एक नास्तिक प्रोफेसर और विद्यार्थी के मध्य ईश्वर के अस्तित्व और विज्ञान के बारे में एक दिन कक्षा में वार्तालाप हुआ।

प्रोफेसर ने अपने नए विद्यार्थी को खड़े होने के लिए कहा और उससे पूछा —

प्रोफेसर — क्या तुम ईश्वर में विश्वास करते हो?

विद्यार्थी — हाँ, सर।

प्रोफेसर — क्या ईश्वर शुभ है?

विद्यार्थी — जी, सर।

प्रोफेसर — क्या ईश्वर सर्वशक्तिमान है?

विद्यार्थी — जी, है।

प्रोफेसर — पिछले साल मेरे भाई की मृत्यु कैंसर से हो गई जबकि वह अंत तक ईश्वर से अच्छा होने की प्रार्थना करता रहा। हममें से बहुत से लोग ईश्वर से ऐसी ही प्रार्थना करते रहते हैं लेकिन ईश्वर कुछ नहीं करता। ऐसा ईश्वर अच्छा कैसे हो सकता है? बताओ।

(विद्यार्थी कुछ नहीं कहता)

प्रोफेसर — लगता है तुम्हारे पास इस बात का कोई जवाब नहीं है। चलो, आगे बढ़ते हैं। मुझे बताओ — क्या ईश्वर अच्छा है?

विद्यार्थी — जी, है।

प्रोफेसर — और क्या शैतान भी अच्छा है?

विद्यार्थी — नहीं।

प्रोफेसर — लेकिन कहा जाता है कि सब कुछ ईश्वर से ही उत्पन्न हुआ है। तो फिर शैतान कहाँ से आया?

विद्यार्थी — जी… ईश्वर से।

प्रोफेसर — ठीक है। तो अब तुम मुझे बताओ — क्या संसार में बुराइयाँ हैं?

विद्यार्थी — जी, हैं।

प्रोफेसर — हाँ। बुराइयाँ हर तरफ हैं। और तुम्हारे अनुसार ईश्वर ने सब कुछ बनाया है न?

विद्यार्थी — जी।

प्रोफेसर — तो बुराइयाँ किसने बनाई हैं?

(विद्यार्थी कुछ नहीं बोलता)

प्रोफेसर — संसार में बीमारी, भुखमरी, युद्ध, अराजकता है। ये सभी और दूसरी बहुत-सी बुराइयाँ संसार में हैं न?

विद्यार्थी — जी, हैं।

प्रोफेसर — इन बुराइयों को किसने बनाया है?

(विद्यार्थी कुछ नहीं कहता)

प्रोफेसर — विज्ञान कहता है कि हम अपनी पाँच ज्ञानेन्द्रियों से सभी प्रकार का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। मुझे बताओ — क्या तुमने ईश्वर को कभी देखा है?

विद्यार्थी — नहीं।

प्रोफेसर — क्या तुमने ईश्वर की आवाज़ सुनी है?

विद्यार्थी — नहीं, सर।

प्रोफेसर — क्या तुमने कभी ईश्वर का स्पर्श किया, उसका स्वाद या सुगंध ली? क्या तुम्हें ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव हुआ?

विद्यार्थी — नहीं, सर। ऐसा कभी नहीं हुआ।

प्रोफेसर — फिर भी तुम उसमें आस्था रखते हो!

विद्यार्थी — जी।

प्रोफेसर — लेकिन विज्ञान के अनुसार तुम्हारे ईश्वर के अस्तित्व का कोई वैधानिक, तर्कसंगत, अनुभवाधारित प्रमाण नहीं है। इस बारे में तुम क्या कहोगे?

विद्यार्थी — कुछ नहीं। मुझे केवल अपनी आस्था पर विश्वास है।

प्रोफेसर — बहुत खूब! लेकिन विज्ञान तुम्हारी इस कोरी आस्था को दो कौड़ी की भी नहीं मानता।

विद्यार्थी — मैं जानता हूँ, सर। क्या मैं आपसे कुछ प्रश्न कर सकता हूँ?

प्रोफेसर — हाँ, पूछो।

विद्यार्थी — क्या ठंडा या ठंड जैसा कुछ वास्तव में होता है?

प्रोफेसर — हाँ, इसमें क्या संदेह है!

