Posts Tagged With: प्रेम

क्या तुम मनुष्य हो?

क्या तुम मनुष्य हो? प्रेम में तुम्हारी जितनी गहराई हो, मनुष्यता में उतनी ही ऊंचाई होगी. और परिग्रह में जितनी ऊंचाई हो, मनुष्यता में उतनी ही क्षुद्रता होगी. प्रेम और परिग्रह जीवन की दो दिशाएं हैं. प्रेम पूर्ण है, तो परिग्रह शून्य हो जाता है. और जिनके चित्त परिग्रह से घिरे रहते हैं, प्रेम वहां [...]

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प्रार्थना : प्रेम और समर्पण

प्रार्थना क्या है? – प्रेम और समर्पण. जहां प्रेम नहीं है, वहां प्रार्थना नहीं है. प्रेम के स्मरण में एक अद्भुत घटना का उल्लेख है. नूरी, रक्काम एवं कुछ अन्य सूफी फकीरों पर काफिर होने का आरोप लगाया गया था और उन्हें मृत्यु दण्ड दिया जा रहा था. जल्लाद जब नंगी तलवार लेकर रक्काम के [...]

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समर्पण

सुबह के साढ़े आठ बजे थे. अस्पताल में बहुत से मरीज़ थे. ऐसे में एक बुजुर्गवार अपने अंगूठे में लगे घाव के टाँके कटवाने के लिए बड़ी उतावली में थे. उन्होंने मुझे बताया कि उन्हें ठीक नौ बजे एक बहुत ज़रूरी काम है. मैंने उनकी जांच करके उन्हें बैठने के लिए कहा. मुझे पता था [...]

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मुझे मेरी किडनी वापस दो!

मुझे एक बेतुके मुकदमे के बारे में पता चला जिसमें न्यूयॉर्क का एक डॉक्टर अपनी तलाकशुदा पत्नी से वह किडनी मांग रहा है जो उसने 2001 में पत्नी को दान में दी थी. अब या तो उसे वह किडनी चाहिए या उसके एवज़ में डेढ़ मिलियन डौलर की रकम चाहिए. डेली न्यूज़ की वेबसाईट में [...]

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प्रेम

(यह कथा ओशो ने अपने एक प्रवचन में कही है) “प्रेम क्या है?”. कल कोई पूछ रहा था. मैंने कहा – “प्रेम जो कुछ भी हो, उसे शब्दों में कहने का कोई उपाय नहीं है क्योंकि वह कोई विचार नहीं है. प्रेम तो अनुभूति है. उसमें डूबा जा सकता है पर उसे जाना नहीं जा [...]

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