एक मंदिर का पुजारी मंदिर के साथ लगे उद्यान की देखभाल भी करता था। उसे बागवानी में बहुत आनंद आता था। उसके भव्य मंदिर से लगा हुआ एक छोटा-सा मंदिर भी था जहाँ एक महात्मा रहते थे।
एक दिन पुजारी को सूचना मिली कि उसके मंदिर में दर्शन करने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण व्यक्ति का आगमन होने वाला है। उसने मंदिर को साफ-सुथरा करने के बाद उद्यान को व्यवस्थित करने का बीड़ा उठाया। उसने उद्यान से सारी खरपतवार उखाड़ डाली, टहनियों की छँटाई की, और उद्यान में गिरे हुए हर पत्ते को बड़ी मेहनत से उठाकर फेंक दिया।
दोनों मंदिरों के बीच में एक दीवार थी और महात्मा पुजारी को यह सब करते हुए देख रहे थे। जब पुजारी ने अपना कार्य समाप्त कर लिया तो उसने अपनी मेहनत के प्रति प्रशंसा पाने के उद्देश्य से महात्मा से पूछा — “अब यह उद्यान बहुत सुन्दर लग रहा है न?”
“हाँ” — महात्मा ने कहा — “लेकिन मुझे अभी भी इसमें कुछ कमी लग रही है। ज़रा मुझे दीवार के उस पार आने में कुछ सहायता करो ताकि मैं इसे तुम्हारे लिए ठीक कर सकूँ।”
पुजारी ने महात्मा को दीवार के पार से खींचकर अपने उद्यान में उतार दिया। महात्मा धीरे-धीरे चलकर उद्यान के बीचोंबीच लगे एक वृक्ष के पास गए। उन्होंने पेड़ के तने को पकड़कर उसे ज़ोरों से हिला दिया। पेड़ की पत्तियाँ झड़कर पूरे उद्यान में बिखर गईं।
“अब उद्यान वास्तव में परिपूर्ण हो गया है” — महात्मा ने कहा — “तुम मुझे मेरे मंदिर में वापस उतरने में थोड़ी सहायता कर सकते हो?”
मनुष्य अथक प्रयत्न कर ले तो भी प्रकृति से अधिक परिपूर्ण नहीं हो सकता। ईश्वर की बनाई हुई किसी भी रचना को और अधिक सुन्दर करने का प्रयत्न उसके प्राकृतिक सौंदर्य को खंडित करके उसे कुरूप बना देता है।
वह एक झटका — जिसने सब कह दिया
महात्मा कुछ बोले नहीं। कोई व्याख्यान नहीं दिया। कोई शास्त्र नहीं सुनाया।
उन्होंने बस एक पेड़ हिलाया।
और उन बिखरी पत्तियों ने वह सब कह दिया जो हज़ार शब्द नहीं कह सकते थे।
पुजारी ने घंटों मेहनत करके उद्यान से जो हटाया था — महात्मा ने एक क्षण में उसे वापस कर दिया। और कहा — “अब परिपूर्ण है।”
यह विरोधाभास ही इस कहानी का सार है। जो अधूरा लगता था — वही पूर्ण था। जो पूर्ण लग रहा था — वह खाली था।
Wabi-Sabi — अपूर्णता का जापानी दर्शन
जापान में एक अवधारणा है — “Wabi-Sabi” (侘寂)।
Wabi — साधारण, अधूरे और असंपूर्ण में सौंदर्य देखना। Sabi — समय के बीतने, घिसाव और अपूर्णता में गहराई पाना।
जापानी चाय-समारोह में जानबूझकर असममित प्याले इस्तेमाल किए जाते हैं। जापानी बागवानी में पत्थरों को पूरी तरह सजाया नहीं जाता — एक कोण जानबूझकर टेढ़ा छोड़ा जाता है। जापानी कविता Haiku में एक शब्द हमेशा अनकहा रहता है।
Wabi-Sabi कहता है — प्रकृति की अपूर्णता ही उसकी परिपूर्णता है।
पुजारी का उद्यान Wabi-Sabi से रहित था। महात्मा ने उसे वापस दिया।
Wu Wei — बिना प्रयास के होना
लाओ-त्ज़ु के ताओ-ते-चिंग में “Wu Wei” (无为) का विचार है — अर्थात् बिना बल लगाए, प्रकृति के साथ बहना।