विद्यार्थी — नहीं, सर। आप गलत कह रहे हैं।

(कक्षा में गहन शांति छा जाती है)

विद्यार्थी — सर, ऊष्मा या ताप कम या अधिक हो सकता है — लेकिन ठंड जैसा कुछ नहीं होता। हम शून्य से 273 डिग्री नीचे के तापमान को छू सकते हैं जब कोई ऊष्मा नहीं होती — पर उससे नीचे नहीं जा सकते। ठंड केवल एक शब्द है जिससे हम ताप की अनुपस्थिति को वर्णित करते हैं। ताप ऊर्जा है। ठंड ताप के ठीक विपरीत नहीं है — बल्कि उसकी अनुपस्थिति है।

विद्यार्थी — और अंधकार क्या है, सर? क्या अंधकार जैसी कोई चीज़ होती है?

प्रोफेसर — यदि अंधकार नहीं होता तो भला रात क्या होती?

विद्यार्थी — आप गलत कह रहे हैं, सर। अंधकार भी किसी चीज़ की अनुपस्थिति ही है। प्रकाश कम या अधिक हो सकता है — लेकिन यदि प्रकाश का कोई स्रोत न हो, वह अवस्था अंधकार की होती है। वास्तव में अंधकार का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता। यदि ऐसा होता तो हम अंधकार को और अधिक गहरा बना पाते — जैसा हम प्रकाश के साथ कर सकते हैं।

प्रोफेसर — मैं समझ नहीं पा रहा कि तुम क्या साबित करना चाहते हो।

विद्यार्थी — मैं यह कहना चाहता हूँ कि आपका दृष्टिकोण दोषपूर्ण है। आप द्वैत की अवधारणा को मान रहे हैं — जिस प्रकार जीवन और मृत्यु हैं, उसी प्रकार अच्छा और बुरा ईश्वर होता है। आप ईश्वर की धारणा को सीमित रूप में ले रहे हैं। क्या आप जानते हैं कि विज्ञान इसकी व्याख्या तक नहीं कर सकता कि विचार क्या होता है? आप विद्युत और चुंबकत्व के प्रयोग करते हैं लेकिन आपने इन्हें न तो देखा है, न पूरी तरह जान पाए हैं। आप मृत्यु को जीवन के ठीक विलोम के रूप में देखते हैं — जबकि मृत्यु जीवन की अनुपस्थिति मात्र है।

अब आप मुझे बताएँ, सर — क्या कक्षा में कोई ऐसा है जिसने प्रोफेसर का मस्तिष्क देखा हो?

(सारे विद्यार्थी हँसने लगते हैं)

विद्यार्थी — क्या यहाँ कोई है जिसने प्रोफेसर के मस्तिष्क को सुना हो, छुआ हो, सूँघा, चखा, या अनुभव किया हो? इस प्रकार, विज्ञान के स्थापित मानदंडों के अनुसार — आपके दिमाग का कोई प्रमाण नहीं है। और यदि आपका दिमाग ही नहीं है, तो हम आपकी शिक्षाओं पर कैसे भरोसा कर लें?

(कक्षा में शांति छा जाती है। प्रोफेसर विद्यार्थी की ओर टकटकी लगाए देखते हैं)

प्रोफेसर — कैसी बातें करते हो! यह तो हम अपने विश्वास से जानते ही हैं।

विद्यार्थी — वही तो मैं भी कहना चाहता हूँ, सर — कि मनुष्य और ईश्वर को जोड़नेवाली कड़ी आस्था ही है। यही सभी चर-अचर को गतिमान रखती है।


तर्क और आस्था — दोनों की अपनी सीमाएँ हैं

यह संवाद केवल ईश्वर के अस्तित्व का प्रश्न नहीं है — यह उस पुरानी और अनन्त बहस का एक टुकड़ा है जो तर्क और अनुभव के बीच, विज्ञान और आध्यात्म के बीच, सदियों से चली आ रही है।

विद्यार्थी ने दो अत्यंत महत्वपूर्ण बातें कहीं —

पहली — बुराई ईश्वर के विरुद्ध प्रमाण नहीं है, बल्कि अच्छाई की अनुपस्थिति है। जैसे ठंड ऊष्मा की अनुपस्थिति है, अंधकार प्रकाश की अनुपस्थिति है — वैसे ही बुराई ईश्वर के बनाए किसी स्वतंत्र तत्व की नहीं, बल्कि प्रेम और करुणा की कमी की अभिव्यक्ति है।

