लगभग 125 साल पहले अमेरिका में विलिस्टन फिश (Williston Fish) नामक एक मामूली लेखक रहता था। वह वकालत और व्यापार में भी असफल रहा। उसकी लिखी कोई किताब न तो कभी छपी, न किसी ने पढ़ी।

उसके मरने के बाद उसके कागज-पत्तरों में उसकी लिखी एक वसीयत मिली। यह पहली बार एक पत्रिका में 1898 में प्रकाशित हुई।

मैं दुनिया को वही देकर जाऊँगा जो फिश देकर जाना चाहता था। ये रही उसकी वसीयत — जो मेरी भी वसीयत होगी:

* * * * *

सबसे पहले अच्छे माताओं और पिताओं को — अपने बच्चों को देने के लिए प्यारे-प्यारे निराले नाम और प्रशंसा के मीठे शब्द। माता-पिता उन्हें जिस समय जैसी ज़रूरत हो वैसे प्रयोग में लाएँ।

यह सिर्फ़ बच्चों के लिए है — वह भी तभी तक जब वे छोटे बच्चे हैं। ये चीज़ें हैं खेतों और मैदानों में खिले रंगबिरंगे खुशबूदार फूल… बच्चे उनके चारों ओर वैसे ही खेलें जैसे वे खेलना चाहें, बस काँटों से बचें। पीली सपनीली खाड़ी के परे झील के तट पर बिछी रेत उनकी है… जहाँ लहरों पर टिड्डे सवारी कर रहे हों और हवाओं में सरकंडों की महक घुली हो। बड़े-बड़े पेड़ों पर टिके सफ़ेद बादल भी मैं बच्चों के नाम करता हूँ।

इसके अलावा — सैकड़ों-हज़ारों तरीकों से मौज-मस्ती करने के लिए मैं बच्चों को लंबे-लंबे दिन देता हूँ। रात को वे चाँद और सितारों से मढ़े हुए आसमान और आकाशगंगा को देखकर स्तब्ध हो जाएँ। मैं हर बच्चे को यह अधिकार देता हूँ कि वह अपने लिए एक तारा चुन ले। बच्चे के पिता की यह जिम्मेदारी होगी कि वह बच्चे को उस तारे का नाम बताए — ताकि बच्चा उसे कभी न भूले, भले ही वह पूरा ज्योतिर्विज्ञान भूल जाए।

थोड़े बड़े लड़कों के लिए — ऐसे बड़े-बड़े मैदान जहाँ वे गेंद से खेल सकें, बर्फ से ढकी चोटियाँ जहाँ चढ़ना मुनासिब हो, झरने और लहरें जिनमें उतरा जा सके, सारे चारागाह जहाँ तितलियों का डेरा हो, ऐसे जंगल जहाँ गिलहरियाँ फुदकें और तरह-तरह की चिड़ियाँ चहचहाएँ। सर्द रातों में जलती हुई आग के इर्द-गिर्द बैठकर अंगारों में शक्लें ढूँढने का बेरोकटोक काम मैं लड़कों के सुपुर्द करता हूँ।

प्रेमियों के लिए मैं वसीयत करता हूँ उनकी सपनों की दुनिया — चाँद-सितारे, लाल सुर्ख गुलाब जिन पर ओस की बूँदें हों, मादक स्वरलहरियाँ, और उनके प्रेम और सौंदर्य की अनश्वरता का अहसास।

युवकों के लिए मैं चुनता हूँ — बहादुरी, पागलपन, झंझावात, बहस-मुबाहिसे, कमज़ोरी की अवहेलना और ताक़त का जुनून। उन्हें ताउम्र की दोस्ती और दीवानगी को निभाने की आज़ादी। रगों में तूफ़ान भर देने वाले जोशीले गीत जिन्हें वे सब मिलकर गाएँ।

और उनके लिए — जो न तो बच्चे हैं, न किशोर, न युवा, और न प्रेमी — उनके लिए मैं यादें छोड़ता हूँ। सारी पुरानी कविताएँ और गीत उनके हैं। उन्हें यह याद दिलाने के लिए कि उन्हें उन्मुक्त और भरपूर ऐसी ज़िंदगी जीना है जिसमें कुछ बकाया न रह गया हो।

उनके लिए यही काफी है कि वे इस दुनिया को जानते रहें, समझते रहें — यह दुनिया असीम है।

* * * * *

तो यह थी विलिस्टन फिश की वसीयत।

कागज के इस एक पृष्ठ के लिए लोग उसे आज भी याद करते हैं। आगे भी करते रहेंगे।

फिश की ही भाँति मैंने भी कुछ लिखा। कुछ मिटाया भी। इसमें मौलिक कम था और दुनिया जहान का अनुवाद थोड़ा अधिक। लेकिन मैं चाहूँगा कि लोग मुझे याद रखें — जिस तरह किसी अनाम शायर को उसके एक शेर के लिए सदियों याद किया जाता है।

ऐसा कुछ मैं दुनिया को देकर जाना चाहता हूँ।


एक पन्ने की अमरता

विलिस्टन फिश ने जो नहीं पाया — प्रकाशन, प्रसिद्धि, पाठक — वह सब उसे मरने के बाद एक वसीयत ने दे दिया।

