मैं अक्सर अपने अतीत के जीवन को याद करता हूँ। युवावस्था के अनुभवों से मिले सबक मुझे उन अच्छे-बुरे दिनों की याद दिलाते हैं जिन्होंने मेरे व्यक्तित्व और चरित्र का निर्माण किया।

काश मैं किसी टाइम-मशीन में बैठकर बीस साल पीछे जा सकता — और जवानी में कदम रखते अपने प्रतिरूप को कुछ सलाह और चेतावनियाँ दे पाता।

लेकिन आज मैं अपने जीवन से खुश हूँ। और यह मानता हूँ कि जो होता है, अच्छे के लिए होता है।

पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने भी दूसरे नौजवानों की तरह नौकरी खोजने की जद्दोजहद की। मैं अकादमिक टाइप का लड़का था जो पढ़ने-पढ़ाने में रुचि लेता था — लेकिन मैंने छोटे कस्बों और दूसरे शहरों में रहकर मार्केटिंग की, प्रेस में काम किया, घर-घर जाकर ट्यूशन दी, कॉलेज में पार्ट-टाइम पढ़ाया। इन बीस वर्षों में दुनिया और मैं खुद बहुत बदल चुके हैं।

अब मैं पब्लिक सेक्टर में फुल-टाइम काम करता हूँ। और जब मैं छोटे बच्चों को अपने करियर के बारे में गंभीरता से सोचते देखता हूँ — तो मन खुश होता है।

ये हैं वे सबक जो मुझे ज़िंदगी ने सिखाए — और जो मैं हर उस व्यक्ति से साझा करना चाहता हूँ जो सफलता, समृद्धि, संतुष्टि और परिपूर्णता की कामना करता है।


1. ज़िंदगी कभी तय प्लान के हिसाब से नहीं चलती

ज़िंदगी अपने universal pattern पर चलती है। वह हमारी परवाह नहीं करती।

जब हम बड़े हो रहे होते हैं तो उम्मीद करते हैं कि चीज़ें हमारे मुताबिक हों — लेकिन ऐसा बहुत कम होता है। ऐसे में अनासक्ति के नियम के अनुसार चलने वालों को निराशा नहीं होती।

यह नियम कहता है — उस दिशा में जाओ जहाँ जीवन ले जा रहा हो। कर्म करते रहो। परिणाम की उम्मीद रखो — लेकिन यदि परिणाम प्रतिकूल हो तो भी हार मत मानो।

उर्दू के महाकवि फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ (Faiz Ahmed Faiz) को पाकिस्तान में जेल भेजा गया, देश निकाला मिला, उनकी कविताएँ प्रतिबंधित हुईं। लेकिन उन्होंने जेल की कोठरी में भी लिखना नहीं छोड़ा।

उनकी वह पंक्ति आज भी गूँजती है — “हम देखेंगे।”

यह अनासक्ति नहीं — यह अदम्य विश्वास था कि ज़िंदगी का प्रवाह रुकता नहीं।


2. सहजता और सरलता ही असली समृद्धि है

बचपन में मेरी पसंद की चीज़ें — खिलौने, कॉमिक्स — मुझे खुशी देती थीं। स्कूल छोड़ने के बाद पता चला कि असली खुशी दोस्तों के साथ घूमने में है, किसी के काम आने में है।

रोज़ ऑफिस आते-जाते मैं गरीब लोगों को देखता हूँ — बहुत कमियाँ हैं उनकी ज़िंदगी में, लेकिन वे संतुष्ट दिखते हैं।

नई-नई चीज़ें खरीदने की इच्छा मानसिक ऊर्जा खाती रहती है। यदि हम हर समय भौतिक वस्तुओं के बारे में न सोचें — तो वह ऊर्जा रचनात्मक काम में लग सकती है।

टॉल्स्टॉय (Leo Tolstoy) ने एक बार अपनी भव्य संपत्ति छोड़कर सादगी में जीवन जीने का निर्णय लिया। उन्होंने लिखा — “सबसे बड़ा झूठ यह है कि हम उन चीज़ों से खुश होंगे जो हमारे पास अभी नहीं हैं।”