दूसरी — विज्ञान भी अंततः कुछ चीज़ों को बिना प्रत्यक्ष प्रमाण के स्वीकार करता है। विश्वास केवल धर्म की सम्पत्ति नहीं — विज्ञान भी उस पर टिका है।


आइंस्टाइन — वह वैज्ञानिक जो ईश्वर से डरता नहीं था

Albert Einstein — जिन्हें आधुनिक विज्ञान का देवता माना जाता है — उन्होंने कहा था:

“विज्ञान बिना धर्म के लँगड़ा है, और धर्म बिना विज्ञान के अंधा।”

Einstein एक परम्परागत ईश्वर में विश्वास नहीं करते थे — लेकिन वे एक गहरे, ब्रह्माण्डीय व्यवस्था में आस्था रखते थे जिसे वे “Spinoza का ईश्वर” कहते थे। उनके लिए प्रकृति के नियमों की अद्भुत संरचना ही एक प्रकार का दिव्य चमत्कार थी।

वे कहते थे — “जो इस ब्रह्माण्ड के रहस्य के सामने विस्मय नहीं अनुभव कर सकता, वह जीवित होते हुए भी मृत है।”


पास्कल का दाँव — तर्क से आस्था की ओर

17वीं सदी के फ्रांसीसी गणितज्ञ और दार्शनिक Blaise Pascal ने एक तर्क दिया जो आज भी दर्शनशास्त्र में पढ़ाया जाता है — “Pascal’s Wager”।

वे कहते थे — मान लो ईश्वर है या नहीं है, दोनों में से एक सच है। यदि तुम ईश्वर में विश्वास करते हो और वह है — तो तुम्हें सब कुछ मिला। यदि वह नहीं है — तो तुमने कुछ खोया नहीं। लेकिन यदि तुमने विश्वास नहीं किया और वह है — तो तुमने सब खोया।

यह तर्क आस्था को तर्क की भाषा में कहने का प्रयास था। और यही इस संवाद का सार भी है — आस्था और तर्क एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।


रवींद्रनाथ टैगोर — जहाँ विज्ञान रुकता है, वहाँ से कविता शुरू होती है

रवींद्रनाथ टैगोर और Albert Einstein के बीच 1930 में एक ऐतिहासिक संवाद हुआ था। Einstein ने पूछा — “क्या सत्य मानवीय चेतना से स्वतंत्र है?” टैगोर ने कहा — “नहीं। सत्य मानव-चेतना के माध्यम से ही प्रकट होता है।”

यह बहस आज भी अनुत्तरित है। लेकिन इसमें एक गहरी बात है — विज्ञान जहाँ रुकता है, वहाँ से दर्शन और आस्था शुरू होती है।


रामकृष्ण परमहंस — प्रत्यक्ष अनुभव की आस्था

बंगाल के महान संत रामकृष्ण परमहंस से एक बार किसी ने पूछा — “आपने ईश्वर को देखा है?” उन्होंने कहा — “हाँ — जैसे तुम्हें अभी देख रहा हूँ, उससे भी अधिक स्पष्ट रूप से।”

यह अनुभव प्रमाण नहीं था — लेकिन यह झूठ भी नहीं था। यह एक ऐसा ज्ञान था जो पाँच ज्ञानेन्द्रियों से परे था। और उस ज्ञान को “अवैज्ञानिक” कहकर dismiss करना भी उतना ही अधूरा होगा जितना बिना जाने उसे स्वीकार करना।


“Agnosticism” — न हाँ, न ना

महान अंग्रेज़ वैज्ञानिक Thomas Huxley ने 1869 में एक शब्द गढ़ा — “Agnostic” — यानी वह व्यक्ति जो न ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध मानता है, न उसके न होने को। वह कहता है — “मैं नहीं जानता।”

यह बौद्धिक ईमानदारी का उच्चतम रूप है। क्योंकि सच यह है —

न नास्तिक यह सिद्ध कर सकता है कि ईश्वर नहीं है। न आस्तिक यह सिद्ध कर सकता है कि ईश्वर है।

दोनों अंततः किसी न किसी आस्था पर खड़े हैं।


फिल्म “Oh My God” — भारतीय परिप्रेक्ष्य में यही प्रश्न

हिंदी फिल्म “Oh My God” (2012) में Paresh Rawal का किरदार एक नास्तिक दुकानदार है जो मन्दिर और धर्म के व्यापार पर प्रश्न उठाता है। लेकिन फिल्म का निष्कर्ष यह नहीं है कि ईश्वर नहीं है — बल्कि यह है कि धर्म के नाम पर चल रहा व्यापार और ईश्वर — ये दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं।