“प्रकृति कोई जल्दी नहीं करती — फिर भी सब कुछ हो जाता है।”
पुजारी ने जो किया वह Wu Wei का विपरीत था — उसने प्रकृति पर अपनी इच्छा थोपी। खरपतवार हटाई, पत्तियाँ उठाईं, टहनियाँ काटीं — ताकि उद्यान उसकी कल्पना के अनुसार दिखे।
महात्मा ने Wu Wei किया — पेड़ को हिलाया और प्रकृति को अपना काम करने दिया।
रवींद्रनाथ टैगोर — जो अधूरा है, वही सुन्दर है
रवींद्रनाथ टैगोर ने लिखा था —
“यदि तुम सारे फूल तोड़ लो, तो वसंत नहीं आएगा।”
फूल जब डाल पर होता है — उसमें जीवन है, गति है, संबंध है। तोड़ने के बाद वह सुन्दर तो दिखता है — पर जीवित नहीं रहता।
पुजारी का उद्यान उसी तोड़े हुए फूल जैसा था — साफ, सजा हुआ, पर प्राण-हीन।
महात्मा ने पत्तियाँ बिखराकर उसमें जीवन लौटाया।
Ansel Adams — प्रकृति की तस्वीर जो “सुधारी” नहीं जा सकती
महान फोटोग्राफर Ansel Adams कहते थे — “कोई भी रचनात्मक कार्य प्रकृति की नकल नहीं — प्रकृति की भावना को पकड़ने का प्रयास है।”
उन्होंने Yosemite valley की जो तस्वीरें खींचीं — उनमें पेड़ टेढ़े हैं, पत्थर बेतरतीब हैं, आकाश असमान है। उन्होंने कुछ “सुधारा” नहीं। बस देखा।
और वे तस्वीरें दुनिया की सबसे प्रसिद्ध तस्वीरों में हैं।
जो प्रकृति में है — वह किसी studio में नहीं बन सकता।
फिल्म “Baraka” — बिना एक शब्द के
“Baraka” (1992) — Ron Fricke की यह documentary film बिना एक भी संवाद के, केवल दृश्यों और संगीत से, पूरी दुनिया की प्रकृति और मनुष्य को दिखाती है।
फिल्म में एक sequence है जहाँ एक जापानी उद्यान दिखाया जाता है — पत्थर, काई, बिखरी पत्तियाँ, टेढ़े पेड़। कोई symmetry नहीं। कोई “सफाई” नहीं।
और वह उद्यान इतना सुन्दर है कि दर्शक साँस रोक लेते हैं।
पुजारी उस उद्यान को देखता तो शायद तुरंत झाड़ू उठा लेता। महात्मा उसे देखते — और मुस्कुरा देते।
Perfectionism — जो सौंदर्य को नष्ट करता है
आधुनिक मनोविज्ञान में Perfectionism को एक समस्या के रूप में देखा जाता है — न कि गुण के रूप में।
Brené Brown अपनी research में कहती हैं — “Perfectionism दरअसल एक protective shield है — लोग हमें कमज़ोर न देखें, इसलिए हम सब कुछ perfect रखने की कोशिश करते हैं।”
पुजारी का उद्यान भी एक ऐसा ही shield था। महत्वपूर्ण अतिथि आने वाला था — पुजारी को यह नहीं दिखना था कि उद्यान में कोई कमी है।
लेकिन उस कोशिश में उसने वह सब हटा दिया जो उद्यान को जीवित बनाता था।
Perfectionism जब अपना काम करता है — तो जो बचता है वह perfect नहीं, खाली होता है।
वह पत्ती जो गिर रही है
अगली बार जब आप किसी पेड़ से पत्ती गिरते देखें — रुकिए।
उसे उठाकर फेंकने की जल्दी मत कीजिए।
वह पत्ती उसी पेड़ से आई है जिसकी छाया में आप बैठे हैं। वह ज़मीन में मिलकर उसी पेड़ की जड़ों को खाद देगी।
वह गिरना — एक वापसी है। एक चक्र है। एक परिपूर्णता है।
महात्मा यही जानते थे। और इसीलिए उन्होंने पेड़ हिलाया।





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