दिशा में आगे बढ़ता है
आप अपने मस्तिष्क में तीन अलग-अलग आयामों में रह सकते हैं — अतीत, भविष्य, वर्तमान।
यदि आप अतीतजीवी हैं तो आप हमेशा “क्यों” के चंगुल में फँसे हैं। यह जीवन में दुख को न्यौता देता है।
यदि आप भविष्य में जीते हैं तो आप “यदि” के चंगुल में फँसे हैं। यह डर-डर के जीना है।
आपको पता है कि जीवन एक ही वास्तविक आयाम में जिया जा सकता है — वर्तमान में।
तो फिर आप वर्तमान में क्यों नहीं जीते? क्योंकि अनगिनत कारक आपको वर्तमान में जीने से रोकते रहते हैं।
मुझे अतीत और भविष्य के चंगुल से निकालकर वर्तमान में जीने की प्रेरणा देने वाला विचार यह है: जीवन हमेशा आगे बढ़ता है — यह इस बात की परवाह नहीं करता कि मैं क्या सोचता या करता हूँ। इसीलिए मुझे उन बातों पर सोचविचार करके समय नष्ट नहीं करना चाहिए जिन पर मेरा कोई नियंत्रण नहीं है।
अपनी भावनाओं को हाशिए पर रखकर थोड़ा practical होकर सोचिए। आप देखेंगे कि जीवन में परिस्थितियों के वश में घटने वाली घटनाओं पर प्रश्नचिह्न लगाने का कोई औचित्य नहीं है। हम हर परिस्थिति में केवल आगे ही बढ़ सकते हैं।
ये वे बातें हैं जिन्हें आप जानते हैं। इन्हें आपने आज पहली बार नहीं पढ़ा है। लेकिन यदि आप इन्हें मानते हैं तो जीवन के बेहतर होने की संभावनाएँ कई गुना बढ़ जाती हैं।
क्योंकि इन सिद्धांतों का एक ही लक्ष्य है: बेहतर और उपयोगी जीवन का निर्माण।
सात सिद्धांत — और उनकी जड़ें
ये सात सिद्धांत नए नहीं हैं। दुनिया के महान दार्शनिक, संत और विचारक सदियों से यही कहते आए हैं — बस अलग-अलग भाषाओं में।
पहला सिद्धांत — दर्द से growth — यह Friedrich Nietzsche का वह प्रसिद्ध वाक्य है: “जो मुझे मारता नहीं, वह मुझे मज़बूत बनाता है।” और भारतीय परम्परा में यही तपस्या का अर्थ है — अग्नि से गुज़रकर कुंदन बनना।
दूसरा सिद्धांत — negativity से दूरी — बुद्ध ने कहा था कि हमारा मन ही हमारी सबसे बड़ी समस्या है। जो हम सोचते हैं, वही बनते हैं। नकारात्मक विचारों की संगति नकारात्मक जीवन बनाती है।
तीसरा सिद्धांत — देने की प्रवृत्ति — Bhagavad Gita का निष्काम कर्म। फल की चिंता किए बिना देते रहो। Harvard की 80 वर्षीय research भी यही कहती है — देने वाले अधिक सुखी होते हैं।
चौथा सिद्धांत — समय — Seneca ने लिखा था: “हमारे पास समय की कमी नहीं है। हम समय बर्बाद करते हैं।” 2000 साल पहले।
पाँचवाँ सिद्धांत — अपनी राह — Robert Frost की कविता “The Road Not Taken” — जो रास्ता कम लोगों ने चुना, उसने सब बदल दिया।
छठा सिद्धांत — परिस्थितियों की स्वीकृति — Stoicism का मूल सूत्र: जो बदल सकते हो — बदलो, जो नहीं बदल सकते — स्वीकार करो। और गीता का “यद्भवति तद्भवतु” — जो होना है, होगा।
सातवाँ सिद्धांत — वर्तमान में जीना — Eckhart Tolle, बुद्ध, और हर ध्यान-परम्परा का सार — अभी, इसी पल में।
फिल्म “Dil Chahta Hai” — तीन दोस्त, तीन रास्ते
“Dil Chahta Hai” (2001) में तीन दोस्त — Aamir, Saif, Akshaye — इन्हीं सात सिद्धांतों से जूझते हैं।
Aamir अपनी राह खुद बनाता है। Saif अतीत में जीता है और दुख पाता है। Akshaye दर्द से गुज़रकर परिपक्व होता है।
और फिल्म के अंत में तीनों वहाँ पहुँचते हैं जहाँ उन्हें होना था — अपनी शर्तों पर।
जीवन ऐसे ही चलता है।
तीन ज़रूरी सवाल
इन सिद्धांतों को जानते हुए भी हम इन्हें क्यों नहीं मान पाते? क्योंकि जानना और मानना दो अलग काम हैं। जानना बौद्धिक है — मानना व्यवहारिक। और व्यवहार बदलने के लिए बार-बार, रोज़, छोटे-छोटे कदम चाहिए — एक बड़े संकल्प से नहीं। इन सात सिद्धांतों में से एक चुनिए। बस एक। और उसे एक हफ्ते जीकर देखिए।
क्या इन सात सिद्धांतों को मानने से जीवन सुखी हो जाएगा? गारंटी नहीं है — और लेखक ने खुद यह स्वीकार किया है। लेकिन इन्हें मानने से आप अधिक सचेत, अधिक उद्देश्यपूर्ण और अधिक लचीले बनते हैं। दुख आएगा — लेकिन आप उसमें डूबेंगे नहीं। यही काफी है।
सातवें सिद्धांत में “वर्तमान में जीना” — यह व्यावहारिक रूप से कैसे करें? एक सरल शुरुआत — अगली बार जब कोई पुरानी बात तकलीफ दे या भविष्य की चिंता सताए, तो तीन गहरी साँसें लें और एक ही प्रश्न पूछें: “अभी, इस पल, क्या मैं ठीक हूँ?” अधिकांश बार उत्तर हाँ होगा। और वह हाँ — आपको वर्तमान में लौटा देगी।





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