यही इस संवाद का भी सबसे गहरा सन्देश है — प्रोफेसर ईश्वर से नहीं, बल्कि एक खास धारणा से लड़ रहे थे। और विद्यार्थी ने दिखाया कि वह धारणा ही दोषपूर्ण थी।


तीन ज़रूरी सवाल

क्या विद्यार्थी के तर्क वैज्ञानिक रूप से सही हैं? आंशिक रूप से हाँ। ठंड और अंधकार को “अनुपस्थिति” कहना वैज्ञानिक रूप से सही है। लेकिन “बुराई = अच्छाई की अनुपस्थिति” — यह एक दार्शनिक तर्क है, वैज्ञानिक नहीं। दोनों को मिलाकर देखना इस संवाद की सुंदरता है — और सीमा भी।

क्या इस संवाद से यह सिद्ध होता है कि ईश्वर है? नहीं — यह संवाद ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध नहीं करता। यह केवल यह दिखाता है कि नास्तिकता के तर्क भी उतने ही अप्रमाणित हैं जितने आस्तिकता के। अंततः दोनों पक्ष किसी न किसी आस्था पर टिके हैं — बस आस्था के विषय अलग-अलग हैं।

तो क्या विज्ञान और आस्था में कोई मेल नहीं है? मेल है — और गहरा है। विज्ञान “कैसे” का उत्तर देता है, आस्था “क्यों” का। दोनों अलग-अलग प्रश्न पूछते हैं। Einstein, Pascal, टैगोर — सब यही कहते रहे। जहाँ विज्ञान की सीमा खत्म होती है, वहाँ विस्मय शुरू होता है। और विस्मय ही आस्था का जन्मस्थान है।



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65 responses to “आस्था और तर्क — एक विद्यार्थी का जवाब”

  1. Science works on proofs…not on logics….and it also believe in proof…we can see someones brain by operate it…it was a bullshit logic….

    Bhagwaan jsi koi chiz nhi hoti..its our believe on our soul n imagination…viswas bhagwaan pe rkho..aandhviswaas pe biswaas mt kro!!

  2. dimaag ko nikal kr use chaka sunga ya sparash kia ja sakta hai lekin bhagwan ko Nahi dimaag ki upstithi to ham jante hai pr bhagwan ki upstihi Nahi jante dimaag pr vishvaas to ham kr sakte qui Ki hame pata Hai agar ye upstith hai to hi ham sabhi kriyae kr sakte hai At last God doesn’t exist

  3. Bhagwan nahi hai agar hai bhi to sansar ki buraiyo bhrashtachar jativaad dharam ke naam pr pakhand ko kyu Nahi rokta Kya uske ps isko. Rokne ki shakti Nahi hai Aaj croro garib bhuke sote hai Kya bhagwan unse bhedbhav kr rha Kya vo dharam ka parchar krne walo no itni budhi Nahi de sakta ke veh mandir banane ki jageh unke gar banaye unhe ek achi jindgi jine ke liye unki jaroorte puri kare ek betuki baat aur hai ki bhagwaan pichle janam ki saja es janam me deta hai Kya vo itna durbal hai es janam ki saja es janam me Nahi de sakta Aaj kal natik muleo ko kiwi bhagwan dharam ya narak ke Dar ki jaroorat Nahi ham apne ap bi enka palan kr sakte hai ensaan bhagwan ke sahare ke bina bi Bahut achi jindgi ji sakta hai agar kisi garib ke pas khana Na ho to vo bhagwan pr sari jimidari chod kr bhetha rahe ga phir uski kismat achi hui to koi usko khana de dega phir veh bhagwan ka dhanay wad karega agar uski kismat achi Na hui to veh bhokha Mr jayega agar vo bhagwaan pr vishwas krne ki wajaye apne ap pr bhrosa rakhe ki veh paise kamakar khud apni mehnat we khana khayega so bhi bina bhagwan ke to koun sa behtar hai agar ap samaj dar hai to samaj jayege lekin Nahi samaje to aastik ban kr ill informed or absurd religious jindgi jiyo.