यह विडंबना नहीं — यह सत्य है।

जो चीज़ें हम सबसे सच्चे मन से, बिना किसी प्रयोजन के लिखते हैं — वे ही अक्सर सबसे लंबी उम्र पाती हैं। क्योंकि उनमें कोई चाहत नहीं होती। कोई दिखावा नहीं। केवल एक इंसान का अपने मन की बात कह देना।

फिश ने वसीयत लिखी — दुनिया के लिए। दुनिया ने उसे पढ़ा — और उसे अमर कर दिया।


मिर्ज़ा ग़ालिब — जो जीते जी उपेक्षित रहे

उर्दू के महाकवि मिर्ज़ा ग़ालिब अपने जीवनकाल में वह सम्मान नहीं पा सके जिसके वे अधिकारी थे। दरबार ने उन्हें नज़रअंदाज़ किया। पेंशन बंद हुई। कर्ज़ में डूबे रहे।

लेकिन आज — डेढ़ सौ साल बाद — उनका एक शेर किसी की ज़िंदगी बदल सकता है। किसी के टूटे हुए दिल को भाषा दे सकता है।

फिश और ग़ालिब — अलग देश, अलग भाषा, अलग सदी। लेकिन एक ही नियति —

जो जीते जी नहीं मिला, वह मरने के बाद मिला। और वह हमेशा के लिए मिला।


माया एंजलो का वह वाक्य

अमेरिकी कवयित्री और लेखिका माया एंजलो (Maya Angelou) ने कहा था —

लोग भूल जाते हैं कि आपने क्या कहा। लोग भूल जाते हैं कि आपने क्या किया। लेकिन लोग कभी नहीं भूलते कि आपने उन्हें कैसा महसूस कराया।

फिश की वसीयत यही करती है। वह क्या कहती है — यह गौण है। वह कैसा महसूस कराती है — यही उसकी शक्ति है।

एक बच्चे का अपना तारा चुनना। एक युवक का पागलपन से जीना। एक बूढ़े का यादों में डूबना — यह सब पढ़कर जो भाव उठता है, वह किसी भी “सफल” किताब से शायद ही मिले।

फिश ने लिखावट नहीं छोड़ी — एहसास छोड़ा।


फिल्म “अभिमान” — वह गीत जो रह जाता है

1973 की फिल्म “अभिमान” (Abhimaan) में एक दृश्य है — जब सुभद्रा (जया बच्चन) चुपचाप गाती है, बिना किसी मंच के, बिना किसी दर्शक के।

वह गायन उसके प्रेम की वसीयत है। उसके अस्तित्व का प्रमाण।

फिश की वसीयत भी ऐसी ही है — बिना किसी मंच के लिखी, बिना किसी पाठक की उम्मीद के। लेकिन वह गूँजती रही।

जो बिना अपेक्षा के दिया जाता है — वही सबसे लंबे समय तक जीता है।


हम सब कुछ छोड़कर जाएंगे — सवाल यह है कि क्या

फिश की वसीयत पढ़कर एक प्रश्न मन में उठता है —

अगर आज आपको अपनी वसीयत लिखनी हो — धन-संपत्ति नहीं, बल्कि वह सब जो आप दुनिया को देकर जाना चाहते हैं — तो आप क्या लिखेंगे?

कोई पल? कोई आदत? कोई दृष्टि? कोई एहसास?

फिश ने फूल दिए, तारे दिए, रातें दीं, यादें दीं — वह सब जो उसके पास था और जो कोई छीन नहीं सकता था।

हम सब के पास वह है — जो किसी और के पास नहीं है। वही हमारी वसीयत है।

और शायद वही हमारी अमरता भी।



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9 responses to “एक असफल लेखक की वसीयत — जो अमर हो गई”

  1. जितनी सारगर्भित वसीयत है , उतना ही खूबसूरत अनुवाद है. बधाई.

  2. सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi अवतार
    सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi

    वसीयत के अनुसार मैं अपना कुछ हिस्‍सा ले चुका हूं और बाकी लेने की कोशिश कर रहा हूं। खुदा का शुक्र है कि विलिस्‍टन ने इतना छोड़ा है कि किसी से प्रतिस्‍पर्द्धा करने की जरूरत नहीं है।निशान्‍त जी एक बार फिर धन्‍यवाद।

  3. अच्छी वसीयत है। बस लागू हो जाये! 🙂

  4. शायद पहली चार तो लागू भी हैं,अंतिम दो विचारणीय है…

  5. प्रवीण पाण्डेय अवतार
    प्रवीण पाण्डेय

    ऐसी उन्मुक्तता हमारी मानवता की वसीयत हो।

  6. आया तो किसी मछली की खोज में मगर पढ़ गया होबो की अद्भुत मगर काबिले गौर वसीयत !शुक्रिया !

  7. The matter in the will suggests that the FISH lived in a male dominated state of mind as there is nothing for females in the will.

    1. Hello Deepak ji, Fish indeed lived in a 19th century world but children, young, lovers, and old – all include both men and women. 🙂

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