नवयुवकों के सामने आज बहुत distraction हैं। यदि वे जीवन में आगे बढ़ने के बारे में गंभीर हैं — तो सहजता और सरलता को अपनाना होगा।


3. ब्रह्मांड की लय के साथ जुड़ना ज़रूरी है

मैं मानता हूँ कि एक universal energy होती है जो हमें हमेशा उपलब्ध है — लेकिन हम अपने भटकाव के कारण उसका channel block कर देते हैं।

यह ऊर्जा तब मिलने लगती है जब हम खुद को सहजता के साथ प्रकृति के हाथों में सौंप देते हैं। प्रकृति का विरोध करना बंद कर देते हैं।

आप इसे Law of Attraction कहें, ईश्वर की इच्छा कहें, या कर्म का नियम — प्रकृति के नियम धैर्यपूर्वक परिश्रम करने वालों को वह सब देते हैं जो वे पाना चाहते हैं।


4. बुरी घटनाएँ भी अच्छे अवसर उपलब्ध कराती हैं

जब हम किसी मुसीबत में गले तक फँस जाते हैं — तो उससे छूट पाना बहुत कठिन हो जाता है। जीवन का वह दौर घोर निराशा और तनाव से भर जाता है। मैं भी ऐसे अनेक दौर से गुज़र चुका हूँ।

लेकिन हर समस्या का समाधान एक-न-एक दिन ज़रूर होता है।

करियर के शुरुआती दौर में ही उतार-चढ़ाव का सामना मिल जाए — तो भावी जीवन में उनसे घबराहट नहीं होती।

मुझे दुःख है कि कुछ नवयुवक इनका सामना नहीं कर पाते और ज़िंदगी से हार मान लेते हैं। काश मैं उन्हें यह समझा पाता — कोई भी त्रासदी जीवन से बड़ी नहीं होती। सब कुछ खत्म हो जाने पर भी भविष्य बचा रह जाता है।


5. अपनी नियति का निर्माता मैं ही हूँ

संघर्ष के दिनों में मैंने अपनी परिस्थितियों और समस्याओं के लिए हमेशा दूसरों को ज़िम्मेदार ठहराया। माता-पिता सबसे आसान शिकार थे।

बहुत-बहुत बाद में अंतःप्रेरणा जागने पर यह महसूस हुआ — मुझे होने वाली किसी भी अनुभूति के लिए मैं ही उत्तरदायी था।

रोमन सम्राट और दार्शनिक मार्कस ऑरेलियस (Marcus Aurelius) ने अपनी डायरी “मेडिटेशंस” (Meditations) में लिखा — “आप घटनाओं को नियंत्रित नहीं कर सकते — लेकिन आप हमेशा यह चुन सकते हैं कि उन पर कैसी प्रतिक्रिया दें।”

यह एक सम्राट ने लिखा था — जिसके हाथ में पूरे रोमन साम्राज्य की ताकत थी। फिर भी उसने कहा — असली शक्ति भीतर की प्रतिक्रिया में है, बाहर की परिस्थिति में नहीं।

आज मैं यह कह सकता हूँ — कोई दूसरा व्यक्ति मेरी भावनाओं को नियंत्रित नहीं कर सकता। मैं हमेशा अपने नियंत्रण में रहता हूँ।


6. मुझे परवाह नहीं कि लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं

युवावस्था में हम चाहते हैं कि लोग हमें पसंद करें। यह मनोविज्ञान का रोचक नियम है — हम उन लोगों को सबसे अधिक impress करना चाहते हैं जिन्हें हम खुद पसंद नहीं करते।

इस नियम का अनुभव मुझे बहुत देर से हुआ — और तब तक बहुत सारा समय व्यर्थ हो चुका था।

आज के smartphone-crazy दौर में सभी अपनी-अपनी screen में डूबे हुए हैं। कोई भी किसी दूसरे के बारे में कुछ सेकंड से अधिक नहीं सोचता।