  4. Tumhare jaise logo ke Karan hi hamare economy aur progress me kami ati hai jo andhaviswas ko badhawa dete h
    Such me dekha jaye to asali bewkuf tum ho.
    Thand freezing heat ye sab science ki patikriya h
    Samjhane se pehle khud acche se padh lo

  5. मै नहीं जानती उस विद्यार्थी किस सोच के साथ यह बोल रहा था पर यह सबकुछ सच है मेरा खुद का भी यही विश्वास है इस दुनिया में जो कुछ भी है वो ऊर्जा का रूप है पर हम नहीं जान सकते की वो पहली ऊर्जा जिसके द्वारा इस सम्पूर्ण विश्व का प्रादुर्भाव हुआ वो कैसे हुआ और अगर हम इस उत्तर को भी जान ले तो भी हम यह कभी नहीं जान सकते की वो ऊर्जा कहाँ से आयी
    वास्तव में इस सम्पूर्ण विश्व की ऊर्जा का स्त्रोत न कभी उत्त्पन्न हो सकता है और न ही कभी नष्ट हो सकता है उसके न तो आविर्भाव हुआ है न ही अंत होगा और वही ऊर्जा को हम ईश्वर कहते है
    इसलिए ईश्वर अजन्मा है और अंतहीन है और वही इस ब्रम्हांड की ऊर्जा है उसका कोई रूप नहीं है न ही उसका कोई आकर है पर यह सम्पूर्ण विश्व की उत्पत्ति उसी से हुई है उसी ऊर्जा से
    और यह आपको जानने की जरूरत है की ईश्वर और भगवान / अल्लाह / ईशा / गुरु नानक में अंतर है
    ईश्वर वो है जो संपूर्ण विश्व की ऊर्जा है भगवान वो है जिन्होंने ईश्वर को जान लिया है कुछ हद तक
    ईश्वर अन्नंत है भगवन का जन्म भी होता है और उनकी मृत्यु भी होती है भगवन अल्लाह ईशा ये सब ईश्वर के रूप है हम भी है पर इन्होने अपनी आत्मा की ताकत को जाना जो की ईश्वर है
    हमारी आत्मा ही ईश्वर है जिसे हम जीव जानते है जिस ऊर्जा की वजह से हम साँस ले रहे है चल फिर रहे है बोल रहे है वही ऊर्जा ईश्वर है
    और इसी ईश्वर को कभी माँ के रूप में देखते है कभी पिता के रूप में पर मेरे ख्याल से वास्तव में वो एनर्जी स्त्रीपुरुष का समावेश होंगे जिसे हम सनातन धर्म में अर्धनारीश्वर के रूप में जानते है
    वास्तव में इस विषय के तर्क का कोई अंत नहीं

  6. आस्तिक नास्तिक संवाद
    नास्तिक – ईश्वर नाम कि कोई चीज नहीं है , यदि ईश्वर है तो उसे किसने बनाया है ?
    आस्तिक – मित्र ईश्वर को किसी ने नहीं बनाया है , बनाया उसे जाता है जिसमे बनावट हो ईश्वर निराकार है |
    नास्तिक – ईश्वर जैसे कोई चीज नहीं है , ब्रम्हांड कि रचना के लिए ईश्वर कि कोई आवश्यकता नहीं है |
    आस्तिक – मित्र , यदि ऐसा है तो ब्रम्हांड को किसने बनाया ?
    नास्तिक – ब्रम्हांड अपने आप बन गया ?
    आस्तिक – अपने आप बनाने से पूर्व यह कौन सी अवस्था में था ?
    नास्तिक – यह कैसा प्रश्न है ?
    आस्तिक – प्रश्न तो अभी शुरू होगा , बनाने से पहले कोई न कोई अवस्था में तो होगा ही ?
    नास्तिक – हाँ किसी अवस्था में तो होगा |
    आस्तिक – तो फिर उस अवस्था को किसने बनाया ?
    नास्तिक – वह अवस्था अनादि(Beginningless) है उसे किसी ने नहीं बनाया ?
    आस्तिक – जब आप कहते हैं कि ईश्वर को किसी ने बनाया होगा तो हमारा भी यही सवाल है , आप कैसे कह सकते हैं कि उस अवस्था को किसी ने नहीं बनाया है ?
    नास्तिक – तुम बताओ – ब्रम्हांड कैसे बना ?
    आस्तिक – कोई भी बनी हुयी वस्तु बिना किसी के बनाये नहीं बनती , ब्रम्हांड बना हुआ है उसे बनाने वाला ईश्वर है | ईश्वर ने उसे वैज्ञानिक नियमों के अनुसार बनाया है |

    नास्तिक – ईश्वर को किसने बनाया ?
    आस्तिक – इसका उत्तर पहले दे आये हैं , ईश्वर निराकार है इसलिए उसका कोई कलाकार(Creator) नहीं है |
    नास्तिक – ईश्वर ने दुनिया को किस Material से बनाया ?
    आस्तिक – प्रकृति यानि पदार्थ कि मूल अवस्था(Material Cause) से बनाया |
    नास्तिक – उस मूल अवस्था को किसने बनाया ?
    आस्तिक – मूल का कोई मूल नहीं होता , इसलिए उसको किसी ने नहीं बनाया , जिस वस्तु में संयोग होता है उसका कोई निर्माण करने वाला होता है , मूल अवस्था संयोगजन्य नहीं है इसलिए उसका कोई कर्त्ता(Creator) नहीं , ईश्वर भी संयोगजन्य नहीं है उसका भी कोई कर्त्ता(Creator) नहीं है | पदार्थ कि मूल अवस्था ऊर्जा का मूल रूप है , रूप में परिवर्तन होता लेकिन ये ऊर्जा न तो कभी पैदा होती है , न ही कभी नष्ट होती है |
    नास्तिक – इसी तरह हमारी मूल अवस्था को किसी ने नहीं बनाया , और उस मूल अवस्था से ब्रम्हांड अपने आप बना |
    आस्तिक – मित्र , आप ये सिद्ध नहीं कर पाए थे कि उसको किसी ने नहीं बनाया , बल्कि हमने इसे सिद्ध किया है , चलिए , अब आगे बताइये कि यदि ब्रम्हांड अपने आप कैसे बना ?
    नास्तिक – सृष्टि नियमों के द्वारा अपने आप बना |
    आस्तिक – नियम होंगे तो नियामक भी होगा , management होगा तो manager भी होगा , आप नियमों को मानते है तो नियम खुद तो नियामक यानि कि law maker or Ruler को सिद्ध करते है | आप बताइये नियमों को किसने बनाया ?
    नास्तिक – नियम अनादि है , किसी ने नहीं बनाया |
    आस्तिक – नियम अनादि है तो नियामक यानि कि ruler भी अनादि हुआ |
    नास्तिक – नहीं , नियम ही अनादि है |
    आस्तिक – चलिए कोई बात नहीं , नियम अनादि है तो उन नियमों को कैसे पता कि कब उन्हें लागु (Apply) होना है ?
    नास्तिक – अपने आप लागु होते है ?
    आस्तिक – क्या अपने आप लागु होना उन नियमों का स्वभाव(Nature or Property) है ?
    नास्तिक – हाँ

    आस्तिक – अपने आप लागू होंगे तो किसी एक समय नहीं होंगे , बल्कि हमेशा लागु होते रहेंगे |
    नास्तिक – हाँ, तो ब्रम्हांड कभी बना नहीं , हमेशा से है , और नियम हमेशा से लागु रहे हैं |
    आस्तिक – चलिए अब आपकी थ्योरी बदल गयी है , बताइये ब्रम्हांड अनादि कैसे हो सकता है ? ब्रम्हांड में निरंतर विनाश देखने में आता है | सूर्य कि भी एक निश्चित आयु है , इस तरह हर वस्तु कि एक आयु है , सब कभी न कभी ख़त्म होंगे इसलिए ब्रम्हांड अनादि नहीं है |
    नास्तिक – ब्रम्हांड ख़त्म नहीं होता बल्कि उसमे ग्रह , नक्षत्र ख़त्म होते रहते है , कही ग्रह नक्षत्र खत्म होते हैं तो कहीं उनका जन्म होता है इसलिए ब्रम्हांड अनादि है |
    आस्तिक – ब्रम्हांड में ग्रहों का आधार उनका सूर्य होता है और सौर मंडलों का आधार गैलेक्सीज के बीच में black hole होता है इस तरह सबका कोई न कोई आधार है , तब सबका आधार भी कभी न कभी नष्ट होगा , क्यों कि संयोगजन्य वस्तु कभी अनादि नहीं हो सकती जैसे सूरज आदि नष्ट होते है वैसे सबका ,ग्रह, नक्षत्र का आधार black hole भी कभी न कभी नष्ट होगा , और संयोगजन्य होने से अनादि नहीं हो सकता है |
    नास्तिक – हाँ – फिर सत्य क्या है , ब्रम्हांड कैसे बनता है ?
    आस्तिक – इसके लिए वैदिक रश्मि थ्योरी पढ़ो समझ जाओगे |

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