दुनिया यथास्थिति से समझौता करने वालों से भरी है — लेकिन दुनिया बदलते वे हैं जो दूसरों की परवाह नहीं करते।

पंजाबी की महान लेखिका अमृता प्रीतम (Amrita Pritam) ने अपने समय की हर वर्जना तोड़ी — समाज की, परिवार की, परंपरा की। लोगों ने उनके बारे में बहुत कुछ कहा। उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा। उनकी कविताएँ और कहानियाँ आज भी करोड़ों दिलों में जीती हैं।

अपना जीवन उस तरह बिताइए जैसा आप चाहते हैं। उतना ही निर्भय बनिए जितना आप बचपन में थे।


7. कथनी से अधिक करनी बोलती है

किशोरावस्था पार करके जब मैं युवावस्था में आया — तो लोगों पर भरोसा करता था। दोस्त कहते “हर परिस्थिति में साथ हैं” — मैं मान लेता था।

लंबे समय तक ठोकरें, चोट और धोखे खाने के बाद पता चला — अधिकांश लोग बाहर से कुछ होते हैं, भीतर से कुछ और।

1982 की फिल्म “अर्थ” (Arth) में शबाना आज़मी का किरदार यही सीखता है — कि प्यार का दावा करने वाले सबसे पहले छोड़ते हैं, और जो बिना दावे के साथ खड़े थे वही असली थे।

अब मैं संबंधों को professional रखने पर यकीन करता हूँ। मैं किसी से इस गहराई से नहीं जुड़ता कि उनसे अलग होने का अफसोस हो। ठोकरों ने सिखाया — लोगों में निहित अच्छाई और बुराई उनका जन्मजात स्वभाव है। हमें उनसे deal करते वक्त यह याद रखना चाहिए।


8. बीत रहा यह क्षण ही सबसे महत्वपूर्ण है

मैं हमेशा आने वाले कल की बेसब्री से राह तकता था — क्योंकि वही मुझे वर्तमान से बाहर निकाल सकता था।

लेकिन एक गहरी बात समझ में आई —

दुःख अवश्यंभावी है। पीड़ा वैकल्पिक है।

यह वाक्य विक्टर फ्रैंकल (Viktor Frankl) का है — एक यहूदी मनोचिकित्सक जिन्होंने Nazi concentration camps में अपना पूरा परिवार खो दिया। उस नरक में रहते हुए उन्होंने यह खोज की कि परिस्थिति चाहे जो हो, भीतर की प्रतिक्रिया हमारी अपनी होती है। उनकी किताब “मैन्स सर्च फॉर मीनिंग” (Man’s Search for Meaning) आज भी करोड़ों लोगों को जीने का कारण देती है।

यह जान लेने पर आप वर्तमान क्षण में जीना सीख लेते हैं।

आज, अभी, इस क्षण में हमारे भविष्य की कहानी लिखी जा रही है। हमारा हर विचार, हर भावना और हर क्रिया उस कहानी को नया मोड़ दे सकती है।


वह कैनवास जो दुरुस्त किया जा सकता है

मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि बहुत जटिल होने पर भी इसे किसी किताब के नए chapter की तरह शुरू से शुरू किया जा सकता है।

जीवन के canvas को खराब हो जाने पर दुरुस्त करके नया रंग भरा जा सकता है।

अच्छी बात यह है — इस काम के लिए जो साहस, संकल्प और समर्पण चाहिए, वह सबके पास सुलभ है।



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7 responses to “काश मैं बीस साल पहले यह जानता — ज़िंदगी के आठ सबक”

  1. बहुत खूब लिखा है……

  2. Awesome post to guide the life.

  3. संयोगवश आपके ब्लॉग पर आ गया और लगा कि जैसे मेरे ही अनुभवों की बातें आप कह रहे हों। यह नेक काम करते रहिए।

  4. Bahot help full he ye, muje laga ye bilkul mere liye hi he.

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